ब्याह के बाज़ार में बेटियां

ब्याह के बाज़ार में बेटियां

कल गलती से एक लड़की का वैवाहिक बॉयोडाटा हाथ लग गया। व्यावसायिक दुनिया में अत्यंत सफल इस लड़की के वैवाहिक जीवनवृत्त पढऩे की उत्कण्ठा को मैं रोक नहीं पाई। लेकिन पहली पंक्ति के साथ ही चौंक गई। उसके नौकरी वाले रिज्यूमे में अब तक उसका नाम ही जाना था, सर नेम पर शायद ही कभी गौर किया हो। लेकिन यहां तो उसकी जाति, उपजाति, गोत्र तक सब लिखा हुआ था। चौंकी, फिर भी इस हिस्से को परम्परा मानकर आगे पढ़ती चली गयी।

अभी तो बस शुरुआत हुई थी। शादी वाले बायोडाटा का असल रूप तो अब सामने आने वाला था। अगला कॉलम लम्बाई का था और सौंदर्य परियोगिता के फॉर्म की तरह यहां मेरी लंबी दोस्त की लंबाई कुछ और इंच की बढ़त के साथ दर्ज की गयी थी। फिर नंबर आया रंगत का। अपने गेहुएं रंग में भी खूब सुन्दर लगने वाली मेरी दोस्त पर एक्स्ट्रा फेयर का अतिरिक्त ठप्पा लगाया गया था। अब बारी आई शिक्षा-दीक्षा की, इसे एक सस्ते से कॉलम में समेट बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा गया था 'गृह कार्य में दक्ष' बाकी के हिस्सों में पापा, चाचा, ताया, दूर वाले मौसी के लड़के, कानपुर वाली चचेरी बुआ के पति, सबकी नौकरी और आय का जि़क्र दिया हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे ये लोग भी लड़की के साथ उसकी ससुराल में रहने वाले हैं। मेरी सखी का शादी वाला बायोडाटा स्त्री शक्तिकरण की बात करने वालों को थोडा अजीब ज़रूर लग सकता है लेकिन अगर सच मानें तो ये उसी ढर्रे का लिखित वर्णन था, जिसको हमारा समाज सदियों से मानता आ रहा है।

मोटी, पतली, नाटी, लंबी, गोरी, सांवली, भैया, लड़की है। जब शादी करनी है तो इन बातों का खय़ाल करना ही होगा। कैसे कर लेगा कोई नाटी, मोटी और सांवली लड़की से शादी, हर किसी को दूध से नहाई, झक्क सफ़ेद, खूब लंबी बीवी ही चाहिए, भले ही खुद क्यों न सीधे ही कोयले के खान से आयातित हों।

भरोसा नहीं हो रहा है, ज़रा अपने पास रखे अख़बार का वैवाहिकी विज्ञापन वाला पन्ना देखिए। इन्हें बहु भी चाहिए होगी गोरी, लंबी और बेटी वाले अपनी बेटी की तारीफ में पहला शब्द भी यही कहेंगे। और हां, यहां भी गृहकार्य में दक्षता का प्रमाणपत्र ज़रूर शामिल रहता है।

हमें आदत हो गई है अपनी लड़कियों को शादी के बाज़ार में एक सामान की तरह परोसने की जहां एक कुशल व्यापारी की तरह हम इसमें अजीबोगरीब खूबियां निकालते हैं ताकि खऱीदार कोई कमी न निकाल ले। 

एक भारतीय समाज में बेटी भले ही गाँव के किसी मड़ैया में रहने वाली की हो या फिर महानगर के किसी पॉश बंगले में, ब्याह के बाज़ार में सजती एक ही तरह से है। आज हम भले ही मंगल पर पानी ढूंढ लें लेकिन बेटियों को लेकर हमारी सोच आदम ज़माने की ही है।

यूँ तो हम उदाहरण सरोजिनी नायडू से सायना मिर्जा तक का दे डालते हैं। लेकिन जब भी बात हमारे घर की लड़कियों की होती है, उसकी तमाम शैक्षणिक और व्यवसायिक उपलब्धियों के ऊपर उसकी गृहकार्य में दक्षता भारी पड़ जाती है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में ये नारी सशक्तिकरण का ये कैसा पहलू है।

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