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बिहार के ‘सैनिटेशन हीरो’ बने आईएएस राहुल कुमार

भारत को खुले से शौच मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। कहीं 'रोको-टोको', सीटी मारो, तो कहीं ढोल बजाकर लोगों को खुले में शौच न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। परिणाम भी अच्छे हैं। सिक्किम, हिमाचल प्रदेश के बाद केरल अब खुले में शौच मुक्त राज्य बन गया है।

यूपी, बिहार, एमपी भी जल्द इस कड़ी में शामिल हो जाएंगे। राज्य सरकारें जमीनी स्तर पर इस मुहिम को सफल बनाने के लिए प्रयास कर रही हैं। इस कड़ी में कई जिलों के कमिश्नर और डीएम तक अभियान में सराहनीय योगदान कर रहे हैं।

ऐसे ही एक आईएएस हैं राहुल कुमार जिन्हें माइक्रोब्लॉगिंग साइट टि्वटर पर 'सैनिटेशन हीरो' कहा जा रहा है। कारण, बिहार के गोपालगंज जिले में बतौर डीएम राहुल ने इस अभियान को जन आंदोलन में बदल दिया है। गाँव कनेक्शन से फोन पर हुई बातचीत में उन्होंने इस जन आंदोलन की शुरुआती दिक्कतों और कैसे गोपालगंज खुले में शौच मुक्त बन रहा है, इस पर तफसील से जानकारी दी। पेश है बातचीत के मुख्य अंश:

गोपालगंज खुले से शौच मुक्त कब बनेगा?

जिले को पूरी तरह शौचमुक्त बनाने से पहले हम लोगों की सोच बदल रहे हैं। शुरुआत में मैंने गाँव-गाँव चौपाल व पंचायत में लोगों से बातचीत की। वे मान भी गए। गंदगी और फिर गाँव में बीमारी फैलने की बात भी स्वीकार की। पर आदत तो आदत। फिर हमने गाँव में रात में ठहरना शुरू किया। भोर में मैं और मेरे दल के सदस्य निकलते और गाँव के बड़े-बुजुर्गों से बात करते। क्योंकि इसके बाद उनसे संपर्क नहीं हो पाता था। वे खेतों में काम करने चले जाते थे। धीरे-धीरे ग्रामीणों से संपर्क बढ़ा और लोग खुले में शौच से परहेज करने लगे हैं। लेकिन इतना काफी नहीं था।

ग्रामीणों खासकर महिलाओं की सोच कैसे बदली?

मुझे एक गाँव याद है। वहां एक विधवा महिला के घर में शौचालय नहीं था। वह शौच के लिए बाहर जाती थी। मैं रात में गाँव में ही रुक गया और भोर में फावड़े से एक गड‍्ढा खोदने लगा। महिला ने मुझसे इसका कारण पूछा तो मैंने उसे बताया कि खुले में शौच से गंदगी और बीमारी फैलती है। उस महिला को मेरी बात समझ आई और अब वह गाँव में लोगों को खुले में शौच न करने के प्रति जागरूक कर रही है। यहीं से मुझे अहसास हुआ कि लोगों को खुले में शौच से मना करने से ज्यादा जरूरी सोच पर चोट करना है। वहीं से इस अभियान को जन आंदोलन बनाने की शुरुआत हुई।

दिसंबर 2015 की इस तस्वीर में डीएम राहुल कुमार ने एक स्कूल में मिड डे मील खाकर लोगों की एक भ्रांति दूर की थी। दरअसल लोगों ने यहां खाना बनाने वाली सुनीता को काम से यह कहकर हटा दिया था कि वह ‘अपशगुन’ क्योंकि वह विधवा है। लेकिन डीएम ने खुद उसके हाथ का बना खाना खाकर लोगों का यह अंधविश्वास तो़ड़ दिया और सुनीता को दोबारा नौकरी पर बहाल कर दिया।

जन आंदोलन को आगे बढ़ाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी होगी?

मुझे याद है बिहार में एक वक्त था जब कोई लड़की साइकिल चलाते दिख जाए तो मोहल्ले में पंचायत होने लगती थी कि लड़की हाथ से निकल गई। बाद में इस मिथक को तोड़ने के लिए प्रयास हुए। सरकार ने लड़कियों की साक्षरता बढ़ाने के लिए साइकिल बांटी। इसका असर भी हुआ, लड़कियों के साक्षरता स्तर में खासी बढ़ोतरी दर्ज हुई। मैंने खुले में शौच न करने की जागरूकता की मुहिम को ऐसे ही जन आंदोलन का रूप देने की रणनीति बनाई।

लोगों को जागरूक करने की रणनीति किस हद तक सफल हो रही है?

छह माह में मुझे अहसास हो गया कि लोगों को जागरूक करना आसान नहीं है। लोगों की मूलभूत जरूरतों में रोटी, कपड़ा, मकान था। शौचालय उनकी प्राथमिकता कहीं से नहीं था। हम शौच से मुक्त गाँव की संकल्पना की बात करते तो लोग हमसे पूछते-हमारे बच्चों को नौकरी कैसे मिलेगी। गाँव के आसपास अस्पताल नहीं है। मैंने लोगों से एक सवाल किया- अगर कोई गरीब है तो क्या वह अपने बाल-बच्चों की शादी नहीं करता? तो घर में शौचालय को हम क्यों नजरअंदाज कर रहे हैं। इसके बाद ही लोगों में बदलाव दिखने लगा।

गाँववाले कैसे मददगार बन रहे?

हमने गाँव-गाँव स्वयंसेवी चुने हैं। गाँव की ही लड़कियों की निगरानी समिति बनाई है। उनको गाँव को शौच मुक्त बनाने के स्लोगन लिखी टीशर्ट दी है। निगरानी समिति की सदस्य भोर में वही टीशर्ट पहन कर सीटी लेकर निकलती हैं और जो कोई भी बाहर शौच के लिए जाता दिख जाए है उसे ऐसा न करने के लिए जागरूक करती हैं। अब लगभग हर गाँव में निगरानी समिति लोगों को जागरूक कर रही है।

यह जन आंदोलन आगे कैसे बढ़ेगा?

गाँव में जिन घरों में शौचालय नहीं है वहां महिलाओं को सबसे ज्यादा दिक्कत आती है। उजाले में बाहर नहीं निकल सकतीं। रात के अंधेरे में निकलने में कई तरह के जोखिम हैं। मैंने उन्हें बताया कि अगर घर में शौचालय होगा तो उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी। यह बात उनकी समझ में आई।

घर में शौचालय बनाने के लिए सरकारी मदद कब दी गई?

जब मैं गाँव-गाँव जाकर लोगों को घर में शौचालय बनवाने की बात करता तो लोग धन का अभाव बताकर बात टाल जाते। सरकारी मदद मांगते। मैंने उसी समय तय किया कि पहले पूरे गाँव को खुले में शौच से मुक्त किया जाए उसके बाद ही सरकारी मदद मुहैया कराई जाए। पहले सरकारी मदद दे दी तो उसका दुरुपयोग हो जाएगा, जैसा आमतौर पर होता ही है। मैंने लोगों को घर में शौचालय बनवाने के लिए राजी किया। ज्यादातर गाँव में हमने खुद ही कुछ शौचालय बनवाए। बिना सरकारी मदद के गाँववाले घर में शौचालय बनवाने को शुरुआत में तैयार नहीं हुए लेकिन धीरे-धीरे इसे समर्थन मिलने लगा।