बिहार: ड्रैगन लाइटों को पछाड़ रहे मिट्टी के दीये

बिहार: ड्रैगन लाइटों को पछाड़ रहे मिट्टी के दीयेचाइनीज आइटमों के बहिष्कार को लेकर चल रही मुहिम के बीच मिट्टी के दीयों की बिक्री पिछले सालों के मुकाबले ज्यादा है।

मनोज पाठक

पटना (आईएएनएस)। अंधेरे पर उजाले के प्रतीक दिवाली पर्व पर भले ही पिछले कुछ वर्षो में बिजली बल्बों के आगे दीये को उपेक्षा झेलनी पड़ी हो, लेकिन इस वर्ष दीये को महत्व मिलता नजर आ रहा है। ड्रैगन लाइटों की आमद तो है, मगर इसकी बिक्री जोर नहीं पकड़ रही।

ऐसा नहीं है कि इस वर्ष रोशनी के इस पर्व पर ड्रैगन लाइटों (चाइनीज लाइट) को कोई पूछ नहीं रहा है, लेकिन चाइनीज आइटमों के बहिष्कार को लेकर चल रही मुहिम के बीच मिट्टी के दीयों की बिक्री पिछले सालों के मुकाबले थोड़ी ज्यादा है। कुम्हार भी इस वर्ष साधारण के साथ-साथ फैंसी दीये बनाकर बाजार में पहुंचे हैं। दिवाली को लेकर सजे बाजार झालर, बल्ब और मटका समेत रोशनी के कई आइटमों से पटा है, लेकिन इसमें चीन निर्मित सामान की संख्या काफी कम है।

झालर और बल्ब कारोबार से जुड़े पटना के चांदनी मार्केट के व्यवसायी विपिन कुमार कहते हैं कि इस वर्ष ज्योति पर्व पर घरों को रोशन करने के लिए बाजार में जेल राइस, पाइप लाइट, दीया लाइट, उड़हुल फूल और मिर्ची झालर के साथ दर्जनों आइटम हैं। लेकिन चीन निर्मित समान के खरीदार कम आ रहे हैं। इस दिवाली में मिट्टी के दीयों में रोशनी की उम्मीद जगमगाई है। इससे थोड़ी ही सही, कुम्हारों के चेहरे पर मुस्कान लौट गई है।

राजा बाजार के फुटपाथ पर मिट्टी के दीये बेच रहीं वंदना प्रजापति बताती हैं कि इस बार तो लोगों को आकर्षित करने के लिए रंग-बिरंगे दीयों के साथ आकर्षक मंदिर भी बनाए हैं। मिट्टी का भाव काफी बढ़ गया है, फिर भी इनकी कीमत ज्यादा नहीं है। इधर, आनंद प्रकाश प्रजापति कहते हैं कि इस वर्ष दीये और अन्य मिट्टी के सामान की बिक्री बढ़ी है। मिट्टी के दीयों को आकर्षक बनाने की कोशिश की गई है।

खरीदार भी मिट्टी के दीये की रोशनी में दिवाली मनाने को लेकर उत्साहित हैं। स्थानीय निवासी संध्या सिंह कहती हैं, ''दिवाली का उल्लास दीयों से दोगुना हो जाता है। जब आकर्षक दीये उपलब्ध हैं, तो क्यों चाइनीज आइटम खरीदें। इस बार स्वदेशी उत्पादों से दिवाली मनाएंगे।''

पर्यावरणविद् एस़ चौधरी कहते हैं कि दीया पर्यावरण की दृष्टि से भी सही है। सोशल मीडिया समेत हर माध्यम से चीनी सामान का विरोध हो रहा है। चौधरी कहते हैं कि मिट्टी के दीये के इस्तेमाल से एक फायदा यह भी है कि यह बिजली के रेडिएशन और प्रदूषण से लोगों को बचाता है।

पटना कॉलेज के प्राचार्य रहे प्रो़ एऩ के चौधरी कहते हैं कि उरी आतंकी हमले और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद चीन के पाकिस्तान के साथ होने से लोगों में चाइनीज आइटमों के खिलाफ आक्रोश है। वे कहते हैं कि धार्मिक और पौराणिक कारणों से भी मिट्टी के दीये जलाना फायदेमंद है। वह कहते हैं, ''चीन निर्मित सामानों को यकायक रोकना संभव नहीं दिखता। लेकिन रोकने का प्रयास तो किया जा सकता है। तय कर लें कि हम स्वदेशी चीजें ही खरीदेंगे (जहां तक संभव हो सके) चाहे इसके लिए हमें अधिक कीमत ही क्यों न देनी पड़े।'' उन्होंने कहा कि इस दिवाली में यही दिख रहा है। लोग मिट्टी के दीये की ओर आकर्षित हुए हैं।

दीया दुकानदार बताते हैं कि बाजार में कई प्रकारा के दीये उपलब्ध हैं। साधारण दीया जहां एक रुपये में मिल रहा है, वहीं बड़े दीये दो से तीन रुपये में उपलब्ध हैं। मिट्टी के फैंसी दीये तीन से पांच रुपये में और मिट्टी के मंदिर 50 से 200 रुपये में मिल रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि रंगीन दीये के दो फायदे हैं। एक तो ये आकर्षक दिखते हैं, दूसरा इसमें तेल की खपत भी कम होती है। रंग लगने के बाद मिट्टी के दीये तेल को सोखते नहीं हैं।

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