समूह की ताकत: बरेली में महिलाएं घरों में बना रहीं कंटीले तार और फसल बचाने वाली जाली

छुट्टा पशुओं की समस्या और ग्रामीण स्तर पर कंटीले तारों और जाली की मांग को देखते हुए स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने इसे अपनी आजीविका का जरिया बना लिया है। वो आसपास के किसानों को शहर से सस्ते उत्पाद बेचकर अपना कारोबार बढ़ा रही हैं।

Ramji MishraRamji Mishra   30 Dec 2021 12:09 PM GMT

बरेली (उत्तर प्रदेश)। भगवतीपुर ग्राम पंचायत के आसपास बहुत सारे खेतों में कटीले तार और कहीं कहीं जालियां लगी हैं। फसलों को पशुओं से बचाने के लिए ये कटीले तार और जालियां किसी बड़े शहर से खरीदकर नहीं आई हैं बल्कि यहां इसी गांव की महिलाओं ने बनाया है।

व के सबसे किनारे वाले घर पर एक बैनर टंगा है, जिस पर विश्वास प्रेरणा महिला ग्राम संगठन लिखा है। घर के अंदर के कमरों तारों और जालियों के कई बंडल रहे है। अंदर ही एक मशीन लगी है, जिस पर महिलाएं तार से जाली बना रही हैं।

भगवतीपुर गांव की संगीता देवी (36 वर्ष) ने जाली बनाने की मशीन करीब 5 लाख रुपए में दिल्ली से खरीदी थी लेकिन 3 साल बंद पड़ी रही। अकेले कुछ काम होता न देख साल 2019 में उन्होंने महिलाओं का एक समूह बनाया और फिर काम शुरु किया, जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब उनकी बनाई जालियां और कटीले तार न बरेली समेत कई जिलों के किसान ले जाते हैं बल्कि कई सरकारी दफ्तरों में लगी हैं।

बरेली के भगवतीपुर ग्राम पंचायत की महिलाएं गांव तैयार लोहे की जाली दिखाते हुए।

संगीता देवी बताती हैं, "जब मैं चेन्नई में रहती थीं वहीं से यह काम सीखा। बरेली आने के बाद महिलाओं का समूह बनाया और यह काम शुरू हो गया। बहुत सारी महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी है। फिलहाल सलाना 3 लाख से 3.5 लाख की आमदनी हो जाती है।" जाली बनाने में पारंगत हो चुकी समूह की सचिव जुड़ी प्रीति कुमारी बताती हैं, "मैं रोज करीब 4 घंटे काम करती हूं। उससे महीने की करीब 10 हजार रुपए तक की कमाई हो जाती है।"

ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाने, उनके अंदर स्वरोजगार की भावना को बढ़ाने, उद्यमिता लाने और आर्थिकरुप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं कई क्षेत्रों में परचम लहरा रही हैं।

लोहे की जाली बनाने की मशीन।

यूपी में 560408 समूह है सक्रिय

राष्ट्रीय आजीविका मिशन की वेबसाइट के आंक़ड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के सभी 826 ब्लॉक में समूह सक्रिय हैं पूरे प्रदेश में समूहों की संख्या 5,60,408 है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में पांच करोड़ से ज्यादा महिलाएं सक्रिय समूहों से जुड़ी हैं।

21 दिसंबर को यूपी के प्रयागराज दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "महिला स्वयं सहायता समूह की बहनों को तो मैं आत्मनिर्भर भारत अभियान की चैपिंयन मानता हूं।" पीएम मोदी ने भी कहा कि ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ाने के चलाई जा रही योजनाओं में महिलाओं को बराबर का भागीदार बनाया जा रहा है। दीनदयाल अंत्योदय योजना के जरिए देशभर की महिलाओं को सेल्फ हेल्प ग्रुप, ग्रामीण संगठनों से जोड़ा जा रहा है। मुद्रा योजना के जरिए महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। बरेली में भी हजारों महिलाएं समूह से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

बरेली में 7000 से ज्यादा स्वयं सहायता समूह

अगर बरेली में 15 ब्लॉक की 1172 ग्राम पंचायतों में 7000 से ज्यादा महिला समूह हैं। बरेली के किसी गांव में महिलाएं वर्मी कंपोस्ट बना रही हैं तो कहीं तार वाली जाली, कहीं जैविक खेती कर अपने उत्पाद बेच रही हैं तो कहीं कपड़ों को सिल रही हैं। कोई मोमबत्ती बना रही है तो कहीं मधुमक्खी पालन तो किसी गांव में सब्जियों की खेती कर रही हैं।

बरेली में बिथरी चैनपुर ब्लॉक से लगभग 25 किलोमीटर दूर गिरिधारीपुर गांव की महिलाएं वर्मी कंपोस्ट (केचुंआ खाद) बनाती हैं। इनमें से ज्यादातर महिलाओं के घरों में दूध का व्यवसाय भी होता है। गोबर को खाद में बदलकर वो अतिरिक्त कमाई कर रही है। गांव में बने आदर्श लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं में से एक मधु कहती हैं, "वर्मी कम्पोस्ट खाद का एक पैकेट एक किलो का होता है। एक पैकेट की कीमत 10 रुपए से लेकर 25 रुपए तक होती है। रोजाना 6 पैकेट तक बिक जाते हैं। हम रोज अन्य उत्पाद को मिलाकर 300 तक कमा लेते हैं।" गांव में कई महिलाएं मधुमक्खी पालन भी करती हैं।

संजय द्विवेदी जो बिथरी चैनपुर में सहायक विकास अधिकारी सहकारिता के पद पर हैं और प्रभारी बीडीओ का कार्य देखते हैं। वह कहते हैं, स्वयं सहायता समूह के रुप में महिलाओं को एक प्लेटफार्म मिला है। इनकी आर्थिक स्थिति में बहुत बदलाव आ रहा है। जो पहले आर्थिक तौर पर कमजोर थीं उनकी जिंदगी में कई मामलों में प्रगति हुई है।"

बरेली के कई गांवों में जैविक खेती कर अपने उत्पाद शहरों में बेच रही हैं, तो कुछ महिलाओं ने होम मेड मसालों का काम शुरु किया है।

आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर हो रही हैं महिलाएं- डिप्टी कमिश्नर

राष्ट्रीय आजीविका मिशन बरेली में डिप्टी कमिश्नर तेजवंत सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं कि उनके जिले में महिलाएं वर्मी कंपोस्ट से लेकर कंटीले तार, जाली, कपड़े, से लेकर टॉललेट क्लीनर तक बनाती हैं।

तेजवंत सिंह कहते हैं, "जिले में दरी, वस्त्र निर्माण, वर्मी कंपोस्ट, कंटीले तार, जाली, दाल और सब्जी मसाले बनाने से लेकर कई तरह के काम हो रहे हैं। अपराजिता समूह के द्वारा बनाए जा रहे कपड़े विदेश तक जा रहा है। जिले की कई महिलाएं आत्मनिर्भर होकर न सिर्फ अपना घर चला रही हैं बल्कि देश की तरक्की में भी योगदान दे रही हैं।"

ग्रामीण महिलाओं के लिए सिलाई-कढ़ाई और बुनाई का काम परंपरागत है लेकिन बरेली में कुछ महिलाओं ने इसे नया मुकाम दिया है। गांव में चलाए जा रहे है सिलाई सेंटर छोटी-मोटी कंपनी की तरह काम करते हैं, जहां कर्मचारी को सैलरी मिलती है, और उन्हें साप्ताहिक छुट्टियां भी मिलती हैं।

बिथरी चैनपुर ब्लॉक की फरीदापुर इनायत खां गांव में पूजा वर्मा कुछ महिलाओं के साथ मिलकर कपड़े का काम करती हैं, उनके समूह का नाम अपराजिता है। समूह की सदस्य पूजा वर्मा के मुताबिक उनके यहां इन दिनों 11 सिलाई मशीने हैं। इनमें से 7 मशीनें लगभग 7 सात हजार की हैं और चार मशीने 18 हजार रुपये के कीमत की हैं। इस तरह मशीनों की कुल लागत 1 लाख इक्कीस हजार है। काम के लिए उन्हें मृदा ग्रुप नामक संस्था से भी बहुत मदद मिली है। पूजा बताती हैं, "हमारे समूह से जुड़ी हर महिला हर महीने लगभग 3000 रुपए तो कमा ही लेती है। अच्छे ऑर्डर मिलने पर अब सबको सैलरी मिलने लगी है, पहले सिलाई के हिसाब से पैसे मिलते थे।"

स्कूलों की ड्रेस भी सिल रही हैं समूह की महिलाएं

फरीदापुर इनायत खां गांव के गुलाब स्वयं सहायता समूह कपड़ों के साथ कई स्कूलों की ड्रिस भी तैयार करता है। गुलाब स्वयं सहायता समूह की सदस्य मिथिलेस कुमारी बताती हैं, "हमने कोरोना से निपटने के लिए दस हजार मास्क और बहुत सी पीपीई किट भी तैयार की थी। आसपास के कई स्कूल वाले ड्रेस भी हम लोगों से लेते हैं। जिसके लिए थोक कपड़ा हम बरेली से मंगवा लेते हैं।"

इसी गांव की निवासी मांशी पटेल कहती हैं, "पहले हम लोग या जो बाहर जाकर मजदूरी करते थे या खाली (बेरोजगार) रहते थे। साल 2019 से एक समूह शुरु किया। हमने मसाला पीसने, धान कुटाई जैसे काम शुरु किया। शुरु में हमें घर घर जाकर सामान पहुंचाना पड़ता था। हमें थोड़े दिन बाद थोड़ा थोड़ा लाभ शुरु हुआ। सुबह दस बजे से पांच बजे तक हम लोग काम करते हैं। इसके बाद हमें रोज का दो सौ से ढाई सौ रुपए तक मिल जाता है।" मांशी के मुताबिक समूह जुड़ने का उन्हें एक और फायदा मिला है कि उन्हें जरुरत पड़ने पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। उन्हें समूह या बैंक दोनों से पैसा मिल जाता है।

समूह की महिलाओं को 5000 की ओवरड्राफ्ट की सुविधा मिली

समूह से जुड़ी महिलाओं के लिए एक सुविधा देते हुए 18 दिसंबर 2021 को केंद्र सरकार ने समूह के सत्यापित महिला बैंक खाता धारक को 5000 रुपए की ओवरड्राफ्ट सुविधा दी है, यानि उनके खाते में पैसे हो या नहीं लेकिन वो जरुरत पड़ने पर 5000 रुपए निकाल सकती हैं। सरकार के मुताबिक इससे करीब 5 करोड़ महिलाओं को फायदा होगा।

कंटीले तार और जाली का खर्च

संगीता के मुताबिक उन्हें थोक भाव में कच्चा तार करीब 80 रुपए किलो के हिसाब से मिलता है। जिसमें करीब 5 रुपए प्रति किलो की बनवाई और लागत आती है। जिसके बाद वो 95 रुपए किलो के आसपास बेचती हैं। संगीता के मुताबिक, आसपास के सैकड़ों गांवों में गेहूं और धान की बड़े पैमाने पर खेती होती है, इसलिए इसकी मांग रहती है। गेहं-धान की बुवाई के समय किसान ज्यादा खरीदते हैं तो उस वक्त अच्छा मुनाफा होता है।"


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