कैराना कभी था संगीत का मशहूर घराना

भीमसेन जोशी, मोहम्मद रफी और बेगम अख्तर जैसे संगीत के रत्नों की वजह से मशहूर कैराना हिन्दू परिवारों के पलायन को लेकर चर्चा में आ गया था। जबकि यही कैराना शास्त्रीय संगीत में बेहतरीन मुकाम हासिल करने वाला खयाल गायकी के किराना घराने का मुख्यालय हुआ करता था।

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लखनऊ। शामली जिले के कैराना उपचुनाव की वजह से फिर सामने आ गया है, सबसे ये लोगों के सामने आया जब साम्प्रदायिक मसलों में उछाला गया, लेकिन कम लोग ही जानते होंगे, गीत संगीत के लिए मशहूर किराना घराने की शुरुआत इसी कैराना से हुई थी। संगीत की कई बड़ी मशहूर हस्तियां इस घराने से जुड़ी हुई हैं।

भीमसेन जोशी, मोहम्मद रफी और बेगम अख्तर जैसे संगीत के रत्नों की वजह से मशहूर कैराना हिन्दू परिवारों के पलायन को लेकर चर्चा में आ गया था। जबकि यही कैराना शास्त्रीय संगीत में बेहतरीन मुकाम हासिल करने वाला खयाल गायकी के किराना घराने का मुख्यालय हुआ करता था।

किराना घराने की संगीत साधना मुगलकाल से हुई थी। उस समय कैराना के रहने वाले उस्ताद शकूर अली खां द्वारा यह संगीत कला शुरू की गई थी। इसके बाद अब्दुल करीम खां, अब्दुल वाहिद खां, सवाई गंधर्व, हीराबाई बादोडकर, रोशनआरा बेग़म, सरस्वती राणे, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी और प्रभा अत्रे ने भी इस घराने से शिक्षा पाई। किराना घराना पहले कैराना घराना के नाम से जाना जाता था, जिसने संगीत की दुनिया विशेष रूप से शास्त्रीय संगीत में अपनी पहचान बनाई। यूरोप, अमेरिका, चीन आदि की यात्रा करने वाले किराना घराना के संस्थापक अब्दुल करीम खां राग गाने में विश्व विख्यात रहे हैं। उनके गीतों के एचएमवी ने अनेक ग्रामोफोन रिकॉर्ड बनवाए जोकि बहुत हिट हुए। बाद में यह घराना कर्नाटक और बंगाल में बस गया। इस घराना में ठुमरी गायन का विशेष महत्व है।

ऐसे हुई किराना घराने की शुरुआत

दरबारी संगीतज्ञ ध्रुपद की ख़याल गायकी के जन्मदाता गोपाल नायक ने दुनिया की सबसे मशहूर संगीत परम्परा में से भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे अहम घराने, किराना घराने की नींव रखी। अगली पीढ़ी थी नायक भन्नू और नायक ढोंढू की और तीसरी पीढ़ी का किराना घराना पहचाना गया ग़ुलाम अली और ग़ुलाम मौला के नाम से। इनके शिष्य और चौथी पीढ़ी के संगीत के वाहक थे उस्ताद बंदे अली खां फिर आने वाली पीढ़ी में आए इस घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खान। यहीं से इस घराने का नाम पड़ा किराना घराना।

मन्ना डे के नाम पर है स्टेज

अपने समय के महान संगीतकार मन्ना डे का किसी कारण कैराना आना हुआ तो कैराना की सीमा प्रारम्भ होने से पहले ही जूते उतार कर हाथों में ले लिए। कारण जानने पर बताया कि यह धरती महान संगीतकारों की है इस धरती पर में जूतों के साथ नहीं चल सकता। कैराना वासियों ने मन्ना डे को सम्मान का उत्तर सम्मान से देते हुऐ उनकी याद में छडि़यान मैदान के स्टेज को जिस पर उन्होंने अपना प्रोग्राम प्रस्तुत किया था, मन्ना डे स्टेज का नाम दे दिया जो आज भी प्रचलित है।

गंगूबाई हंगल और भीमसेन जोशी ने दिलायी नहीं पहचान

गंगूबाई हंगल ने कई बाधाओं को पार कर अपनी गायिकी को एक मुकाम तक पहुंचाया। पुरानी पीढ़ी की एक नेतृत्वकर्ता गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परंपरा को बरकरार रखा। उनमें संगीत के प्रति जन्मजात लगाव था और यह उस वक्त दिखाई पड़ता था जब अपने बचपन के दिनों में वह ग्रामोफोन सुनने के लिए सड़क पर दौड़ पड़ती थीं और उस आवाज की नकल करने की कोशिश करती थी‍ं। अपनी बेटी में संगीत की प्रतिभा को देखकर गंगूबाई की संगीतज्ञ मां ने कर्नाटक संगीत के प्रति अपने लगाव को दूर रख दिया। संगीत के प्रति गंगूबाई का इतना लगाव था कि कंदगोल स्थित अपने गुरु के घर तक पहुंचने के लिए वह 30 किमी की यात्रा ट्रेन से पूरी करती थी। यहां उन्होंने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी के साथ संगीत की शिक्षा ली।

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