बिचौलियों का लालच मधुबनी कला को तो जिंदा रखेगा पर शायद कलाकार को खत्म कर देगा

बिहार की मधुबनी लोककला दुनिया भर में मशहूर हो गई हो लेकिन यह आज भी अपने चित्रकारों को बिचौलियों से बचाने में कामयाब नहीं हो पाई है। अफसोस की बात है कि सरकार से भी इन चित्रकारों को कोई समर्थन नहीं मिल पा रहा है।

बिचौलियों का लालच मधुबनी कला को तो जिंदा रखेगा पर शायद कलाकार को खत्म कर देगाPhoto by Jigyasa Mishra

मधुबनी (बिहार): प्राकृतिक, चटकीले रंगों और बारीक रेखा-चित्रण के लिए दुनिया भर में मशहूर मधुबनी पेंटिंग के कलाकारों को बिचौलियों की वज़ह से प्रसिद्धि और पैसा दोनों में ही समझौता करना पड़ रहा है।

मिथिला-पेंटिंग, जिसे अब मधुबनी-पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है, बिहार और नेपाल के मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक लोक कला है। हम इस चित्रण को कई बार पोशाकों और प्रदर्शनियों के अलावा कला के शौकीनों के घरों की दीवारों की शान बढ़ाते देखते हैं तो ख्याल आता है कि इन मनमोहक चित्रों को बनाने वाले को उनकी मेहनत की मुंहमांगी की कीमत मिली ही होगी। कीमत तो मिलती है लेकिन कलाकारों को नहीं बल्कि बिचौलियों को, जो कलाकारों से मामूली दाम में पेंटिंग खरीदकर इसे कई गुना ज्यादा दामों पर आगे बेच देते हैं।

"इसे गांव से अत्यधिक लगाव कह लें या तकनीकी से दूरी, बिहार के मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव से शुरू हुई मधुबनी लोक-कला के कलाकार मुख्यतः इस कला से ही अपनी जीविका चलाते हैं। लेकिन ये खुद गांव से न निकलकर बिचौलियों के जरिए अपनी कलाकृतियां हर जगह भेजते हैं। इस वज़ह से उन्हें खुद 50 प्रतिशत से भी कम कीमत मिल पाती है," वरिष्ठ कलाकार व मधुबनी कला में पीएचडी, डॉ जय शंकर मिश्र बताते हैं।

बिहार का जितवारपुर गांव मधुबनी चित्रकारों का प्रमुख केंद्र है। मधुबनी से जब जितवारपुर की ओर बढ़ेंगे तो रास्ते भर घरों-दफ्तरों की दीवारें चटकीले मधुबनी कला से सुसज्जित दिखेंगी, और गांव पहुचते ही दिखेंगे मिटटी के घर, जिनको कई बार गोबर से लीप कर उन पर मुख्यतः काले, सफ़ेद व लाल रंगों से पौराणिक चित्र बनाए गए हैं।

"सन 1962 में जब दादी को पहली मधुबनी पेंटिंग कागज़ पर बनाने के लिए पुरस्कृत किया गया था, तो हमने अपने गांव में बदलाव की हवा को महसूस किया था। लेकिन हमको क्या पता था कि यह सिर्फ कुछ दिनों के लिए होगा और हम कलाकार, प्रतिभा होने के बाद भी संघर्ष ही करते रहेंगे।" मिथिलेश कुमार झा, जो मधुबनी कला में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित स्वर्गीय सीता देवी के पोते हैं, गांव कनेक्शन को बताते हैं।


मुनाफ़ा हो या तारीफ़, सब बिचौलियों का-

"पिछले कुछ वर्षों में गांव के अंदर और आसपास के कलाकारों की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है, लेकिन ज़्यादातर लोग सिर्फ़ मैथिली में बात कर सकते हैं, यह मैथिली ही जानते हैं। इसके अलावा कलाकारों में पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी कम है और वो व्यवसाय के लिए गांव से बाहर नहीं जाना चाहती जिस वज़ह से उन्हें काम करने के लिए एजेंट या बिचौलियों पर निर्भर होना होता है। इसलिए चाहे मुनाफ़ा हो या तारीफ़, सब बिचौलियों का होता है," बिहार के ही एक स्वयं सेवी संगठन में काम करने वाले मनीष झा बताते हैं।

"ये लोग (मध्यस्थ) राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्थित होते हैं और ग्राहकों के लगातार संपर्क में रहते हैं और जो कलाकार सबसे सस्ते में बेच दे उस से पेंटिंग खरीदते हैं। हमसे ये आर्डर के हिसाब से, कैनवास, पेपर, कपड़ा, साड़ी, दुपट्टों वगैरह पर पेंटिंग बनवाकर खरीदते हैं और फ़िर आगे बेचते हैं। हमें तो एक निश्चित आकार की पेंटिंग का एक निश्चित दाम ही मिलता है लेकिन वो कलाकृति बाहर बहुत अधिक दाम पर बिकती है पर इससे हमें कोई फायदा नहीं होता," गाँव की ही एक स्थानीय कलाकार, मधु बताती हैं।

अपनी बनाई कलाकृति अपर अपना नाम लिखने की भी आजादी नहीं-

"मुझे याद है एक बार रेशम की साड़ी पर मेरी पेंटिंग दिल्ली में एक शोरूम द्वारा 50,000 रुपये के लिए चुनी गई थी। लेकिन उन्होंने पेंटिंग के कोने में लिखे गए नाम को ध्यान में रखते हुए इसे खरीदने से इनकार कर दिया। कलाकारों के रूप में, हमें लोगों को हमारे नामों को जानने की भी अनुमति नहीं दी जाती है। हम इसे अपने आर्टवर्क पर नहीं लिख सकते हैं क्योंकि अगर हम ऐसा करते हैं, तो वे (बिजनेस एजेंसियां) डरते हैं कि ग्राहक कम कीमत पर अपनी सामग्री पेंट करने के लिए सीधे हमसे संपर्क कर सकते हैं और यह उनके लिए एक बड़ा नुकसान होगा, "रुपा झा, गांव के एक अन्य कलाकार ने गांव कनेक्शन को बताया।

सरकार से कलाकारों की मांग-

"हर साल देश भर में विभिन्न प्रकार की कला-प्रदर्शनियां होती है लेकिन हम उनके प्रवेश शुल्क, यात्रा और आवास पर खर्च नहीं कर सकते हैं। यदि राज्य सरकार कलाकारों के लिए किसी प्रकार का कार्यालय व्यवस्थित कर सकती है, जहां से हम सीधे प्रदर्शन और बिक्री करने में सक्षम होंगे, तो हम स्वतंत्र रूप से काम कर सकेंगे," विभा देवी, बताती हैं।

"जब पिछले साल मधुबनी रेलवे स्टेशन पर हम सब ने कलाकृतियां बनाईं तो हमसे कहा गया था पुरस्कार और प्रदर्शनियों के लिए पास मिलेंगे, वो भी सरकार ने नहीं दिया," मिथिलेश ने गांव कनेक्शन को बताया।

यदि जल्द ही इन लोक-कलाकारों को सरकार का समर्थन न मिला तो बिचौलियों के भरोसे कला भले ही जीवित रहे, लेकिन कलाकारओं के ख़तम होने की संभावना लगातार बनी रहेगी।

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