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'अमेरिका से कृषि आयात देश हित में नहीं'

Pushpendra SinghPushpendra Singh   21 Feb 2020 11:39 AM GMT

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने पहले आधिकारिक दौरे पर भारत आने जा रहे हैं। इस अवसर पर भारत और अमेरिका के बीच कई व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। खबर है कि इस मौके पर अमेरिकी कृषि उत्पादों- जैसे डेयरी, पोल्ट्री व अन्य कृषि जिंसों के लिए भारत में आयात का रास्ता आसान हो जाएगा। इससे हमारे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। हालांकि ट्रम्प ने भारत के साथ अभी कोई बड़ा समझौता होने से बेशक इनकार कर दिया हो परन्तु हमें अपने कृषि क्षेत्र में संभावित अमरीकी आयात से होने वाले लाभ-हानि का आंकलन अवश्य करना चाहिए।

पिछले पांच वर्षों में हमारी औसत कृषि विकास दर तीन प्रतिशत से नीचे रही है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट से जूझ रही है। अमेरिका चाहता है कि उसके कृषि उत्पादों के लिए भारत अपने बाज़ार खोल दे। इस विषय में भारत पर दबाव बनाने के लिए ट्रम्प ने पिछले साल भारत को 1970 से मिल रहा विशेष व्यापार दर्जा (जीएसपी) भी समाप्त कर दिया था। इसी प्रकार पिछले दिनों अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत का मिल रहा 'विकासशील देश' का दर्जा भी समाप्त कर दिया। इससे हमें विश्व व्यापार में मिलने वाली कुछ विशेष सुविधाएं और अधिकार भी समाप्त हो गए। इस प्रकार अमेरिका की रणनीति है कि वह दबाव बनाकर अपने हक में भारत से व्यापार समझौते कर ले। भारत के लिए भी इस दौरे में अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। कुछ माह पहले ही आरसीईपी समझौते के टलने से हमारे किसानों ने राहत की सांस ली थी, अब फिर से कृषि उत्पादों के आयात की एक नई मुसीबत खड़ी हो सकती है।

2018 में भारत-अमेरिका के बीच लगभग 143 अरब डॉलर (लगभग दस लाख करोड़ रुपये) का आपसी व्यापार हुआ। अमेरिका भारत के साथ अपने बढ़ते व्यापार घाटे से भी चिंतित है। 2018 में अमेरिका का भारत के साथ लगभग 25 अरब डॉलर का व्यापार घाटा था। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके डेयरी उत्पादों, पोल्ट्री उत्पादों, टर्की, ब्लूबेरी, चेरी, पोर्क, बादाम आदि उत्पादों पर लगने वाले आयात शुल्क को घटा दे। परन्तु भारत के किसान अमेरिकी किसानों के उत्पादों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते क्योंकि अमेरिका अपने किसानों को हर साल मोटी सब्सिडी और बहुत बड़ा बजट आवंटन देता है।

हमारा 2020-21 का कृषि मंत्रालय का बजट मात्र 1.43 लाख करोड़ रुपये है, जबकि अमेरिका के कृषि विभाग (यूएसडीए) का 2020 का बजट 155 अरब डॉलर (लगभग 11 लाख करोड़ रुपये) का है। हमारे देश में औसतन प्रति किसान 227 डॉलर प्रति वर्ष (लगभग 16,000 रुपये) की सब्सिडी दी जाती है, जबकि अमेरिका अपने किसानों को औसतन 60,600 डॉलर (लगभग 43 लाख रुपये) प्रति किसान प्रति वर्ष की सब्सिडी देता है। 2018 में अमेरिका ने अपने कुल 430 अरब डॉलर (लगभग 31 लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों में से लगभग एक-तिहाई यानी 140 अरब डॉलर (लगभग 10 लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था। अर्थात अमेरिका की कृषि अर्थव्यवस्था निर्यात पर बहुत ज्यादा निर्भर है।

प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'द इकोनॉमिस्ट' में छपे एक लेख के अनुसार अमेरिका में दुग्ध उत्पादन बढ़ने, परन्तु दूध की कीमतें दशकों से लगातार गिरने के कारण वहां के डेयरी किसानों की हालत खराब है, और वो मुख्यतः सब्सिडी पर ही निर्भर हैं। अमेरिकी नागरिक दूध के उपयोग से भी विमुख हो रहे हैं। 1975 में अमेरिकियों की दूध की प्रति व्यक्ति खपत 109 लीटर प्रति वर्ष थी, जो 2018 में गिरकर 64 लीटर प्रति वर्ष पर आ गई है। अमेरिका अपने डेयरी उत्पादों का लगभग 15-18 प्रतिशत निर्यात करता था परन्तु चीन, मेक्सिको व अन्य देशों को होने वाला निर्यात व्यापार युद्ध आदि विभिन्न कारणों से घट गया है। अतः अमेरिका को अपने कृषि उत्पादों के लिए नये बाज़ारों की बड़ी तत्परता से तलाश है।

2020 अमेरिका में चुनावी साल है और ट्रम्प हर हाल में दोबारा चुनाव जीतना चाहते हैं। विभिन्न तरह के कृषि उत्पादन करने वाले अमेरिकी राज्य आगामी चुनावों में हार-जीत के निर्णय में बहुत महत्वपूर्ण होंगे। ये राज्य ट्रम्प पर डेयरी, कृषि और मांस उत्पादों के भारत में निर्यात हेतु भारी दबाव बना रहे हैं, जिसे ट्रम्प के लिए नज़रंदाज़ करना आसान नहीं होगा। ट्रम्प जानते हैं कि अपने ग्रामीण वोटरों और डेयरी किसानों की नाराजगी उन्हें भारी पड़ सकती है। अतः ट्रम्प भारत के बाजार को अपने किसानों के लिए सुगम बनाने में लिए पूरा दबाव बनाएंगे। भारत अपनी कश्मीर नीति और नागरिकता संशोधन कानून पर भी चाहेगा कि ट्रम्प उसके खिलाफ कोई बयान ना दें, अतः कूटनीतिक तौर पर भी हमारे ऊपर अमेरिका का दबाव होगा।

भारत 18.5 करोड़ टन वार्षिक दूध उत्पादन के साथ विश्व में प्रथम स्थान पर है और दूध के विषय में आत्मनिर्भर है। यदि दूध समेत पशुपालन से होने वाली सम्पूर्ण आमदनी का आंकलन करें तो लगभग 30 लाख करोड़ रुपये की कृषि जीडीपी में दूध और पशुपालन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 30% है। 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुनी करने के लिए दुग्ध और पशुपालन क्षेत्र की बहुत बड़ी भूमिका है। ऐसे में इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के बावजूद आयात को बढ़ावा देना हमारे किसानों और देश के हित में नहीं है। यदि हम अपने देश में कृषि उत्पादों का आयात सुगम कर दें तो सब्सिडी के बल पर अमेरिका के किसान हमारे बाजार को सस्ते कृषि उत्पादों से पाट देंगे और कालांतर में हमारे किसान बरबाद हो जाएंगे। अमेरिका में डेयरी पशुओं को मांस व अन्य पशु उत्पाद से निर्मित आहार भी खिलाया जाता है। भारत में उन पशुओं के डेयरी उत्पाद ही आयात करने की आज्ञा है जिन्हें केवल शाकाहारी आहार ही खिलाया गया हो। अब इसकी गारंटी कौन देगा कि आयातित डेयरी उत्पाद केवल 'शाकाहारी' पशुओं से ही प्राप्त किये गए हैं। क्या यह हमारे धार्मिक विश्वास से खिलवाड़ नहीं होगा। अमेरिका भारत पर अपने डेयरी उत्पादों के सत्यापन के सख्त मानकों को भी शिथिल करने का दबाव बना रहा है।

हमारे देश में 85 प्रतिशत यानी लगभग 12 करोड़ लघु और सीमांत किसान हैं। इनके अलावा करोडों मज़दूर परिवार भी कृषि एवं सह-गतिविधियों पर अपनी जीविका के लिए निर्भर हैं। देश के किसान की औसत आय 9,000 रुपये प्रति माह से भी कम है। हमारे किसान और मजदूर छोटे-छोटे खेतों में कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन आदि से किसी प्रकार अपना जीवन यापन कर रहे हैं। बिना सोचे समझे कृषि उत्पादों के आयात की गलत नीतियों से इन करोड़ों लोगों की जीविका खतरे में पड़ सकती है। घाटे केे कारण यदि किसान-मज़दूर पशुपालन और कृषि से विमुख हो गए तो हमारी सालों की मेहनत के बाद कृषि क्षेत्र में प्राप्त की गई आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। पहले ही संकट में फंसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गहरे संकट में फंस जाएगी। सरकार का कर्तव्य अपने देश के किसानों और मज़दूरों के हितों की रक्षा करना है। मोटी सब्सिडी पर जीवन निर्वाह कर रहे किसी विकसित देश के किसानों के लिए हम अपने किसानों, मज़दूरों और देश के हितों की बलि नहीं चढ़ा सकते।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)

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