वजूद के लिए जूझ रहा स्वांग

वजूद के लिए जूझ रहा स्वांग

लखनऊ। टीवी और सिनेमा के इस युग में लोगों के पास मनोरंजन के साधनों की कमी नहीं है। पर ऐसे में कुछ पुरानी लोककलाएं, जो मनोरंजन के साथ-साथ अच्छी जानकारियां भी देती थीं, आज अपने वजूद से संघर्ष कर रही हैं, इनमें से एक विधा है 'स्वांग'।

स्वांग उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड और राजस्थान की पुरानी लोककला है। इस विधा में कलाकार, राजा-महाराजाओं और पौराणिक पात्रों के किरदार निभाते हैं, लोगों का मनोरंजन करने के साथ अच्छाई का भी संदेश भी देते हैं। 

वर्तमान समय में भी लोग पुरानी कहानियों को व्यक्त करने के तरीके और वेशभूषा के लिए स्वांग देखना पसंद करते हैं। हाल ही में सांस्कृतिक विभाग उत्तर प्रदेश ने स्वांग कला का आयोजन कराया था, जहां इसे देखने वालों की भीड़ में हर उम्र के लोग शामिल थे। 

लखनऊ के गोमतीनगर निवासी प्रवीण त्रिपाठी (45) बताते हैं, ''मुझे तो बहुत पसंद है ये सब पुराने समय की कला है। आजकल टीवी, कम्प्यूटर की वजह से लोग इनमें कम रूचि लेते हैं लेकिन फिर भी जानना चाहते हैं कि ये क्या है कैसे होता है।" वो आगे बताते हैं, ''हालांकि अब ये सब कहीं जल्दी देखने को नहीं मिलता है। काफी कम हो गया है, मैं तो आज अपने बच्चों को भी लाया हूं कम से कम इसके माध्यम से ही इतिहास को समझेंगे।"

स्वांग के मंचों पर सिनेमा जैसी भव्यता नहीं होती, पर जब स्वांग के कलाकार अपनी विधा का प्रदर्शन करते हैं तो लोग उसमें खो जाते हैं।

राजू मलिक 12 वर्षों से स्वांग कर रहे हैं। मुजफ्फरनगर के रहने वाले राजू (37 वर्ष) बताते हैं, ''मैं हमेशा रानी की भूमिका अदा करता हूं। आज भी गाँव में लोग इसे पसंद करते हैं और देखने के लिए भीड़ जुटती है। शहरों में भी लोग हमारी अलग वेषभूषा हावभाव देखकर खींचे चले आते हैं। मेरे पूर्वज यही करते थे इसलिए हम इसे अपनी परम्परा समझकर करते हैं।" वो कुछ लाइनें तेज स्वर में गाते हैं, ''मेरा मन भर जा कर्ण रे, मुझे कुंती न कह मां कह दे। आगे समझाते हुए बताते हैं, ''इसमें कुंती, कर्ण का संवाद है कैसे वो कर्ण से मां शब्द सुनना चाहती है लेकिन कर्ण उनकी निंदा करते हुए आगे की लाइन गाते हैं।"

स्वांग के कलाकार खुद को सांगी कहते हैं। कलाकार साधूराम (45) बताते हैं, ''टीवी, रेडियो ये सब तो अभी आए हैं। हम लोग बहुत पहले से हैं। ये हमारे पुरखों की कला है, हम इसे लोगों को बताना चाहते हैं। हम अपनी कला के जरिए सत्य और अच्छाई का प्रचार करते हैं जैसे राजा हरिश्चंद्र सत्यवादी थे, हम उनके किरदार को लोगों के सामने पेश करते हैं।" 

कैसे स्वांग अपना अस्तित्व खोने लगा इसके बारे में वो आगे बताते हैं, ''धीरे-धीरे इस विधा को प्रमोशन मिलना कम हो गया, टीवी और सिनेमाघरों के आगे इसकी लोकप्रियता कम होने लगी। हमें मंच कम मिलने लगे और घर का खर्चा चलाने के लिए स्वांग के अलावा अन्य साधन भी ढूंढऩे पड़ते हैं। मैं जीविका के लिए इसके साथ एक दुकान में भी काम करता हूं।" 

स्वांग में कलाकार समाज में चर्चित किसी हस्ती का रूप धारण करते हैं, उसी चरित्र के अनुसार अभिनय करते हैं, कभी किसी देवता तो कभी किसी राजा के रूप का श्रृंगार कर अपनी बात कहते हैं। वो संवाद बोलते हैं तो साथी कलाकार वाद्य यंत्रों पर संगीत की धुन छेड़ कर माहौल को जीवंत बनाए रखते हैं। 

टीवी के दौर में स्वांग की लोकप्रियता के बारे में स्वांग कलाकार मुकेश अली (38) बताते हैं, ''पहले का दौर कुछ और था, जब शर्म, हया थी, बड़े छोटे का लिहाज होता था, आज ऐसी फिल्में बनती हैं, जो घर परिवार के साथ नहीं देख सकते लेकिन स्वांग की कहानी ऐसी होती है कि पूरा परिवार एक साथ देख सकते हैं। टीवी और सिनेमा में बहुत कुछ बनावटी होता है, मगर हमारी कला में ऐसा नहीं है।"

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