बजट 2019: किसान केंद्रित हुई देश की राजनीति

बजट 2019: किसान केंद्रित हुई देश की राजनीति

लखनऊ। चुनावी साल में मोदी सरकार की ओर से अंतरिम बजट 2019 में किसानों को सौगात दी गई है। किसानों को 6 हजार रुपये प्रति वर्ष की दर से मदद करने का ऐलान किया गया है। इससे पहले राहुल गांधी भी किसानों की कर्जमाफी का मुद्दा उठाते रहे हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हाल के दिनों में देश की राजनीति किसान केंद्रित हो चली है।

भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता राकेश टिकैत कहते हैं, ''यह लोग गांव को पूरी तरह से भूल गए थे। अब जो फैसले ले रहे हैं इससे लग रहा है कि इन्‍हें गांव और किसान फिर याद आ रहा है। हालांकि, 6 हजार रुपए से किसान संतुष्‍ट नहीं नहीं है। यह तो सिर्फ 500 रुपए महीना हुआ। हमने किसान के लिए 1 एकड़ पर 25 हजार देने की बात कही थी।''

भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता राकेश टिकैत।भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता राकेश टिकैत।

राकेश टिकैत कहते हैं, ''अगर सरकार किसानों को न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य ही दिलवा दे तो इसकी जरूरत ही न पड़े। किसानों की फसल उचित दाम पर बिक जाए इसके लिए कानून बनाना चाहिए। अगर कोई फसल को कम दाम में खरीदे तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए।'' राकेश टिकैत इस बात से संतोष जताते हैं कि अब देश में किसानों की बात होने लगी है। वो कहते हैं, ''अभी और बात होगी और लाभ मिलेगा। राजनीतिक पार्टियों को समझ आ गया है कि किसानों के बिना देश नहीं हो सकता।''

पिछले साल देश भर में कई किसान मार्च निकाले गए। भारतीय किसना यूनियन ने भी पिछले साल अक्‍टूबर में किसान क्रांति यात्रा निकाली थी। इस यात्रा में हजारों किसान हरिद्वार से चलकर दिल्‍ली पहुंचे थे। इन प्रदर्शनों की वजह से मोदी सरकार लगातार दबाव में दिख रही थी। इस तरह से कहा जा सकता है कि किसानों ने लड़कर अपनी बात राजनीतिक पार्टियों तक पहुंचाई है, जिसकी वजह से अब उनके मुद्दों और परेशानियों पर बात भी हो रही है।

उन्‍नत कृषि अभियान परिषद के सचिव और मध्‍य प्रदेश के प्रगतिशील किसान आकाश चौरसिया कहते हैं, ''किसानों के लगातार प्रदर्शन ने इतना तो कर दिया है कि राजनीतिक पार्टियां उनके बारे में सोचने लगी हैं। यही अच्‍छी बात है, लेकिन तरीका अभी सही नहीं है। किसी को 6 हजार रुपए देने भर से समस्‍या खत्‍म होने वाली नहीं। किसानों को नवाचार सिखाया जाए। सरकारों को प्रयास अच्‍छा है लेकिन अगर नवाचार नहीं सिखाया जाएगा तब तक उसका भला होने वाला नहीं। सरकार को इस दिशा में काम करना चाहिए।''

कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा।कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा।

वहीं, कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा की राय इस बजट को लेकर अलग है। वो कहते हैं, ''यह बजट किसाना केंद्रित नहीं, मिडिल क्‍लास केंद्रित है। किसानों के लिए तो बस खानापूर्ति कर दी गई है। कई हफ्तों से अटकलें थीं कि बजट में किसानों के लिए कुछ बेहतर होगा। मैं समझना चाहता हूं कि 6 हजार रुपए से क्‍या होगा। क्‍या 500 रुपए महीने से किसानों की समस्‍याएं खत्‍म हो जाएंगी? क्‍या इससे किसानों की आत्‍महत्‍याएं कम हो जाएंगी?''

''हमारे देश में इतनी संवेदना क्‍यों नहीं है कि हम समझें कि किसानों की समस्‍याएं क्‍या हैं। कम से कम आप 6 हजार का दोगुना करते कि यह तो कहा जाता तेलंगाना और ओडिशा से भी ज्‍यादा दिया है।'' - देविंदर शर्मा कहते हैं

बता दें, तेलंगाना की के. चंद्रशेखर राव की सरकार ने किसानों को उनके फसल के सीजन के आधार पर रुपए देने की योजना शुरू की है। एक एकड़ पर 4000 रुपए देने का प्रावधान है। ये रुपए साल में दो बार खरीफ और रबी के सीजन में दी जाती है। ऐसे में किसान को एक एकड़ जमीन पर 8000 रुपए साल में मिलना तय है। अगर किसी किसान के पास 5 एकड़ जमीन है तो साल में 40 हजार रुपए उसे मिलेंगे। ये किसानों के लिए बड़ी राहत है।

देविंदर शर्मा आगे कहते हैं, ''हालांकि मैं खुश हूं कि जिस डायरेक्‍ट इनकम सपोर्ट की बात मैं करते आ रहा था वो अब किसानों को मिल गई है। इससे पहले तेलंगाना और अब केंद्र ने भी इसे लागू कर दिया है।'' देविंदर शर्मा इस फैसले के राजनीतिक मायनों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ''इन्‍होंने दिसंबर से इस योजना को लागू कर दिया है। यानी चुनाव से पहले 2 हजार रुपए किसानों के खाते में चले जाएंगे। उनको लगता है कि इससे चुनाव पर असर पड़ेगा। अगर मध्‍य प्रदेश और हिंदी हार्ट लैंड में इनकी हार न हुई होती तो किसानों की बात न होती।''

देविंदर शर्मा पिछले साल मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थाना और छत्‍तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों की बात कर रहे हैं। इन चुनावों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था। इन तीन राज्‍यों के चुनाव में किसानों के मुद्दे अहम रहे और इन्‍हीं के इर्द गिर्द पूरा चुनाव लड़ा गया। चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने किसानों से 10 दिन के अंदर कर्ज माफी का वादा किया था, जिसका उन्‍हें फायदा भी मिला। राहुल ने चुनाव में जीत के इस फॉर्मूले को पकड़ लिया है और अब हर रैली में किसानों के कर्जमाफ करने की बात करते दिखते हैं।

किसान नेता सरदार वीएम सिंह।किसान नेता सरदार वीएम सिंह।

बजट को लेकर किसान नेता सरदार वीएम सिंह ने कहा, ''मैंने दिल्‍ली में 30 नवंबर के प्रदर्शन के दौरान ही कहा था कि अब अगला देश का चुनाव किसानों पर होगा। खेती जिंदा होगी तो बच्‍चे इस ओर लौटेंगे, क्‍योंकि रोजगार तो है नहीं। हालांकि इन लोगों ने अपनी हार से सबक नहीं सीखा है। यह जो 'पीएम किसान सम्मान निधि' लेकर आए हैं यह तो किसानों का 'अपमान' है। हम पांच साल से देख रहे थे कि आप वादा कब पूरा करेंगे, लेकिन आप तो बेवकूफ बना रहे हैं।''

वीएम सिंह कहते हैं, ''पीयूष गोयल ने आज बजट भाषण के दौरान कहा कि 6 हजार रुपए इस लिए दिए जा रहे हैं क्‍योंकि किसानों को एमएसपी नहीं मिल पा रही है। अब आंकड़े देखे जाएं तो मेरे पास अगर 5 एकड़ जमीन है तो इसपर मुझे एमएसपी (मिनमम सपोर्ट प्राइज) में कितना घाटा हो रहा हो। मान लीजिए 5 एकड़ में मेरा गेहूं 20 कुंतल हो रहा है और मुझे स्‍वामिनाथन वाली एमएसपी 2350 से 2400 रुपया मिलना चाहिए। लेकिन मेरा गेहूं 1400 में बिका तो मेरा करीब 40 हजार का नुकसान होता है। ऐसे ही गन्‍ने अगर मेरा 100 रुपए का बिक रहा है तो एक एकड़ पर मुझे 40 हजार का नुकसान हो रहा है। वहीं, 5 एकड़ पर मेरा नुकसान 2 लाख रुपए का है। अब 2 लाख के बदले आपने मुझे बड़े प्‍यार से दे दिया 6 हजार रुपया। यह तो झुनझुना है। आपने एक साल के अंदर मेरा खाद, मेरा बीज, मेरा रहन सहन हर चीज कितना महंगा हो गया है इस ओर ध्‍यान ही नहीं दिया।''

वीएम सिंह ने आगे कहा, ''सरकार ने बताया है कि 11 लाख 68 हजार रुपए किसानों का कर्जा है। साथ में यह भी कह रहे हैं कि सातवां वेतन लागू करेंगे। अब सातवां वेतन लागू होगा तो पूरे देश में 4 करोड़ 80 लाख रुपया एक साल का वेतन देना होगा। 1 लाख 2 हजार करोड़ सिर्फ केंद्र का वेतन था पिछले साल। ऐसे में 5 साल में आप 24 लाख करोड़ देंगे, लेकिन किसानों का 11 लाख 68 हजार रुपया आप दे नहीं रहे। आपके पास हमारे लिए पैसा नहीं है, लेकिन बाबू लोगों के लिए पैसा है।''

वीएम सिंह से मिलती जुलती बात ही वरिष्‍ठ कृषि पत्रकारा अरविंद सिंह भी करते हैं। वो कहते हैं, ''हम सब जान रहे हैं कि मर्ज कैंसर का है लेकिन मलहम लगा रहे हैं। हमें किसनों की फसलों के दाम पर काम करना चाहिए। क्‍या सरकार इस बारे में सोच सकती है कि अन्‍य वस्‍तुएं अपने एमआरपी से कम में बेची जाएं, तो फिर फसल के साथ ऐसा क्‍यों है। क्‍यों वो समर्थन मुल्‍य से कम में बेची जा रही है। यह देखने में आया है कि पिछले तीन राज्‍यों के चुनाव में किसान केंद्र में रहा। अब लोकसभा में भी केंद्र में किसान ही है। चाहे वो बीजेपी हो या फिर कांग्रेस, दोनों के लिए यह किसानों का महत्‍व है।''

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