गांधीजी के पौत्र हैं, जो मुफलिसी में मौत से लड़ रहे हैं जंग

गांधीजी के पौत्र हैं, जो मुफलिसी में मौत से लड़ रहे हैं जंगइस तस्वीर में जिस लड़के ने गांधीजी की लाठी पकड़ रखी है वह महात्मा गांधी के पौत्र है जिनका नाम कानु रामदास गांधी है। आजकल वह बेहद गरीबी में जीवनयापन कर रहे हैं और कोमा भी हैं। साभार: इंटरनेट

सूरत (आईएएनएस)| राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पौत्र कानु रामदास गांधी (87 वर्ष) जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं। वह एक धर्मार्थ अस्पताल में भर्ती हैं और कोमा में हैं।

नमक सत्याग्रह की तस्वीर को करें याद

महात्मा गांधी के साल 1930 के ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह की याद आते ही दिमाग में आती है एक उत्साही बच्चे की तस्वीर। गुजरात के डांडी गाँव में समुद्र तट पर यह बच्चा अपने दादा मोहनदास करमचंद गांधी की लाठी को पकड़े हुए उन्हें आगे ले जाते दिख रहा है। आज आठ दशक बाद भी यह तस्वीर लोगों के जेहन में बसी हुई है। यह तस्वीर मुंबई के जुहू समुद्र तट और देश के अलग-अलग हिस्सों में बनाए गए संग्रहालयों में लगकर अमर हो चुकी है।

कानु रामदास गांधी।

कानु रामदास गांधी, महात्मा गांधी के पौत्र

वह बच्चा, कानु रामदास गांधी, आज 87 साल के बुजुर्ग में बदल चुका है और एक धर्मार्थ अस्पताल में मौत से जंग लड़ रहा है। कानु रामदास गांधी अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा के पूर्व वैज्ञानिक रह चुके हैं। राष्ट्रपिता के पौत्र हैं लेकिन आज हाल यह है कि मुफलिसी में मौत से जंग लड़ रहे हैं। एक मंदिर के प्रबंधन के अलावा कानु गांधी की देखभाल करने वाला कोई नहीं है।

दोस्ती का फर्ज निभा रहे धीमंत बधिया

अहमदाबाद के धीमंत बधिया से जो बन पड़ रहा है, वह कर रहे हैं। वह कानु गांधी के पुराने मित्र और महात्मा गांधी के एक सहयोगी के पौत्र हैं। उन्होंने हाल में अपने पास से कानु गांधी के लिए 21000 रुपया दिया है।

राधाकृष्ण मंदिर ने बहुत अधिक साथ दिया है। उन्होंने (मंदिर प्रशासन) कानु को पास के शिव ज्योति अस्पताल में भर्ती कराया है और वही लोग कानु की पत्नी शिवालक्ष्मी कानु गांधी (90 वर्ष ) की देखभाल कर रहे हैं। शिवालक्ष्मी सुन नहीं सकती हैं और वृद्धावस्था की अन्य समस्याओं से ग्रस्त हैं।
धीमंत बधिया कानु रामदास गांधी के दोस्त

कानु और शिवालक्ष्मी नि:संतान हैं। कानु ने 25 साल तक नासा की सेवा की। चार दशक बाद 2014 में स्वदेश लौटने के बाद उनके हालात बुरे हो गए।

भारत में अमेरिका के तत्कालीन राजदूत जान केनेथ गालब्रेथ, कानु को मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अध्ययन के लिए ले गए थे। कानु ने नासा और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय में काम किया था। शिवालक्ष्मी बोस्टन बॉयोमेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर थीं।

बधिया ने कहा, "भारत लौटने के बाद पति-पत्नी एक-जगह से दूसरी जगह भटकते रहे क्योंकि उनका अपना कोई स्थायी ठिकाना यहां नहीं था। कुछ समय के लिए दोनों आश्रमों और धर्मशालाओं में रहे। एक समय आया जब वह दिल्ली के गुरु विश्राम वृद्धा आश्रम में छह महीने तक रहने के लिए बाध्य हो गए।"

मानसिक रूप से बीमार बुजुर्गों के इस आश्रम में दंपति को भयावह दिन देखने पड़े। यहां तक कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए निजी सशस्त्र गार्ड रखने पड़े।

मोदी का वादा देखिए कब होता है पूरा

इन हालात में एक केंद्रीय मंत्री ने कानु से संपर्क किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी बात कराई। बधिया ने कहा, "प्रधानमंत्री बहुत सहानुभूति से पेश आए और मदद का वादा किया। लेकिन, इसके बाद आज की तारीख तक हमें न तो उनके कार्यालय (पीएमओ) से और न ही गुजरात सरकार की तरफ से, कोई भी संदेश सुनने को नहीं मिला।"

उन्होंने कहा कि गुजरात के किसी नेता या मंत्री ने कानु का हाल जानने के लिए पूछताछ करने या अस्पताल आने की जहमत नहीं उठाई।

कोमा में हैं कानु गांधी

कानु दिल का दौरा पड़ने और मस्तिष्काघात के बाद 22 अक्टूबर को सूरत पहुंचे। उनका आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया है। तभी से वह कोमा में हैं और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। शिवालक्ष्मी और एक आश्रम सेवक राकेश उनके पास हैं। राकेश को मंदिर अधिकारियों ने कानु गांधी के लिए तैनात किया हुआ है।

बहन लेती रहतीं हैं हालचाल

सौभाग्य से कानु की बुजुर्ग बहन उषा गोकानी मुंबई से नियमित रूप से उनकी हालचाल पूछती रहती हैं। बेंगलुरु में रहने वाली एक अन्य बहन सुमित्रा कुलकर्णी हाल में उन्हें देखने आई थीं। सुमित्रा पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं।

बहनों ने कहा कि वे कानु के इलाज का खर्च उठाएंगी। लेकिन, मंदिर अधिकारियों ने विनम्रता से पेशकश को नकार दिया। उनका कहना है कि कानु की सेवा कर वे राष्ट्र के लिए महात्मा गांधी की सेवा का कर्ज चुकाने की थोड़ी कोशिश कर रहे हैं।
धीमंत बधिया कानु रामदास गांधी के दोस्त

बधिया ने कहा कि कानु की हालत को देखकर उन्हें अहमदाबाद के प्रसिद्ध साबरमती आश्रम से चिढ़ सी हो रही है जिसके अगले साल होने वाले शताब्दी महोत्सव के लिए करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे ही महात्मा गांधी के नाम पर कई संस्थानों को करोड़ों सरकार द्वारा दिए जा रहे हैं। लेकिन, किसी को महात्मा गांधी के विचारों या उनके वारिसों से कोई सरोकार नहीं है।

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