बगैर सुरक्षा के हैं कस्तूरबा स्कूलों की हज़ारों लड़कियां

बगैर सुरक्षा के हैं कस्तूरबा स्कूलों की हज़ारों लड़कियां

गोण्डा/ रायबरेली कस्तूरबा गांधी आवासीय स्कूलों में जहां करीब 100 लड़कियों के खाने, ठहरने से लेकर पढ़ाई की व्यवस्था होती है वहां छात्राओं की सुरक्षा से खिलवाड़ हो रहा है।

गाँव कनेक्शन की रिपोर्टर ने लखनऊ, रायबरेली और गोण्डा जिलों के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों की सुरक्षा व्यवस्था का हाल जाना तो धरातल पर इन विद्यालयों की स्थिति 

चिंताजनक दिखी। गोण्डा जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर परसपुर कस्तूरबा गांधी विद्यालय में लगभग 98 छात्राएं पंजीकृत हैं लेकिन विद्यालय में इन लड़कियों की सुरक्षा के  नाम पर केवल एक वार्डेन है। 

''विद्यालय की बांउडरी अभी तक नहीं बन पाई है, जिससे बहुत दिक्कत होती है। गार्ड हफ्ते में तीन दिन रूकता है और तीन दिन गायब रहता है। स्कूल गाँव से बाहर पड़ जाता है ऐसे में मुझे खुद डर लगता है अगर कोई भी घुस आए तो हम अपने बचाव में कुछ नहीं कर सकते" वार्डेन शशिप्रभा दुबे बताती हैं। इसके अलावा स्कूल में बिजली की भी दिक्कत है, जिससे शाम होते ही पूरे विद्यालय में अंधेरा छा जाता है।

ये हाल केवल गोण्डा जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय का नहीं है। राष्ट्रीय परिवर्तन संस्था, जो देश भर के कस्तूरबा स्कूलों पर सर्वे करती है। उसके अनुसार प्रदेश के लगभग 56 प्रतिशत कस्तूरबा स्कूलों के पास बाउंडरी वॉल नहीं है जबकि 23 प्रतिशत स्कूलों के पास सिक्योरिटी गार्ड नहीं है, जहां गार्ड हैं भी वो गायब हो जात हैं। 

रायबरेली जिले के खीरो ब्लॉक में लगभग एक घंटे तक रिपोर्टर मौजूद था लेकिन गार्ड का कहीं अता पता नहीं था, जबकि विद्यालय गाँव से बाहर सूनसान इलाके में है। विद्यालय की वार्डेन कहती हैं, ''स्कूल में बजट कम आता है जिससे अगर चाहें तो भी कोई काम नहीं करा सकते। हॉस्टल के कमरों की खिड़कियां भी टूटी हुई हैं, जिनपर कपड़े के पर्दे लगाए गए हैं।" गार्ड के बारे में पूछने पर वो बताती हैं, ''सुरक्षा के नाम पर विद्यालय के पास कोई भी व्यवस्था नहीं है। गार्ड पूरे दिन गायब रहता है और रात में भी केवल 12 बजे तक ही बड़ी मुश्किल से रूकता है। उसने स्कूल के थोड़ी दूर पर ही कमरा ले लिया है और मौका पाते ही वहीं भाग जाता है।"

उत्तर प्रदेश में मौजूदा समय में 746 कस्तूरबा आवासीय विद्यालय हैं, जिनमें 71,953 लड़कियां रहती हैं।

नाम न बताने की शर्त पर जिलास्तरीय अधिकारी ने कहा, ''स्कूलों में अधिकारी खुद चेकिंग के लिए कभी रात में नहीं जाना चाहते केवल सड़क पर जो स्कूल हैं, वहीं के चक्कर काट कर वापस आ जाते हैं। इसलिए गार्ड भी पूरी रात नहीं रूकते। ये तो सोचने की बात है कि बढ़ते अपराधों के बाद भी स्कूलों की सुरक्षा को लेकर कोई कड़ी सख्ती नहीं है।"

मॉल ब्लॉक में अभी हाल ही में बाउंडरी बनवाई गई है, जबकि काकोरी ब्लॉक के स्कूल में अभी भी बाउंडरी टूटी पड़ी है। सुविधाओं की कमी के कारण ज्यादातर लड़कियों ने पंजीकरण तो करा लिया है लेकिन स्कूल कम ही आती हैं। 

''स्कूलों में बाउंडरी निर्माण और अन्य मरम्मत का बजट जाता है, इसका इंतजाम बेसिक शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी होती है। अगर किसी स्कूल के पास इन बुनियादी जरूरतों की कमी है तो वहां की वार्डेन इसके लिए कह सकती हैं। इस पर तुरंत कार्यवाई की जाएगी।" सर्वशिक्षा अभियान के वरिष्ठ सलाहकार मुकेश कुमार बताते हैं।

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