वर्तमान ग्रामीण विकास से गाँवों की मौलिकता जा रही है

वर्तमान ग्रामीण विकास से गाँवों की मौलिकता जा रही हैgaonconnection

बहुत पहले गाँव पर एक कविता पढ़ी थी ‘‘प्रकृति सुन्दरी की गोदी में खेल रहा तू शिशु सा कौन” लेकिन अब प्रकृति की सुन्दरता समाप्त हो रही है। सुन्दरता का एक पैमाना था हरियाली और दूसरा शान्त, स्वस्थ, सुखी जीवन। गाँव के जीवन में श्रम और मुफ्त ऊर्जा का प्रमुख योगदान रहता था। अब विकास का शहरी मॉडल, जिसमें पूंजी पर जोर और महंगी ऊर्जा पर निर्भरता रहती है। जिन्होंने चालीस और पचास के दशक के गाँव देखे थे उनका गाँव कहीं खो गया है ।   

गाँवों में बैल तो बचे नहीं, छोटे से छोटा किसान भी किराए के ट्रैक्टर से काम चलाता है, कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाता है। सामान ढोने के साधन बदल चुके हैं और अब वह ऊर्जा जो डीजल, पेट्रोल और बिजली की मोहताज नहीं थी, उपलब्ध नहीं है। शायद हम भूल रहे हैं कि पृथ्वी के अन्दर का पेट्रोलियम जिससे पेट्रोल, डीजल और मिट्टी का तेल बनता है और कोयला जिससे बिजली बनती है, समाप्त होने के कगार पर हैं।

मनोरंजन में पूंजी यानी पैसे का कोई काम नहीं था। लोकगीत, लोकनृत्य, नौटंकी, धोबिहा नाच, हुड़ुक की थाप पर नाचते गाते बधावा देना। नटों और बाजीगरों के करतब बिना पैसे के देखने को मिलते थे। अब गाँवों में भी रेडियो तक किसी कोने में दुबक कर बैठ गया है और टीवी अकड़ कर चौपाल में बैठा है। हमारे ग्रामीण नौजवान उस टीवी पर देखते हैं सिनेमा के सीरियल, फ़िल्में और नाच-गाने या फिर पांच दिन तक समय खाने वाला क्रिकेट मैच। पैसा है तो मनोरंजन है नहीं तो मन मार कर बैठे रहो ।

गाँव का आदमी जल्दी से पैसा कमाना चाहता है। दुधारू जानवरों को इंजेक्शन लगाकर ज्यादा दूध निकालता है और खेतों में अंग्रेजी खाद डालकर जल्दी ही अधिक पैदावार चाहता है। उसे ज्ञान नहीं कि इन सब के भयानक नतीजे सामने आ रहे हैं। इंजेक्शन द्वारा निकाले गए दूध का सेवन करके पुरुषों का पुरुषत्व तो चला ही जायगा, अस्तित्व भी खतरे में पड़ेगा। गाँवों का आर्थिक उतावलापन पूरे देश के लिए घातक होगा।

  देश आजाद हुआ तो पहली बार विकास का नेहरूवियन मॉडल हमारे सामने आया। गांधी मॉडल को परखा नहीं जा सका क्योंकि वह व्यवहार में लाया नहीं गया। आज के जो मॉडल चर्चा में हैं उनमें मोदी मॉडल जिसका उद्देश्य, प्राथमिकताएं और फोकस उभर कर आ रहे हैं। नेहरूवियन मॉडल एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था थी जिसमें वितरण पर जोर था, जल्दी से जल्दी विकसित देशों की कतार में खड़ा होने की चाहत थी। इस मॉडल में गाँव नहीं था, देश भूखा हो गया, अकाल पड़ा और विदेशी अनाज से पेट भरना पड़ा। 

नरेन्द्र मोदी के गुजरात मॉडल में अच्छी सड़कें, बिजली की उपलब्धता, विदेशी मुद्रा, उद्योगपतियों का रुझान, शिक्षा की अच्छी व्यवस्था, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार के साधन और अर्थव्यवस्था की तेज विकास दर प्रमुख हैं। प्रशासन की दक्षता और जाति धर्म का भेद किए बिना सबके लिए समान अवसर देने वाली योजनाएं भी लागू हैं। सोचना होगा क्या भय और भूख पर विजय मिली है और क्या गुजरात का इतिहास भारतीय स्तर पर लागू हो सकेगा। 

मॉडल जो भी हो, आवश्यकता होगी अधिकाधिक पूंजी निवेश, अच्छी कानून व्यवस्था, युवक-युवतियों को प्रशिक्षण, महिलाओं की विकास में भागीदारी और चुस्त दुरुस्त प्रशासन। गाँवों के लिए गांधी जी का विकास का मॉडल कुछ मामलों में अजमाया जाना चाहिए। स्वावलम्बी गाँव, जातिविहीन पंचायती राज, महिलाओं की सुनिश्चित भागीदारी, ऐसी परियोजनाएं जिनमें धर्म और जाति के आधार पर गिनती न करनी पड़े। 

प्रायः देखा गया है कि गेहूं और चना शहर की मंडियों में जाता है और वहां से दलिया, सूजी, मैदा, बेसन, जानवरों का चोकर बनकर सब वापस गाँव को आते हैं। इनके अलावा भी अन्य कृषि आधारित उत्पादों के कारखाने जैसे जॉम, जेली, पापड़, गुड़, तेल आदि गाँवों में ही बन सकते हैं लेकिन बनते शहरों में हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ेंगी, रोजगार मिलेंगे और ग्रामवासियों का शहरों की तरफ पलायन भी रुकेगा। 

इन सब के लिए किसी मॉडल की आवश्यकता नहीं है, ये सब परम्परागत उद्यम हैं जिन्हें शहरों से हटाकर गाँवों में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यदि मॉडल ही चाहिए तो आदर्श मॉडल वह होगा जो सामाजिक समरसता और मानव विकास के साथ भय और भूख मिटाने की क्षमता रखता हो। भौतिक विकास के साथ मानव विकास पर जोर हो। विकास का आदर्श मॉडल वह होगा जिसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः” का भाव छुपा हो।

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