Jan 19, 2026
दतिया से आए महेश शर्मा 1998 में झाबुआ पहुँचे। यहाँ उन्होंने आदिवासी समाज को “दया के पात्र” नहीं, आत्मनिर्भर नागरिक बनाने का सपना देखा।
Credit: Gaon Connection Network
धर्मपुरी गाँव में बना शिवगंगा गुरुकुल सिर्फ़ ट्रेनिंग सेंटर नहीं, गाँव के भविष्य की प्रयोगशाला बन गया। यहाँ खेती, पानी, रोज़गार और उद्यमिता सिखाई जाती है।
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पहाड़ी इलाका, सूखे खेत, खाली कुएँ। महेश शर्मा ने ग्रामीणों के साथ मिलकर तालाब बनाए, जल संरक्षण किया। पानी रुका… तो खेत हरे हुए और उम्मीदें लौट आईं।
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अब किसान सिर्फ़ बारिश पर निर्भर नहीं। देसी खाद, सही दूरी, जैविक खेती और कम रसायन- खेती अब समझदारी से होने लगी है।
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जहाँ पहले रोज़गार के लिए शहर जाना मजबूरी थी, आज गाँव में ही काम मिल रहा है। हस्तशिल्प, पशुपालन, पर्यटन और खेती, गाँव खुद रोज़गार पैदा कर रहे हैं।
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महेश शर्मा को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। लेकिन उनके लिए असली सम्मान है, झाबुआ के गाँवों में लौटता आत्मविश्वास। उनकी कोशिश है गाँव मज़बूत होंगे, तभी तो देश मज़बूत होगा।
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