अनियमित माहवारी का महिला वैद्य ही कर रहीं इलाज

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बिसवां (सीतापुर)। ल्यूकोरिया समेत महिलाओं की कई बीमारियां जिनका इलाज कराने जाना तो दूर महिलाएं बात करने में भी संकोच करती थीं, आज गांव की कुछ महिला वैद्य ही उनका देशी तरीके से इलाज कर रही हैं। शर्म का विषय समझी जाने वाली इन बीमारियों पर खुलकर चर्चा भी कर रही हैं।

सीतापुर जिले के बिसवां ब्लॉक के एक गांव की रहने वाली सुलेखा (बदला हुआ नाम) को ल्यूकोरिया की बीमारी थी। काफी दिनों तक मां तक को नहीं बताया। बाद में किसी तरह डॉक्टर के पास पहुंची थी तो दवा खाने से कतराती रहीं। लेकिन अब वो काफी खुश हैं। गांव की कुछ महिलाओं ने ही जड़ी-बूटियों के सहारे उनका इलाज कर दिया है। वो बताती हैं, ''हमको पांच महीने से काफी दिक्कत हो रही थी, बताने में शर्म आ रही थी। फिर मेले में नारी संजीवनी केंद्र की महिलाओं को सुना तो थोड़ी हिम्मत आई। बाद में उन्ही के बताए अनुसार इलाज किया तो समस्या दूर हो गई।”

सुलेखा की तरह ही ग्रामीण इलाकों की लाखों हजारों महिलाएं नारी संजीवनी केंद्र का लाभ उठा रही हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग से समर्थित महिला समाख्या उत्तर प्रदेश की ओर से प्रदेश के 14 जिलों में 55 केंद्र संचालित किए जा रहे है। यह केंद्र महिलाओं द्वारा संचालित स्वास्थ्य की एक वैकल्पिक व्यवस्था है। यहां महिलाएं ही जड़ी-बूटी ज्ञानी के रुप में महिलाओं से संबंधित बीमारियों का पारंपरिक ज्ञान के सहारे इलाज किया जाता है। ग्रामीण महिलाओं की सेहत दुरुस्त करने के साथ ही इन केंद्रों से कई महिलाओं को रोजगार भी मिला है।

सीतापुर जिले के बिसवां ब्लॉक में रहने वाली ऊषा वर्मा (41 वर्ष) एक केंद्र में सहयोगिनी के पद पर पिछले दो वर्षों से जुड़ी हुई हैं। ऊषा बताती हैं, ''गाँव की महिलाओं में ल्यूकोरिया, अनियमित माहवारी जैसी समस्याएं आम हैं। साफ सफाई और जानकारी के अभाव में होने वाली इन बीमारियों के बारे में वो अक्सर छिपाती भी हैं। इसलिए समस्या और बढ़ जाती है। हम लोग न सिर्फ उनकी झिझक दूर करते हैं बल्कि उनका इलाज भी करते हैं। चार हफ्ते की खुराक के 10-20 रुपये लेते हैं।”

जडी बूटियों को बनाने में मिलने वाली ट्रेनिंग के बारे में ऊषा कहती हैं, ''महिला समाख्या की तरफ से साल में दो बार सभी जिलों की महिलाएं को जड़ी बूटियों के बारे में जानकारी दी जाती है कि कौन-कौन सी जड़ी बूटी बीमारी में कितनी सहायक है।"

अमरूद, जामुद, सागौन, पीपल, बरगद आदि पेड़ों के फल, फूल और छाल से ये दवाएं तैयार की जाती हैं। केंद्र से जुड़ी महिलाएं जड़ी-बूटियों को अपने आस-पास खोजती है फिर उसकी सफाई करके उससे दवाईयां तैयार करती हैं और उसकी पैकिंग करके महिलाओं को उचित दामों पर उपलब्ध कराती है। केंद्र में आड़ने वाली महिलाओं का पूरा ब्यौरा होता है साथ ही उन महिलाओं जिनको बीमारी होती है जब तक वह जड़ से न जाए उनकी निगरानी की जाती है। फिलहाल तो संघ से जुड़ कई महिलाओं ने अपने घरों के आसपास जड़ी-बूटियां भी उगानी शुरू कर दी हैं। 

केंद्र में इलाज करने के साथ-साथ यह महिलाएं जिले और ब्लॉक में लगने वाले मेलों, बाजारों, शिविरों में भी स्टॉल लगाकर दवाओं की बिक्री तथा केंद्र का प्रचार-प्रसार करती हैं। बिसवां ब्लॉक में छह गाँवों में 30 महिलाओं का संघ बनाकर नारी संजीवनी केंद्र चलाया जा रहा है। संघ से जुड़ी अहमरदाबाद गाँव की सलमा (29 वर्ष) बताती हैं,''हमारे पास बहुत-बहुत दूर-दूर से महिलाएं अपनी समस्या को लेकर आती हैं। इन दवाओं का कोई असर भी नहीं पड़ता और सस्ते दाम पर मिल भी जाती है।" 

इन जिलों में हैं नारी संजीवनी केंद्र

सीतापुर, वाराणसी, चित्रकूट, सहारनपुर, औरेया, गोरखपुर, जौनपुर, प्रतापगढ़, मथुरा, मऊ, बुलंदशहर, बलरामपुर, श्रावस्ती और मुज्जफरनगर।

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