शहादत के 159 साल बाद वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने की पहल

शहादत के 159 साल बाद वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने की पहलवारिस अली को 1857 में 12 हजार किसानों द्वारा जेल का घेराव करने और विद्रोहियों का सहयोग करने के आरोप में अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।                                         प्रतीकात्मक फोटो

मुजफ्फरपुर (भाषा)। बिहार के मोतीपुर के बरुराज पुलिस चौकी के तत्कालीन जमादार वारिस अली की शहादत के 159 साल गुजरने के बाद अब उन्हें स्वतंत्रता सेनानी की पहचान देने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। जिला प्रशासन ने इस विषय पर गृह विभाग को अपनी अनुसंशा भेजी है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस विषय पर मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को कई पत्र लिखे थे और इस वीर सपूत को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने की मांग की थी। 1857 के गदर के दौरान ही अंग्रेजों ने वारिस अली को फांसी दे दी थी। सिंह के अलावा दिल्ली स्थित न्यू इंडिया फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी कैसर इमाम ने भी मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन के समक्ष वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने के लिए आवेदन किया था। मुजफ्फरपुर के जिला अधिकारी धर्मेन्द्र सिंह ने बताया कि इस बारे में प्रधान सचिव (गृह विभाग) को अनुशंसा भेजी गई है।

वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने के संबंध में दो पुस्तकों को भी आधार बनाया गया है जिसमें इनके योगदान का विस्तृत उल्लेख है। पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि पिछले एक वर्ष के दौरान मैंने कई बार मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को पत्र लिखा। इसके साथ ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में वारिस अली के महत्वपूर्ण योगदान के संबंध में कई इतिहासकारों के आलेख के साथ साक्ष्य प्रस्तुत किया।

वारिस अली को 1857 में 12 हजार किसानों द्वारा जेल का घेराव करने और विद्रोहियों का सहयोग करने के आरोप में अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। वारिस अली दिल्ली के मूल निवासी थे और उन्हें फांसी दिये जाने के बाद से उनके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

जिला प्रशासन से प्राप्त जानकारी के अनुसार, चूंकि वारिस अली के परिजनों के बारे में कोई जानकारी नहीं है, इसलिए इन्हें कोई वित्तीय लाभ तो नहीं मिलेगा, लेकिन तिरुहुत के शहीदों में पहला नाम वारिस अली का ही होना चाहिए। पुस्तक ‘बरुराज पुलिस चौकी के जमादार वारिस अली' के अनुसार, बरुराज पुलिस चौकी के पास उनके निवास से अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। तिरुहुत के मजिस्ट्रेट ए एच रिचर्डसन को नीलहों से शिकायत मिली थी कि वारिस अली विद्रोहियों की मदद कर रहे हैं।

गिरफ्तारी के समय वारिस अली एक अन्य विद्रोही नेता पीर अली से मिलने जा रहे थे। पीर अली लखनऊ के रहने वाले थे जो पटना में किताब की दुकान चलाते थे। कुछ इतिहासकार पीर अली का संबंध भोजपुर के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी बाबू कुंवर सिंह से बताते हैं। गिरफ्तारी के बाद वारिस अली को मुजफ्फरपुर के पुरानी बाजार नाका में तीन दिनों तक रखा गया था और उसके बाद उन्हें सुगौली मेजर की अदालत में पेश किया गया। मेजर ने इस आधार पर कार्रवाई करने से इंकार किया कि इनके खिलाफ सबूत अपर्याप्त है।

इसके बाद उन्हें पटना के तत्कालीन कमिश्नर मिस्टर टेलर की अदालत में पेश किया गया। छह जुलाई 1857 को इन्हें दोषी करार दिया गया और गांधी मैदान में फांसी दे दी गई।

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