यूपी को लगा ड्रग्स का डंक

यूपी को लगा ड्रग्स का डंकगाँव कनेक्शन

बाराबंकी/लखनऊ/मैनपुरी। तीस-पैंतीस मकानों का एक गाँव, गाँव के बाहर मुख्य मार्ग के दोनों ओर बड़े-बड़े बाग। बागों में खड़े पुराने पेड़ों के नीचे लोगों को झुंड जो कि इतना छुपा था कि ध्यान से देखें तो नज़र आएगा और झुंड से निकलता स्मैक का धुआं। ये नजारा है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे जि़ले बाराबंकी का। 

लेकिन थोड़ी खोज-बीन करके ही अब ऐेसे नज़ारे प्रदेश के दजर्नों जि़लों में देखने को मिल जाएंगे। उत्तर प्रदेश में नशे का व्यापार इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है कि अब नशे के खिलाफ लड़ने वाले अधिकारी यह तक कहने लगे हैं कि नशाखोरी के लिए देश में सबसे ज़्यादा बदनाम पंजाब के बाद, उत्तर प्रदेश अब दूसरे स्थान पर पहुंचा जा रहा है। हाल ही में पंजाब के पठानकोट में हुए हमले में आतंकियों द्वारा नशीले पदार्थों के कारोबार का सहारा लेने की खबरों के बाद अब यह भी साबित हो चुका है कि ये कारोबार देश की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा है। बावजूद इसके यह व्यापार गली, चौराहों और खेतों में बिना रोक-टोक फल-फूल रहे हैं।

बाराबंकी जि़ला मुख्यालय से उत्तर दिशा में स्थित हरख ब्लॉक में गाँव टिकरा उस्मा है। गाँव कनेक्शन संवाददाता जब इस गाँव में पहुंचा तो पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा था। गाँव में कुछ बच्चे खेल रहे थे। प्रधान के बारे में पता किया गया तो पता चला कि प्रधान मुकीम हरख गए हैं। फोन से उनसे बात की गई तो उन्होंने बताया कि अब तो यहां अफीम आदि की खेती नहीं होती। बचपन में होती थी, पुलिस ने कार्रवाई की तो बंद कर दी गई। ग्राम प्रधान गाँव में अन्य किसी भी नशीले पदार्थ के लेन-देन से मुकर गए।

हालांकि गाँव के बाहर गाय-भैंसों को चरा रहे एक ग्रामीण रामकुमार (काल्पनिक) ने बताया, ''यहां पर जमकर स्मैक बनती है। कई लोग इसी चक्कर में गाँव छोड़कर जा चुके हैं। हमारे पास पैसा नहीं है, नहीं तो यहां कौन रहना चाहेगा।" गाँव कनेक्शन संवाददाता ने जब उससे पूछा, स्मैक बनती कहां पर है तो उसने बताया, ''यहीं गाँव में ही बनता है मारफीन, दिन में कोई नहीं दिखता, पूरी रात मारफीन बनती है। यहीं नहीं आस-पास गाँव के लोगों के अलावा लखनऊ, हरदोई, रायबरेली आदि जि़लों के लोग भी यहीं बाग में आए दिन आते हैं और मारफीन पीते हैं।"

उत्तर प्रदेश नारकोटिक्स ब्यूरो के अनुसार, प्रदेश में सबसे अधिक गांजा, चरस और हेरोइन का प्रयोग हो रहा है। ''नेपाल बार्डर से सटे जि़लों गोरखपुर, बहराइच, बलरामपुर आदि से नशीले पदार्थों की तस्करी की जा रही है। बरेली धीरे-धीरे हेरोइन का हब बनता जा रहा है। हम लगातार नशीले पदार्थों पर अंकुश लगाने के लिए अभियान चला रहे हैं। पंजाब के बाद अब यूपी में सबसे अधिक नशीले पदार्थों का प्रयोग हो रहा है," वीरेन्द्र कुमार, क्षेत्रीय निदेशक, नार्कोटिक्स ब्यूरो, लखनऊ ने कहा।

नशाखोरी के खिलाफ काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम के मुताबिक देशभर में ज़ब्त किए जाने वाले नशीले पदार्थों का लगभग 60 फीसदी हिस्सा अकेले पंजाब से ज़ब्त किया जाता है। इस तस्वीर का एक और भयावह पक्ष 'इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज' के एक रिसर्च पेपर ने बताया कि नशाखोरों में से ज़्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। उत्तर प्रदेश में भी यही स्थिति उभर रही है। कानून व्यवस्था की पहुंच से मीलों दूर के गाँवों में नशीले पदार्थ अब बागों और खेतों में बिकने लगे हैं। 

बाराबंकी जि़ले में धनोखर खोया मंडी है। यहीं पर धनोखर तालाब है। तालाब से सटी हुई मड़इया के आस-पास दिनभर स्मैकियों का जमावड़ा लगा रहता है। यहां मौजूद दशहरा बाग निवासी सुनील श्रीवास्तव को स्मैक की लत पड़ चुकी है। वह बताता है, ''भइया, क्या किया जा सकता है, अब तो ऐसी आदत बन गई है कि बिना एक डोज़ लिए शरीर उठता ही नहीं। मेहनत-मजदूरी करके जितना भी कमाते हैं सब इसी में चला जाता है।" स्मैक कहां मिलती है इसके जवाब में सुनील ने बताया, ''यहां इसे मारफीन कहते हैं, यहीं मड़इया से मिल जाती है, इन्हें पता कि हम लेते हैं यहां से।" नशे की लत के चलते कैसे आपराधिक मामले बढ़ने लगते हैं, इसकी गवाही तो खुद एक नशाखोर ने ही दी। बाराबंकी में मारफीन की लत का शिकार एक युवक ने बताया कि उन्हें हर हाल में दिन में दो बार मारफीन लेनी पड़ती है। पैसा न होने पर ये लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं क्योंकि अगर उस समय अगर इन्हें ड्रग्स न मिला तो पूरा शरीर टेढ़ा होने लगता है। इसलिए साइकिल चोरी, मेनहोल के ढक्कन, पार्कों पर लगी लोहे की बेंच आदि जो भी सामान तुरंत चोरी कर सकते हैं, पैसा न होने के कारण चोरी कर लेते हैं।

क्या हैं नशीले पदार्थ

नशीला पदार्थ एक ऐसा रासायनिक पदार्थ होता है जो शारीरिक और मानसिक कार्य प्रणाली बदलने के लिए लिया जाता है। जो अस्थायी तौर पर कुछ समय के लिए तनावमुक्त और हल्का कर देता है, जिससे व्यक्ति आनंदित महसूस करता है। 

शराब, गुटका, खैनी, गांजा, भांग, चरस, अफीम, सुलफा, तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी, सिगार, हुक्का, कोकीन, ब्राउन शुगर, हेरोइन। यहां तक कि ज्यादा मात्रा में चाय या कॉफी भी नशीली होती है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में लगभग पांच करोड़ लोग मादक पदार्थों के सेवन से जुड़े हैं। 

नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले दुष्प्रभाव

नशीले पदार्थों के प्रयोग से व्यक्ति होश में नहीं रहता और किसी भी दुर्घटना का शिकार हो सकता है जिससे उसे गंभीर चोट लग सकती है या मृत्यु भी हो सकती है। 

-नशे के चलते व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है जिससे उसका शरीर बीमारियों और संक्रमणों का घर बन सकता है।

-लिवर को क्षति पहुंचती है।

-व्यक्ति को स्ट्रोक आ सकता है या मस्तिष्क में क्षति पहुंच सकती है।

-भूख खत्म हो सकती है, शरीर के तापमान में अस्थिरता आ सकती है।

-आंखों में लालपन व धुंधलापन आ सकता है।

-व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, अनिद्रा का शिकार हो जाता है।

-सीरिंज से लिए जाने वाले नशीले पदार्थों में, कई लोगों के बीच एक सीरिंज के प्रयोग से एड्स का खतरा भी होता है।

दो हज़ार रुपए की एक ग्राम हेरोइन

गैरकानूनी ढंग से हेरोइन मात्र दो हजार रुपए प्रति ग्राम के भाव से बार्डर एरिया से पैकेटों के रूप में पंजाब में आता है जिसके बाद बड़े तस्कर छोटे तस्करों को सप्लाई करते हैं। इसके बाद खुदरा बिक्री इस जानलेवा हेरोइन का मूल्य 4 से 5 हजार रुपए प्रति ग्राम हो जाता है।  

खुलेआम चौराहों पर गुटखा के पाउच में बिक रहा नशीला पदार्थ

लखनऊ से लगभग 200 किमी दूर पश्चिम दिशा में मैनपुरी जि़ले की सर्दी की शाम थी। सर्द हवाएं बदन को ठिठोर रही थीं। तभी फटे से एक कंबल में खुद को लपेटे, नंगे पैर वह बेसुध सरपट सड़क पर चला जा रहा था। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उसके पैर देवी रोड की एक दुकान पर जाकर ठिठक गए। 

आस-पास खड़े लोग मैले-कुचैले कंबल में लिपटे व्यक्ति को देखकर दूर हट गए। व्यक्ति ने अपनी शर्ट की जेब से कुछ रुपए निकाले और बंद मुट्ठी में दबाकर सीधे दुकानदार की हथेली पर रख दिए। दुकानदार भी मानो उसी का इंतजार कर रहा था। न नाम पूछा और रूपयों की वजह, बस गद्दी के नीचे से एक पुड़िया (गुटखे का पाउच) निकाली और उसे पकड़ा दिया। 200 रुपए में कागज की छोटी सी पुडिय़ा। माजरा समझ नहीं आया, तो गाँव कनेक्शन संवाददाता ने भी कंबल में लिपटे उस व्यक्ति की खासियत जाननी चाही। कुछ रुपयों का लालच दिया तो व्यक्ति ने पुड़िया का राज खोल दिया। बताया कि इसमें सफेद पाउडर है जिससे सारी थकान दूर हो जाती है। कंबल में लिपटा वह व्यक्ति स्मैक पीने का आदी है। रोज शहर के मुख्य चौराहों में से एक देवी रोड की एक दुकान से ड्रग्स खरीदकर ले जाता है। 

इस संबंध में जब सीओ सिटी शैलेंद्र लाल से बात की गई तो उन्होंने टालमटोल भरे रवैये में मामले को बिना गंभीरता से लिए रिपोर्टर से बोला, ''आप हमारे साथ गाड़ी में चलो। अभी हम कप्तान साहब के यहां हैं, यहां आ जाओ, साथ चलते हैं, चार-पांच लाठी मारकर बंद कर देते हैं उन सबको।"

नशीले पदार्थों के कारोबार के प्रति इस पुलिसिया रवैये के कारण ही कारोबार तेज़ी से फल-फूल रहा है। वर्ष 2014 में तब के पुलिस महानिदेशक ने सभी जिलों के थाना और चौकी प्रभारियों को निर्देश दिए थे कि वे अपने क्षेत्रों में चल रहे नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करें। लेकिन, डीजीपी का ये फरमान जि़ले में सिर्फ फाइलों में दफन होकर रह गया। जि़ले के अन्य क्षेत्र तो जाने दीजिए मैनपुरी शहर के ही मुख्य स्थानों देवी रोड, मदार दरवाजा, चुंगी, घंटाघर, कृृष्णा टाकीज रोड, भांवत चौराहा, खरपरी, करहल रोड और दीवानी मार्ग में गांजा व अफीम के साथ-साथ स्मैक जैसे महंगे नशीले पदार्थ की खरीद फरोख्त भी जोर-शोर से होने लगी है। 

मैनपुरी जि़ले की ही बात है, वर्ष 2015 में जिले में आयोजित कराई गई सेना भर्ती रैली में दौड़ में शामिल होने आए अभ्यर्थियों की जब तलाशी हुई तो बड़े पैमाने पर नशीली दवाइयां, प्रतिबंधित इंजेक्शन, ऑयल और तमाम प्रकार के नशीले पदार्थ बरामद हुए थे। बड़ी तादाद में बरामद हुई इस खेप को सेना के जवानों ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में नष्ट करा दिया था।

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