वंचितों, आदिवासियों और दलितों की आवाज थीं महाश्वेता देवी

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कोलकाता (भाषा)। साहित्य के जरिए समाज के दबे, कुचले, वंचित, आदिवासी और दलित समुदायों की आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और महान लेखिका महाश्वेता देवी का आज निधन हो गया।

अपने उपन्यासों और कहानियों में उन्होंने एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर पूरी ईमानदारी से और एक लेखक के तौर पर पूरी शिद्दत के साथ समाज के हाशिए पर रहने वाले इन वंचितों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया और उनके कल्याण की आकांक्षा की। उनके इसी महती कार्य के लिए उन्हें पद्मविभूषण, मैगासायसाय, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

उनकी सभी रचनाओं में, चाहें वे ‘हजार चौरासीर मां' हो या ‘अरण्येर अधिकार', ‘झांसीर रानी' हो या ‘अग्निगर्भा', ‘रुदाली' हो या ‘सिधु कन्हुर डाके'  दलितों के जीवन और उनके हालात की झांकी मिलती है। उनकी बहुत सी रचनाओं के आधार पर फिल्में भी बनाई गईं। गोविंद निहलानी ने 1998 में ‘हजार चौरासी की मां' बनाई जिसमें एक ऐसी मां का भावनात्मक संघर्ष दिखाया गया है जो नक्सल आंदोलन में अपने बेटे के शामिल होने की वजह नहीं समझ पाती है।

1993 में कल्पना लाजमी ने उनके उपन्यास ‘रुदाली' पर इसी नाम से फिल्म बनाई। इतना ही नहीं इतालवी निर्देशक इतालो स्पिनेली ने उनकी लघु कहानी ‘चोली के पीछे' पर ‘गंगूर' नाम से कई भाषाओं में फिल्म बनाई। लेखक और पत्रकार की भूमिका निभाने के अलावा महाश्वेता देवी ने आदिवासियों और ग्रामीण क्षेत्रों के अपनी ही भूमि से बेदखल किए गए लोगों को संगठित होने में मदद की ताकि वे अपने और अपने इलाकों के विकास का काम कर सकें। इसके लिए उन्होंने बहुत से संगठनों की स्थापना की।

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