अपनी बेटी को सच में सयानी बनाइए

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लखनऊ। कहते हैं कि ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है ये नारी ही है जो ईश्वर के बाद दुनिया में जन्म देने की ताकत रखती है लेकिन इतनी शक्तिशाली और खूबसूरत रचना को अज्ञानता के कारण गर्त में धकेल दिया गया है। 

स्त्री के पास असीम ताकतें हैं जिसका उसे ज्ञान नहीं उदाहरण के तौर पर शरीर ही ले लीजिए कहते हैं कि अगर तन स्वस्थ नहीं हुआ तो मन और विचार स्वस्थ कैसे हो पाएंगे। विज्ञान भी इस बात को मानता है स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। अब जब स्त्री ने अपने देह के साथ ही अन्याय किया है तो उसे अपनी ताकतों का अंदाज़ा कैसे हो पाएगी आप सोच रहे होंगे कि मैं यह कैसी गोलमोल बातें कर रही हूं। सीधे मुद्दे पर आती हूं।

औरतों ने खुद को अपने ही बनाए हुए जाल में फंसा लिया है मसलन मासिक धर्म के दौरान अपवित्र हो जाने पर पूजा पाठ न करना, किसी से मिलना-जुलना नहीं, अचार-चटनी हाथ न लगाना, हल्दी न छूना और वगैरह-वगैरह यह प्रथाएं कहां से आईं। कोई नहीं जानता पर आंख बंद करके हम इन्हें मानते ज़रूर है, अधिक परेशानी की बात यह है शहरी इलाकों से अब इस तरह का अंधविश्वास तो दूर हो रहा है लेकिन गाँव अब तक इसकी गिरफ्त में है।

देखिए मैं आपको बता दूं कि माहवारी या मासिक स्त्राव जिसे अंग्रेजी में पीरियड्स या एमसी भी कहते हैं वो एक बहुत ही स्वाभाविक और प्राकृतिक क्रिया है। हम औरतों के शरीर में एक अंग होता है, जिसे यूट्रस या बच्चेदानी या अंडाशय कहते हैं। एक लड़की जब 10 से 13 साल की औसतन आयु में होती है तब इस अंडाशय में हजारों की संख्या में नन्हें अण्डों की झिल्ली बन जाती है और फिर हर 28 से 30 दिनों के भीतर ये झिल्ली फट जाती है और खून मासिक धर्म के रूप में बाहर आ जाता है तो हम कहते हैं लड़की सयानी हो गई। अगर वो किसी पुरुष के सम्पर्क में आकर सम्बन्ध बना लेती है तो ये झिल्ली फटना बंद हो जाती है और फिर वो गर्भवती हो जाती है फिर इसी अंडाशय में बने तरल के भीतर होता है एक नए जीवन का निर्माण ये सब कितना खूबसूरत है। 

तो यूं हम स्त्रियां एक जीवन को जनने वाली जननी बन जाते हैं लेकिन इसी मासिक धर्म से हमें इतना परहेज़ क्यूँ? यह तो एक जीवन दायनी प्रक्रिया है जिसके दौरान हमें खुद को और भी अधिक मजबूत और आत्मविश्वासी महसूस करना चाहिए। ये बात बिलकुल गलत है कि जिस स्त्री को माहवारी हो रही है उसे समाज से अलग कर दो उसे रसोईघर में न जाने दो न ही पूजा करने दो, खुद ही सोचिए क्यों? क्या आपके पास ऐसी किसी भी प्रथा का कोई तर्क है या आप इसे सिर्फ इसलिए मानती हैं क्योंकि आपकी माँ ने कहा और आपकी माँ को उनकी माँ ने! 

सच तो यह है कि इस दौरान शरीर से रक्त निकलने के कारण प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में व्यक्ति कमजोर और चिड़चिड़ा महसूस करता है। प्रतिरोधक क्षमता कम होने से उसके बीमार होने की सम्भावनाएं अधिक होती हैं पर इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं की उसके मानवाधिकार छीन लिए जाएं। विज्ञान कहता है कि कुछ महिलाओं को इस दौरान लेबर जितना दर्द होता है और वहीं कुछ को दर्द छू कर भी नहीं जाता। ऐसे में सबको एक ही तराजू में तौलने का क्या तर्क?

और रही बात अचार की तो मैंने खुद अजमाया है और मेरे जैसे कई लोगों ने की अचार माहवारी से नहीं बैक्टीरिया के कारण ख़राब होता है। जहां तक भगवान की पूजा की बात है तो याद हो कि हम सिर्फ देवों की ही नहीं देवियों की भी पूजा करते हैं। देवियां भी स्त्रियां है जिन्हें मासिक धर्म होता है। आप चाहें तो कामख्या देवी हो आएं भगवान किसी को पूजा पाठ से नहीं रोकते।

अब ज़रूरत है जागरूकता की। आपका जीवन हो सकता है इन कुरीतियों में बीत गया हो पर अपनी बेटी को इनसे आगे बढ़ने की हिम्मत दीजिए उन्हें कपड़ा छोड़ कर सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने के बारे में बताइए। इससे आप उसे एक स्वस्थ और बीमारी मुक्त कल देंगी। आप इस दौरान अपनी बेटी की मानसिक ताकत को बढ़ाइए। उसके हौसले को आपसे शक्ति मिलेगी, उसे बताइए कि माहवारी के दौरान भी वो उतनी ही खूबसूरत और पवित्र है जितनी आम दिनों में होती है। इन रुढ़ियों का कोई आदि तो नहीं पर अंत ज़रूर होगा, आप करेंगी, मैं करुंगी, हम सब करेंगी साथ मिलकर। 

रिपोर्टर : आंचल श्रीवास्तव

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