यहां लगता है लाठियों का ख़ास मेला

यहां लगता है लाठियों का ख़ास मेला

सुल्तानपुर। अधिकतर हम सभी ने कपड़े, किताब, सजावट का समान, जानवरों का मेला देखा व सुना होगा लेकिन क्या आप ने कभी लाठियों का मेला सुना है? सुनने में लाठियों का मेला अजीब लग रहा होगा लेकिन यह सत्य है उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में विजयदशमी के दिन कई दशकों से पांडेय बाबा बाज़ार में लाठियों का मेला लगता है। पूर्वांचल के इस अनोखे मेले में प्रदेश के कई जिलों से लोग सिर्फ लाठियां ही खरीदने आते हैं।

जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर लखनऊ-बलिया हाइवे पर स्थित पांडेय बाबा धाम पर हर साल विजय दशमी को तीन दिवसीय मेला लगता है। इस धाम पर श्रद्धालु कौडिय़ां और धान चढ़ाते हैं। ऐसा मानना है कि इस चढ़ावे से पांडेयबाबा खुश होते हैं और उनके पशु बीमारियों से बचे रहते हैं। पूर्वान्चल का इकलौता लाठियों का मेला ऐतिहासिक रूप में जाना जाता है। प्रति वर्ष विजयदशमी के दिन लगने वाले इस मेले की धूम पूरे पूर्वांचल में दिखाई देती है। तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में जहां लोग पांडेय बाबा धाम पहुंचकर अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर शीश नवाते हैं और आने वाला हर श्रद्धालु यहां से  बाबा का प्रसाद समझ कर लाठियां ले जाना अपनी शान समझता है।

आधुनिकता के इस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में लाठी का जलवा आज भी कायम है। शायद यही वजह है कि लोग इनको खरीदने के पहले परखना जरूरी समझते हैं। लाठियों के कारीगर एक खास किस्म के बांस (लठियाहवा बांस) से ही लाठियों को तैयार करते हैं। लठियाहवा बांस की कोठी से काट कर इनकी साफ.-सफाई कर लाठियों को तैयार करते हैं । लाठी टेढ़ी न हो जाए इसके लिए काफी समय तक उस पर वजनदार वस्तुओं को रखा जाता है इस खास लाठी को बनाने के लिए साल भर कारीगरों को तैयारी करनी पड़ती हैं। उसके बाद इनको रगड़ कर चमकदार बनाया जाता है। कुछ एक कारीगर तो इनमें डिजाइन भी बनाते हैं।

लाठी खरीदने पहुंचे राजदेव सिंह (38 वर्ष) निवासी जुड़ापट्टी विकास क्षेत्र धनपतगंज ने बताया, ''यहां की लाठी बहुत मशहूर हैं। कई जिलों से लोग पांडेय बाबा धाम से केवल लाठी ही खरीदने आते हैं। इस अधुनिक युग में जहां लोग लाइसेंसी असलहे ले कर चलने में गर्व महसूस करते हैं वहीं गर्व इस लाठी को गांव में लेकर चलने में होती हैं।"

खूबसूरती के आधार पर तय होती है कीमत

छह फुट से लेकर आठ फुट तक की इन लाठियों की कीमत भी खूबसूरती के आधार पर तय की जाती है। एक लाठी की कीमत 50 रुपये से  लेकर 100 रुपये तक होती है। कई जिलों से लोग मेले में खासकर लाठियां खरीदने ही आते हैं।

कौन थे पांडेय बाबा

विकास क्षेत्र कूरेभार के रामदुलार (98 वर्ष)  ने बताया, ''पांडेय बाबा मेले की शुरुआत के बारे में पुराने लोगों का बताना है कि बाबा का नाम धर्ममंगल पान्डेय गांव बढ़ौना डीह था। बचपन में ही इनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया था। बचपन से ही ये सांसारिक मोह-माया से विरक्त हो गये थे। ये एक पेड़ के नीचे जप-तप करने लगे, इनकी ख्याति चारो ओर फैलने लगीं। एक बार एक राजकुमार ने मीठीपुर चौपरीया के आश्रम के पास एक कन्या से दुराचार करने की कोशिश की। बाबा ने राजकुमार को फटकार लगाते हुए भगा दिया था। राजकुमार ने अपने जल्लाद रधु को बाबा को मारने का आदेश दे दिया। बाबा के तेज को देखकर रधु उनके चरणों पर गिर कर राजकुमार के आदेश को बताया। बाबा ने जल्लाद को राजधर्म निभाने की सलाह दी। उनके खतम होने के कुछ वर्षों के अन्दर ही राजा का पूरा परिवार खत्म हो गया। बाद में ब्रह्म रूप में दिखाई देने लगे क्षेत्रीय लोगों ने उसी जगह पर पीपल का पेड़ लगा कर पूजा अर्चना करने लगे और विजय दशमी के दिन श्रद्धालुओं का तांता लगने लगा।"

रिपोर्टर - केडी शुक्ला 

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