न तंगी थी न तनाव फिर क्यों ली 11 लोगों ने अपनी जान

मरने वालों में सात महिलाएं थीं इनमें से एक की सगाई 17 जून को तय हुई थी। पड़ोसियों के मुताबिक, घटना से पहले 30 जून की शाम को लगभग सभी सदस्य अपने रोजमर्रा के काम से सामान्य दिन की तरह वापस आए। बच्चे भी शाम को रोज की तरह अपने दोस्तों के साथ गली में खेले।

न तंगी थी न तनाव फिर क्यों ली 11 लोगों ने अपनी जान

नई दिल्ली । रविवार को उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी इलाके में एक ही परिवार के 11 लोग अपने घर में मृत पाए गए। जिस हालत में उनके शव मिले अंदाजा यह लगाया गया कि संभवत: उन्होंने आत्महत्या की थी। कुछ मृतकों की पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट आ गई है जिसमें फांसी के जरिए दम घुटने को मौत की वजह बताया गया है। मृत परिवार के पड़ोसियों और रिश्तेदारों का कहना है कि इस परिवार को न पैसे की तंगी थी न किसी किस्म का डिप्रेशन या तनाव। फिलहाल पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है और मामले की जांच कर रही है पर बड़ा सवाल यही है कि जब सबकुछ सही था तब 11 लोगों ने इतना भयानक कदम क्यों उठाया?

बातें जो पता चलीं

मृतकों में सबसे बुजुर्ग महिला 77 साल की थीं, सबसे कम उम्र के दो किशोर लगभग 16-17 वर्ष के रहे होंगे। मरने वालों में सात महिलाएं थीं इनमें से एक की सगाई 17 जून को तय हुई थी। पड़ोसियों के मुताबिक, घटना से पहले 30 जून की शाम को लगभग सभी सदस्य अपने रोजमर्रा के काम से सामान्य दिन की तरह वापस आए। बच्चे भी शाम को रोज की तरह अपने दोस्तों के साथ गली में खेले।

अगले दिन सुबह 7 बजे के बाद भी जब इनके घर का दरवाजा नहीं खुला तो पड़ोसी गुरचरन सिंह ने आवाज लगाई, मेनगेट खुला था इसलिए अंदर गए पर वहां का नजारा देखकर हैरान रह गए। परिवार के 10 लोग घर में चुन्नियों के सहारे लटके हुए थे, बुजुर्ग महिला का शव दूसरे कमरे में फर्श पर पड़ा था। घर का पालतू कुत्ता बंधा हुआ था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक बुजुर्ग महिला की गला घोंट कर हत्या की गई है।



सवाल जिनके जवाब नहीं मिले

सवाल तो ढेरों हैं फिर भी कुछ बातें पूरी तरह समझ नहीं आतीं जैसे,अगर यह सामूहिक आत्महत्या थी तो बुजुर्ग महिला का गला क्यों घोंटा गया? किसी ने कोई सुसाइड नोट क्यों नहीं छोड़ा? मृतकों के हाथ और पैर क्यों बंधे थे, उनकी आखों और मुंह पर भी पट्टियां थीं।

क्या अंधविश्वास ने ली जान

मृतकों के घर से एक डायरी मिली है, जिसमें कुछ ऐसा लिखा हुआ है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह मामला धार्मिक अंधविश्वास का या तंत्र-मत्र का हो सकता है। इस डायरी में जैसा विवरण दिया है लगभग उसी तरह से लोगों ने आत्महत्या भी की है। मसलन, एक जगह लिखा है, "'पट्टियां अच्छे से बांधनी है। शून्य के अलावा कुछ नहीं दिखना चाहिए। रस्सी के साथ सूती चुन्नियां या साड़ी का प्रयोग करना है।" डायरी में इस 'क्रिया' को करने की समय और तारीख भी बताई गई है। डायरी में लिखा है, "सात दिन बाद पूजा लगातार करनी है। थोड़ी लगन और श्रद्धा से। कोई घर में आ जाए तो अगले दिन। गुरुवार या रविवार को चुनिए।" डायरी में क्रिया के लिए रात 1 बजे का वक्त बताया गया है। साथ ही लिखा गया है, "क्रिया के दौरान घर में मद्धम रोशनी हो। हाथ की पट्टियां बच जाएं तो उसे आंखों पर डबल कर लेना। मुंह की पट्टी को भी रूमाल से डबल कर लेना। जितनी ढृढता और श्रद्धा दिखाओगे उतना ही उचित फल मिलेगा।"

दिल्ली में पहले भी हुई हैं सामूहिक आत्महत्याएं

दिल्ली में इससे पहले भी लोगों ने एक साथ खुदकुशी की है। लेकिन इन सभी घटनाओं के पीछे पैसे की कमी, परिवार में किसी की बीमारी या मौत की वजह से डिप्रेशन जैसी बातें वजहें रही हैं। इन घटनाओं में लोगों ने जहर खाकर, फांसी लगाकर यहां तक कि आत्मदाह तक करके जान दी थी। फरवरी 2018 में ही दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में एक दंपत्ति ने आर्थिक तंगी की वजह से जान दी थी। मरने से पहले उन्होंने रांची में अपने परिवार को व्हट्सऐप पर जानकारी भी दी थी।

क्या धर्म या मोक्ष के लिए कोई अपनी और अपनों की जान ले सकता है

बड़ा सवाल है कि जब परिवार में सुख शांति हो, किसी किस्म की कोई कमी न हो और कुछ दिनों बाद परिवार में शादी होनी हो तब क्या महज मृत्यु के बाद के सुखद जीवन की काल्पनिक छवि के लिए कोई ऐसा करेगा। हमने यही सवाल पूछा लखनऊ की मशहूर मनोचिकित्सक डॉ. शाजिया सिद्दीकी से, तो उन्होंने कहा, "धार्मिक आस्था ऐसी ही होती है कि मोक्ष या फिर ईश्वर का सान्निध्य पाने जैसी इच्छाओं के लिए लोग तर्क को किनारे करके ऐसा कर जाते हैं। भारत में वैसे भी अंधविश्वास काफी ज्यादा है। लेकिन यह तय है कि आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाने वाले इन लोगों के जीवन में कहीं न कहीं असंतोष जरूर रहा होगा जिसके उपाय के रूप में इन्हें मोक्ष की जरूरत महसूस हुई होगी। उनके लिए इस अंसतोष से बचने का यही बेहतर रास्ता रहा होगा कि जिंदगी से दूर हो जाएं। आपके और हमारे लिए यह आत्महत्या है या बुरी बात है लेकिन उनकी नजर में यही बेहतर विकल्प रहा होगा। इसलिए इसमें हैरान होने वाली बात नहीं है।"

क्या इस तरह के लोगों को पहचान कर उनकी मदद की जा सकती है? यह पूछने पर शाजिया ने कहा, "ऐसे लोगों को पहचाना जा सकता है। जब किसी का बर्ताव अचानक बदल जाए, वह लोगों से कटा-कटा रहे, कम मिले-जुले तो समझ लेना चाहिए कि वह डिप्रेशन से गुजर रहा है। ऐसे व्यक्तियों के जीवन में अपने लिए कोई मकसद नहीं दिखाई देता। लेकिन यह भी सही है कि आत्महत्या इतना सरल काम नहीं है। ऐसी सोच रखने वाला शख्स पहले असमंजस में रहता है। जीवन में क्या कुछ बचा है? आत्महत्या करना आखिरी उपाय है या नहीं इससे जुड़े सवाल वह अपने आसपास के लोगों से करता है। अगर हम इसी समय भांप जाएं तो उसे डॉक्टरी परामर्श या सहायता दे सकते हैं। जैसे इस मामले में बच्चों के बर्ताव में बदलाव आया होगा, अगर उनके स्कूल में टीचर इस पर ध्यान देते तो शायद वे लोग बच जाते।"

शाजिया कहती हैं, "परिवार का सपोर्ट और हौसला बढ़ाने की बातें डिप्रेशन के जाल में फंस रहे शख्स को निकाल सकते हैं। लेकिन उसके साथ डॉक्टर के पास चलने या दूसरी बातों को लेकर जोर जबर्दस्ती न की जाए बल्कि उसे अहसास कराया जाए कि उसके साथ बाकी लोग भी हैं, दुनिया में उसकी जरूरत है, उसका मकसद है वगैरह तो ज्यादा फायदा होता है।"

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