आधे किलो का मक्का पैदा कर क्षेत्रीय किसानों के लिए मिसाल बने अश्वनी वर्मा

बाराबंकी के अश्वनी वर्मा ने गैर सीजन में मक्के का उत्पादन कर आस-पास के किसानों को भी प्रेरित किया है।

Satish MishraSatish Mishra   9 Feb 2019 1:51 PM GMT

आधे किलो का मक्का पैदा कर क्षेत्रीय किसानों के लिए मिसाल बने अश्वनी वर्मा

बाराबंकी। गैर सीजन में मक्के की बुआई करके बाराबंकी के किसान अश्वनी वर्मा ने क्षेत्रीय किसानों के सामने एक मिसाल पेश किया है। अश्वनी वर्मा ठंड के इस मौसम में करीब आधे-आधे किलो के मक्के उगा रहे हैं और क्षेत्रीय किसानों को गैर सीजनल मक्का उगाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से 38 किलोमीटर दूर सूरतगंज ब्लाक स्थित गंगापुर गाँव के 40 वर्षीय अश्वनी वर्मा सीजन से हटकर मकई की खेती कर रहे हैं। अश्वनी वर्मा बताते हैं कि आमतौर पर मक्के की फसल गर्मी और बरसात के महीने यानी जुलाई-अगस्त में होती है। उस समय बाजारों में भी मक्के की भरमार होती है। इस वजह से उनका वाजिब दाम नहीं मिल पाता है।

'हमने सीजन से हटकर मक्के की खेती की और जनवरी में हमारी फसल तैयार हो गई। गैर-सीजन में उत्पाद करने से हमें अच्छा रेट मिल जा रहा है। उन्होंने बताया कि आम सीजन की तुलना में इस गैर-सीजन में उन्हें लगभग दोगुना दाम मिल रहा है।'

अश्वनी ने बताया कि इस मौसम में 1-1 मक्के की बाली करीब 500 ग्राम तक की निकल रही है। अश्वनी आगे बताते हैं हमने पंक्ति विधि से मकई की खेती की है। ठंड के मौसम में मकई तैयार होने से इसे खेतों में ज्यादा समय तक रोका भी जा सकता है क्योंकि इस समय कम तापमान होने की वजह से मकई की बाली जल्दी पकती नहीं है। इस समय बाजारों में मकई नहीं होती है जिससे हमें अच्छा रेट भी मिल जाता है।

लागत और मुनाफे के बारे में अश्वनी बताते हैं की हमने विनर कंपनी की 4226 किस्म के बीज से मक्के की बुआई की थी जिसमें करीब 2500 रूपए प्रति बीघे की लागत आई है। जनवरी के अंतिम सप्ताह से लेकर फरवरी के पहले सप्ताह तक हमारी यह फसल चलेगी।

उन्होंने बताया कि एक बीघे में करीब 18 से 25 कुंटल तक बालियां हो जाती हैं जो इस समय बाजार में 12 सौ से लेकर 15 सौ रुपए क्विंटल तक आराम से बिक जाती है जिससे हमें अच्छी आय होती है।

कृषि रक्षा इकाई के अधिकारी सिद्धार्थ मिश्रा बताते हैं कि ठंड के मौसम में तैयार होने वाली मकई में आम दिनों में तैयार होने वाले मकई की अपेक्षा कीट पतंगे कम लगते हैं। इससे किसानों की लागत कम हो जाती है और उत्पादन अधिक होता है। अश्विनी से प्रेरित होकर गांव और आस-पास के क्षेत्र के कई किसान इस सीजन में मकई की खेती करने लगे हैं।

(बाराबंकी से गांव कनेक्शन रिपोर्टर वीरेंद्र सिंह के इनपुट के साथ)

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top