चुनावी साल में क्या नीलगाय बनेगी मुद्दा?

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लखनऊ। दालें इस बार और महंगी हो सकती हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश में उनका रकबा और उत्पादन दोनों गिरे हैं। इसके लिए मौसम के साथ-साथ नीलगाय (वनरोज) भी बड़ा कारण हैं। नीलगायों के आतंक के चलते बाराबंकी, प्रतापगढ़ और दालों के गढ़ ललितपुर में सैकड़ों किसानों ने इसकी खेती छोड़ दी है।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में फतेहपुर तहसील के गौरा सैलक गाँव के वीरेंद्र कुमार अपने बीस बीघा खेत में अरहर की फसल बोते थे लेकिन नीलगायों के आंतक से वीरेंद्र अरहर की बजाय मेंथा उगाने लगे। फतेहपुर, प्रतापगढ़, हरदोई और ललितपुर में भी किसानों की जमीनें खाली पड़ी हैं। इस जानवर ने बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश व उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों में किसानों जीना दुश्वार कर दिया है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल ये नीलगाय कम से कम 40-50 करोड़ की फसलों का नुकसान कर देती है। प्रदेश के कृषि विभाग के मुताबिक, हर साल 10,000 से ज्यादा किसान नीलगायों से फसल खराब होने की शिकायत करते हैं। वन विभाग के मुताबिक, प्रदेश में नीलगायों का सबसे ज्यादा प्रकोप ललितपुर में है।

हालांकि मध्यप्रदेश के बाद 2015 में महाराष्ट्र और 2016 में बिहार ने नीलगाय को मारने का अधिकार किसानों को दे दिया है। वन्यजीव अधिनियम एक्ट-1972 के सेक्शन 12 के तहत फसल के नुकसान पहुंचाने पर नीलगायों का शिकार किए जाने की प्रावधान है। हालांकि कुछ वन्यजीव प्रेमी इसके दुरुपयोग की शंका जताते रहते हैं। उत्तर प्रदेश की करीब 40 फीसदी आबादी में नीलगाय का प्रकोप है, लेकिन यहां उन्हें मारना टेढ़ी खीर है। 

सवाल यह है कि जब प्रदेश की इतनी ग्रामीण आबादी और लाखों किसान नीलगाय से प्रभावित हैं तो क्या चुनावी साल में कोई पार्टी इस समस्या को चुनावी मु्द्दा बनाएगी? केंद्र सरकार ने किसानों की समस्या को देखते हुए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-3 से हटाकर अनुसूची-5 में डाला तो इसके शिकार की अनुमति मिल गई। फसलों को नुकसान पहुंचाने पर किसान अनुमति के साथ इनका शिकार कर सकेंगे। केंद्रीय कृषि मंत्री राधमोहन सिंह ने पिछले दिनों कहा “किसानों की समस्या को देखते हुए पर्यावरण और वन मंत्रालय को इससे संबंधित कानून में राहत देने की मांग की थी। जिस पर मंत्रालय ने इसके शिकार की अनुमति दे दी।” हालांकि गाँव कनेक्शन के पास कोई प्रमाण मौजूद नहीं है।

लेकिन यह आदेश उत्तर प्रदेश तक भी पहुंचा ही नहीं है। प्रदेश के कृषि निदेशक मुकेश श्रीवास्तव बताते हैं, “वनरोज को मारने का यूपी में अभी वहीं पुराना नियम है, केंद्र ने कोई नया नियम बनाया है, उसकी जानकारी नहीं है। लेकिन यूपी पिछले 10 वर्षों से वाइड लाइफ के नियमों में बदलाव की मांग करता रहा है। वनरोज (नीलगाय) से दलहनी समेत दूसरी फसलों को काफी नुकसान होता है। ये 25-25 के झुंड में रहते हैं, अगर किसी खेत में निकल भी गए तो पूरी फसल चौपट हो जाती है।” 

भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पुरुषोत्तम बताते हैं, “लाखों किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं। फतेहपुर जिले से 20 किलोमीटर एक गाँव है जहां पर सभी किसान अरहर, मटर, चना की खेती थे लेकिन आज वो जमीन बंजर पड़ी हुई है। ऐसे हजारों गाँव है जो नीलगाय की समस्या से जूझ रहे है। जिसका सीधा असर उत्पादन और क्षेत्रफल पर पड़ रहा है।” 

नीलगाय की समस्या से जूझ रहे महाराष्ट्र ने वर्ष 2015 में किसानों की समस्या को देखते हुए केंद्र से नए नियम पास कराए और उन्हें अपने यहां लागू किया। यहां किसान के खेत में अगर नीलगाय से नुकसान होता है तो 24 घंटे के अंदर जिला वन अधिकारी से अनुमति लेकर शिकार कर सकता है, अगर एक दिन के अंदर अनुमति न मिले तो भी वो नुकसान कर रही नीलगायों को मार सकता है। ऐसे ही बिहार ने भी अपने यहां नीलगाय को मारने की अनुमति दी है। लेकिन उत्तर प्रदेश पुराने नियमों के फेर में फंसा है। 

केंद्र ने जारी किया आदेश

नीलगायों को मारने के अधिकार के लिये बिहार के चंपारण में 2007 से ही आंदोलन शुरू हो गये थे। 2010 में इस संगठन के अध्यक्ष ने पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की थी। इस पर हाईकोर्ट ने सरकार तो तीन महीने का वक्त भी दिया था। आखिरकार केंद्र की मोदी सरकार ने नीलगायों को मारने के संबंध में आदेश जारी कर ही दिया। 

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