वोटर पहले देखता है नेता, फिर पार्टी, तब विचारधारा

वोटर पहले देखता है नेता, फिर पार्टी, तब विचारधारागाँव कनेक्शन

हम पंचायती राज दिवस मना रहे हैं जो सत्ता और व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण का प्रतीक है। यह महात्मा गांधी का प्रिय विषय था, ग्राम स्वराज। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय ‘‘गांधीवादी समाजवाद” का नारा दिया गया था लेकिन व्यवहार में आता हुआ नहीं दिखा। प्रदेशों के चुनाव में मुख्यमंत्री के रूप में किसी को प्रस्तुत न करना और पार्टी के सीनियर नेताओं द्वारा कहा जाना कि हमारी सरकार अगले 20-25 साल तक रहेगी तो क्या राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने का इरादा है। संसद चुनावों में अकेले दम डंका बजाने के बाद दिल्ली और बिहार में मोदी का फार्मूला नहीं चला। फिर भी लगता है नरेन्द्र मोदी अमेरिका के प्रजातंत्र की प्रेसिडेन्शियल प्रणाली को अजमाना चाहते हैं। 

सत्तर के दशक में जो चुनाव हुए उनमें इंदिरा गांधी बनाम बाकी सब थे और 40 साल बाद अब नरेन्द्र मोदी बनाम बाकी सब बन गया है। इंदिरा गांधी ने बंगाल के अतुल्य घोष, कर्नाटक के निजलिंगप्पा, गुजरात के सदोबा पाटिल और मोरारजी भाई देसाई जैसे बुजुर्ग नेताओं को किनारे कर दिया था, जिन्होंने आसानी से किनारे होने से इनकार किया, लड़े और हारे। ऐसा ही कुछ मोदी ने किया है और लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह आदि अनेक नेताओं के सामने 75 साल की उम्र वाली लकीर खींच दी। संघ से निकले इन नेताओं में अनुशासन है और इन्होंने दीवार पर लिखी इबारत पढ़ ली है। इंदिरा गांधी की तरह ही मोदी भी कठोर प्रशासक हैं, आशा की जानी चाहिए कि कठोर राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की नौबत नहीं आएगी। 

 वैसे 2014 के बाद अधिकांश लोगों ने ‘‘इन्तजार करो और देखो” की नीति अपनाई थी लेकिन बिहार के नीतीश कुमार की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा स्वाभाविक रूप से शान्त नहीं हुई है और उन्होंने संघमुक्त भारत के बहाने मोदी पर तीर तान दिया है। उन्हें भ्रम है कि संघ विरोध के नाम पर मुलायम सिंह यादव, जयललिता, नवीन पटनायक और ममता उन्हें अपना नेता मान लेंगे। यह दिवास्वप्त के अलावा कुछ नहीं। उन्हें बिहार ठीक करना चाहिए जिसकी दशा ठीक नहीं है।

हमारे देश में प्रधानता व्यक्तियों की अधिक और मुदों की कम रहती है। स्पष्ट सन्देश है: ‘‘बुद्धं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि, धम्म शरणं गच्छामि” यानी पहले बुद्ध फिर संघ यानी संगठन और बाद में धम्म यानी सिद्धान्त को स्वीकारते हैं। व्यक्तियों द्वारा विचारधारा और मुद्दे निर्धारित किए जाते हैं जो कई बार स्पष्ट नहीं होते। जवाहर लाल नेहरू ने पचास के दशक में कांग्रेस को मुद्दा दिया ‘‘सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी” यानी समाज की समाजवादी पद्धति। इसका जो भी मतलब हो, कांग्रेस और देश पर नेहरू छाए रहे। देश के प्रखर समाजवादी नेता नेहरू के सोच से सन्तुष्ट नहीं हुए। धीरे धीरे डा अम्बेडकर, आचार्य जेबी कृपलानी, राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश नारायण आदि कांग्रेस से अलग हो गए। बनती बिगड़ती सोशलिस्ट पार्टियां शुद्ध समाजवादी चिन्तन के साथ मैदान में उतरीं परन्तु प्रधानता व्यक्ति की रही और नेहरू के व्यक्तित्व के सामने विचारधारा टिकी नहीं।  

चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की चमक घट रही थी और 1964 में उनके देहान्त के बाद कोई करिश्माई नेता नहीं रहा था। शास्त्री जी को बहुत कम समय मिला और इन्दिरा गांधी का नेतृत्व करिश्माई तो था लेकिन बहुत विवादित रहा। जयप्रकाश नारायण के आक्रामक आन्दोलन के जवाब में इंदिरा गांधी ने 1975 में व्यक्तिगत आजादी समाप्त करते हुए आपातकाल लगा दिया। उसके बाद करिश्माई व्यक्तित्व वाले अटलजी ने सन 2000 में 17 दलों की सरकार बनाई तब व्यक्तित्व प्रभावी नहीं हो पाया। नरेन्द्र मोदी ने 2014 के चुनाव में अन्य मुद्दों के साथ स्थिर सरकार का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया, जिसे जनता ने माना। अब नेता उनका सेकुलर विकल्प खोज रहे हैं।   

लालू यादव, नवीन पटनायक, देवगौड़ा, नीतीश कुमार, अजीत सिंह के जनता दलों के सेकुलरवाद में अन्तर क्या है। इंदिरा गांधी ने एक बार कहा था समाजवाद की मेरी अपनी परिभाषा है, वैसे ही शायद इन नेताओं की सेकुलरवाद की अपनी-अपनी परिभाषा हैं। चुनावों के परिणाम जो भी हों प्रचार में अभद्र भाषा का प्रयोग बहुत बढ़ा है। राहुल गांधी ने मोदी पर कीचड़ फेंका तो भाजपा के लोग पूरी वंशावली का चिट्ठा खोलने के लिए तैयार हैं। आशा करनी चाहिए कि एक दिन आएगा जब हमारे देश के चुनाव भी शान्तिपूर्वक, सभ्य भाषा में मुद्दों के आधार पर लड़े जाएंगे और जनता के आदेश से शासन चलाएंगे।

देश के प्रखर समाजवादी नेता नेहरू के सोच से सन्तुष्ट नहीं हुए। धीरे धीरे डा अम्बेडकर, आचार्य जेबी कृपलानी, राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण आदि कांग्रेस से अलग हो गए। बनती बिगड़ती सोशलिस्ट पार्टियां शुद्ध समाजवादी चिन्तन के साथ मैदान में उतरीं परन्तु प्रधानता व्यक्ति की रही और नेहरू के व्यक्तित्व के सामने विचारधारा टिकी नहीं।  

Tags:    India 
Share it
Top