इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र के अन्तिम शब्द- 'सर ने कहा जाके कहीं मरो'

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रजनीकांत यादव ने 28 जनवरी 2019 को हॉस्टल नहीं मिलने के कारण आत्महत्या की थी। बूढ़े मां-बाप ने 4 दिन तक किया आमरण अनशन पर प्रशासन ने नहीं ली कोई खोज-खबर। आखिर में मांगे मान तो ली हैं लेकिन क्या वो पूरी हो पाएंगी?

Pragya BhartiPragya Bharti   2 March 2019 2:15 PM GMT

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र के अन्तिम शब्द-

लखनऊ।

"रोज़ यही सुनते-सुनते कि कब जाओगे, कब मरोगे। उधर हॉस्टल के लिए पता करता था तो हॉस्टल अधीक्षक हौसला सिंह डांट कर भगा देते, कल जब गया और कहा कि मेरी तबीयत खराब है सर तो कहे हम क्या करें जाके 'कहीं मरो'।(धीरे से)"

ये अन्तिम शब्द थे रजनीकांत यादव के। रजनीकांत, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक(बी.ए) प्रथम वर्ष का छात्र था। 28 जनवरी 2019 को छात्रावास नहीं मिलने के कारण उसने आत्महत्या कर ली। इससे पहले एक सुसाइड नोट लिखा जिसमें छात्रावास प्रशासन और मकान मालिक को अपनी आत्महत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराया। विश्वविद्यालय में इससे पहले भी कई छात्र छात्रावास नहीं मिलने के कारण इस तरह के कदम उठा चुके हैं।

रजनीकांत द्वारा लिखा गया सुसाइड लेटर। साभार- नेहा यादव

रजनीकांत की आत्महत्या के एक महीने बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। विश्वविद्यालय ने ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि रजनीकांत मेरिट लिस्ट में नहीं थे तो उन्हें छात्रावास नहीं मिलता। रजनीकांत उत्तर प्रदेश राज्य के आजमगढ़ जिले में नर्वी पोस्ट के गोठांव गांव से था। माता-पिता गरीब हैं, परिवार की माली हालत बहुत ठीक नहीं है। कार्रवाई नहीं होने के कारण उसके माता-पिता ने विश्वविद्यालय में 4 दिन तक आमरण अनशन किया। वह डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर के सामने 26 फरवरी से 1 मार्च तक अनशन पर बैठे थे। इस अनशन में रजनीकांत के माता-पिता को सात और बच्चों ने समर्थन दिया।

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रजनीकांत के माता-पिता के साथ अनशन पर बैठीं न्यूट्रीशन साइंस में पीएचडी की द्वितीय वर्ष की छात्रा नेहा यादव गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, "चार दिनों में विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई। डीएसडब्ल्यू और चीफ प्रॉक्टर बार-बार आए लेकिन उन्होंने माता-पिता और छात्रों की बात सुनने के बजाए उन्हीं को डराया-धमकाया। बच्चों को कहा कि उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा। प्रशासन द्वारा हमारे खिलाफ अराजकता फैलाने की एफआईआर भी दर्ज़ कराई गई।"

नेहा आगे कहती हैं, "पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। छात्रावास के अधीक्षक हौसला सिंह और जिस मकानमालिक के यहां रजनीकांत रहता था उनके खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 504 के तहत एफआईआर दर्ज़ है लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।"

एक मार्च को जहां देश कमांडर अभिनन्दन के वापस लौट आने की खुशियां मना रहा था वहीं रजनीकांत के माता-पिता इस आश्वासन के इंतज़ार में थे कि उनके बेटे की मौत ज़ाया नहीं गई। शुक्रवार देर शाम उनका इंतज़ार खत्म हुआ और चीफ प्रॉक्टर और डीएसडब्ल्यू ने आकर उनकी मांगे मान लीं। लिखित तौर पर उन्हें बताया गया कि उनकी तमाम मांगें मान ली गई हैं और अगले 15 दिन के भीतर मकान मालिक और छात्रावास अधीक्षक की गिरफ्तारी होगी। साथ ही विश्वविद्यालय रजनीकांत के माता-पिता को मुआवज़ा देने के लिए सरकार को पत्र भी लिखेगा।

अनशन खत्म होने के बाद की तस्वीर। रजनीकांत के माता-पिता की हालत बहुत खराब थी। दोनों अस्पताल में भर्ती रहे। साथ बैठे बच्चों का शुगर लेवल भी डाउन हो गया था। साभार- नेहा यादव

विश्वविद्यालय प्रशासन ने लिखित रूप से ये मांगे मान ली हैं-

  1. वर्ष 2019-20 सत्र में छात्रावास में दाखिले की प्रक्रिया विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया के साथ ही होगी।
  2. विद्यार्थियों के शैक्षिक मार्गदर्शन और विश्वविद्यालय सम्बन्धी अन्य समस्याओं के समाधान के लिए दो प्रकोष्ठों (छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग) की स्थापना होगी।
  3. जो छात्रावास बन रहे हैं उनके बनने की अनुमानित तिथि तय की गई है।
  4. छात्र रजनीकांत यादव (मृत) के परिवार को क्षतिपूर्ति के लिए सरकार को अनुरोध पत्र लिखा जाएगा।
  5. रेन्ट कन्ट्रोल और डेलीगेसी भत्ता हेतू जिलाधिकारी को पत्र।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी पत्र। साभार- नेहा यादव

रजनीकांत के माता-पिता और उनके समर्थन में बैठे बच्चों की मांग मान ली गई है पर 127 साल पुराने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रावास हज़ार में से केवल एक समस्या है। छात्रसंघ महामंत्री शिवम सिंह कहते हैं-

"यहां हर साल 2-3 बच्चे छात्रावास नहीं मिलने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। हर साल छह-छह महीने बाद, साल भर बाद तक छात्रावास मिलता है। बच्चों को अगर अप्रैल में छात्रावास मिलेगा तो वो जुलाई-अगस्त तक कैसे खाली करेंगे? फीस तो साल भर की लेते हैं तो 4 महीने में कोई हॉस्टल खाली क्यों करेगा?"

शिवम एम. ए. राजनीतिक विज्ञान में प्रथम वर्ष के छात्र हैं। वो बताते हैं कि विश्वविद्यालय में लगभग 36000 विद्यार्थी हैं उनमें से केवल दो से तीन प्रतिशत को ही छात्रावास मिल पाता है। लड़कियों के लिए पांच छात्रावास है, वहीं लड़कों के लिए आठ हैं। इसके अलवा ट्रस्ट के भी चार छात्रावास हैं। इन्हीं में से एक केपीयूसी (कायस्थ पाठशाला यूनिवर्सिटी कॉलेज) में रजनीकांत दाखिले के लिए कोशिश कर रहा था। ए. एन झा हॉस्टल में रहने वाले एम. ए. हिन्दी प्रथम वर्ष के छात्र विवेक चौहान की भी कुछ दिन पहले मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम में पता चला कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई। उन्हें हफ्ते भर पहले ही छात्रावास मिला था।

अनशन पर बैठे रजनीकांत के माता-पिता और अन्य छात्र। साभार- नेहा यादव

शिवम ने बताया, "पिछले साल एस. एस. पॉल नाम के एम. टेक कर रहे बच्चे ने भी आत्महत्या कर ली थी। ऐसा हर साल होता है लेकिन किसी भी छात्र ने कभी कोई शिकायत नहीं की इसलिए पता नहीं चलता। इस बार ये मामला सबके सामने है क्योंकि रजनीकांत ने सुसाइड नोट लिखकर प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराया था। अगर शिकायत की भी जाए तो उस पर कोई सुनवाई नहीं होती है। प्रशासन की शय पर ही यहां छात्र बाहुबली बने बैठे हैं।"

एम. ए. प्रथम वर्ष के छात्र शक्ति गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं-

"केन्द्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते 60 प्रतिशत विद्यार्थियों को छात्रावास मिलना चाहिए लेकिन मुश्किल से 15 प्रतिशत छात्रों को ही मिल पाता है। साथ ही वक्त पर हॉस्टल नहीं मिलता है। कई दफा दाखिले के साल भर बाद तक हॉस्टल नहीं मिलता है। प्रशासन ने अराजकता का माहौल बना रखा है।"

गाँव कनेक्शन ने विश्वविद्यालय प्रशासन से बात करने की कोशिश की। पीआरओ, प्रॉक्टर बोर्ड के सदस्यों और कुलपति को कई बार फोन किया पर किसी का भी कोई जवाब नहीं मिला।

अलग-अलग विद्यार्थियों से बात करने पर पता चलता है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र अवैध रूप से छात्रावास में रहते हैं। उनका एडमिशन खत्म हो जाता है तब भी वो छात्रावास खाली नहीं करते। शक्ति कहते हैं, "विश्वविद्यालय प्रशासन कहता है कि हम तो लिख कर दे देते हैं जिला प्रशासन को पर वो लोग कार्रवाई नहीं करते। हॉस्टलों में मठाधीश रहते हैं, अवैध कब्ज़ा रहता है। जिला प्रशासन वक्त पर पुलिस नहीं मुहैया कराता है, कभी कहता है कि कुंभ है, कभी कहता है कि माघ मेला है। साल 2014 से प्रशासन की कार्रवाई और पुलिस के आने के बाद ही छात्र हॉस्टल खाली करते हैं वरना नहीं करते। इसका एक कारण ये भी है कि उन्हें हॉस्टल मिलता ही बहुत लेट है और प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता।"

कई बार धरना देने के बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ नहीं किया। साभार- नेहा यादव

प्रशासन के रवैये के बारे में महामंत्री शिवम सिंह भी यही कहते हैं। वो बताते हैं कि छात्रसंघ के पदाधिकारियों से तक वायस चांसलर नहीं मिलते हैं। साल-साल भर बीत जाता है लेकिन प्रशासन की तरफ से कुछ नहीं होता। शिवम सिंह ये भी बताते हैं कि हॉस्टल में न तो मेस है, न पुस्तकालय, न ही स्वास्थ्य सुविधा। इतनी बड़ा विश्वविद्यालय होने के बाद भी पूरे कैम्पस में एक भी अस्पताल नहीं है। एम्बुलेंस के नाम पर एक ओमनी वैन है वो भी 7-8 किमी दूर सरकारी अस्पताल ले जाती है। नियमों की धज्जियां वहां प्रशासन के समर्थन से ही उड़ती है।

शिवम कहते हैं-

"हम चाहते हैं कि विश्वविद्यालय में हॉस्टल आवंटन को लेकर सही नियम हों और उनका पालन हो; स्वास्थ्य सुविधाएं हों, विश्वविद्यालय में जो पुस्तकालय है उसकी स्थिति सुधरे वहां आप किसी किताब को देखें तो 40 के बाद सीधे 43 पेज खुलता है, किताबों के नाम पर कुछ नहीं है। छात्रावासों में मेस हो, पुस्तकालय हो, खेलने के लिए मैदान हो, छात्रों की काउंसलिंग के लिए काउंसलर हो, वायस चांसलर समय-समय पर छात्रों से बात करें।"

वो बताते हैं कि इसके लिए कई बार छात्रसंघ ने छात्रों के साथ मिलकर धरना भी दिया है लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। लोग छात्रसंघ को गलत समझते हैं पर प्रशासन नहीं सुनेगा तो छात्रसंघ क्या कर पाएगा। छात्रसंघ के लिए जो बजट आता है हर साल वो भी विश्वविद्यालय प्रशासन हजम कर जाता है। विद्यार्थियों के लिए कुछ भी इस्तेमाल नहीं हो पाता। ऐसे में अराजकता का माहौल नहीं होगा तो क्या होगा।

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विश्वविद्यालयों से कई बार छात्रों की कई तरह के दबावों के कारण आत्महत्या करने की खबरें आती हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वैमुला की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पीएचडी के एक छात्र ने जातिगत शोषण के चलते आत्महत्या कर ली। उससे पहले भी कई छात्र वहां आत्महत्या कर चुके थे। आईआईटी और प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट्स से भी हर साल बढ़ती छात्रों की आत्महत्या की खबरें सामने आती हैं।

मार्च 2018 में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम ने भारतीय संसद को बताया था कि साल 2014 से 2016 के बीच 26,500 बच्चों ने विश्वविद्यालयों में पढ़ते हुए आत्महत्या की। इनमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य सबसे आगे हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने रजनीकांत के माता-पिता की बात तो मान ली है लेकिन वो पूरी होंगी कि नहीं इस पर सवाल है। छात्रसंघ महामंत्री भी कहते हैं कि कहा तो बहुत कुछ जाता है लेकिन सवाल तो ये है कि वो पूरा हो।

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