नहर में बह रहा 'जहर', इसी से खेती कर रहे हैं किसान, नहीं उगा पाते खुद का अनाज

Ranvijay Singh

Ranvijay Singh   25 July 2019 1:39 PM GMT

रणविजय सिंह/मिथ‍िलेश दुबे

कानपुर। सड़क किनारे बनी एक नहर में पीले रंग के गाज से भरा हुआ पानी बह रहा है। इस पानी से सड़ांध सी बदबू आ रही है। कानपुर के जाजमऊ के करीब 300 हेक्‍टेयर में बसे कई गांव के किसान खेती के लिए इसी पानी का इस्‍तेमाल करते हैं।

इस नहर के पास ही बैठे जाजमऊ के पेउंदी गांव के रहने वाले सोनेलाल यादव (50 साल) बताते हैं, ''टेनरियों (चमड़े के कारखाने) और सीवरेज के गंदे पानी को ट्रीट करके हमें सिंचाई के लिए दिया जाता है। इस पानी से हमारे यहां की खेती बर्बाद हो गई है। लेकिन मरता क्‍या न करता, हमारे पास सिंचाई की और कोई व्‍यवस्‍था नहीं है, ऐसे में इस पानी को ही इस्‍तेमाल करना होता है। इससे हमारे खेत जल जाते हैं, हम खाने के लिए कुछ उगा नहीं पाते, लेकिन हम मजबूर हैं।''

सोनेलाल यादव की तरह ही कानपुर के जाजमऊ के आस पास के कई गांव के किसान परेशान हैं। इनकी परेशानी की वजह इलाके में बनी इरीगेशन चैनल (सिंचाई के लिए नहर) है। इस चैनल से इन्‍हें सिंचाई का पानी मिलता है। वो पानी जो टेनरियो के कारखाने और शहर के सीवरेज से पंप करके कंबाइंड एफ्लुअन्ट ट्रीटमेंट प्‍लांट (सीईटीपी) में भेजा जाता है, जहां इसे ट्रीट करके इरीगेशन चैनल में डाला जाता है, जिससे इलाके के किसान खेती करते हैं।

1994 तक इरीगेशन चैनल में जो पानी डाला जाता था वो शहर के सीवरेज को गंगा के पानी के साथ मिलाकर डाला गया पानी होता था। इस पानी में ऐसे मिनरल्स होते थे, जिससे खेती अच्‍छी होती थी। बाद में गंगा एक्शन प्लान फेज I के तहत जजामऊ में कंबाइंड एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की स्थापना की गई, जिसके बाद इरीगेशन चैनल में डाले जाने वाले पानी की संरचना ही बदल गई। अब इस पानी में गंगा का पानी नहीं होता सिर्फ ट्रीट किया हुआ पानी होता है, जिसमें आर्सेनिक, क्रोमियम, मरकरी, चूना जैसे कैमिकल होते हैं, जिनसे फसल और खेतों को नुकसान पहुंच रहा है।


पेउंदी गांव के ही रहने वाले किसान सूर्यकांत यादव (45 साल) कहते हैं, ''पहले जाजमऊ में इतनी टेनरिया नहीं थीं, साथ ही गंगा का पानी सीवरेज में मिलाकर भेजा जाता था, जिससे खेती अच्‍छी होती थी। बाद के दिनों में जाजमऊ में तेजी से टेनरिया बढ़ गईं। इसके बाद से हालात बदल गए हैं।''

सूर्यकांत बताते हैं, ''इस इलाके में पहले गुलाब की खेती होती थी। इतनी ज्‍यादा कि एक बीघे में सवा कुंतल तक गुलाब निकलता था। अब तो गांव में पूजा के लिए भी गुलाब खोजने से नहीं मिलेंगे। उस वक्‍त बहुत अच्‍छी पैदावार थी, बहुत अच्‍छा पैसा भी मिलता था। पूरा घर खेतों में लगा रहता था, अब तो गांव के लोग ही टेनरियों में काम करने जाते हैं। क्‍योंकि इस पानी से फसल तो खराब हुई ही, मिट्टी भी खराब हो गई है।''

जुलाई के महीने में जब उत्‍तर प्रदेश के ज्‍यादातर इलाकों में धान की रोपाई होते दिखना आम बात होती है। उस वक्‍त यहां के खेतों में सिर्फ ज्‍वार देखने को मिलते हैं। इसके पीछे की वजह पर बात करते हुए सोनेलाल यादव कहते हैं, ''यहां के किसान नहर के पानी से खुद के खाने के लिए कुछ नहीं उगाते। साथ ही अगर कभी कुछ उगाया भी तो वो होता नहीं है। गर्मियों में यह पानी इतना खतरनाक होता है कि खेतों में लगी किसी भी फसल को जला देता है, ऐसे में ज्‍वार एक ऐसी फसल है जो आसानी से हो जाती है। साथ ही किसान इसे अपने मवेशियों को खिलाता है और इसे बेचकर कुछ कमाई भी हो जाती है।'' सोनेलाल बताते हैं, इलाके के कई गांव जैसे पेउंदी, शेखपुर, जाना, किशनपुर, मदारपुर, त्रिलोकपुर, मवैया में इसी पानी से सिंचाई की जाती है।

ऐसा नहीं है कि इस समस्‍या को लेकर गांव के लोगों ने आवाज नहीं उठाई है। वक्‍त वक्‍त पर लोग इसकी शिकायत करते आए हैं, लेकिन मामला सिफर ही रहा है। 2002 में इस समस्‍या को लेकर एक पब्‍लिक हियरिंग (जन सुनवाई) भी हुई थी। इसमें इस क्षेत्र के प्रभावित लोग, कानपुर के उप महापौर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के वैज्ञानिक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अधिकारी के साथ ही कई विशेषज्ञ शामिल थे।

इलाके के किसान जुलाई के महीने में भी ज्‍वार लगाए हैं। इसे वो अपने पशुओं को खिलाते हैं और इसे बेचते भी हैं, जिससे कुछ आमदनी हो जाए।

इस जन सुनवाई में इको फ्रेंड्स संस्‍था की सर्वेक्षण रिपोर्ट और आईआईटी कानपुर की सर्वेक्षण रिपोर्ट को सामने रखा गया था। रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि सिंचाई के लिए दिए जा रहे पानी के अलावा यहां के भूजल भी खराब है। जाजमऊ के वाजिदपुर और शेखपुर गांवों में भूमिगत पानी में आर्सेनिक, कैडमियम, मरकरी, निकेल, क्रोम VI,एंडोसल्फान और डिडिलरीन के खतरनाक स्तर पाए गए थे।

जन सुनवाई में यह तय किया गया था कि सिंचाई के पानी में टेनरियों के अपश‍िष्‍ट को ट्रीट करके नहीं मिलाया जाएगा, हालांकि ऐसा हुआ नहीं। इको फ्रेंड्स के एग्जीक्यूटिव सेकरेट्री पीयूष जायसवाल बताते हैं, ''2002 में हुई जन सुनवाई के बाद कुछ काम हुए थे। कई गांव में डीप बोर किए गए और पानी की टंकी बनाई गई ताकि लोगों को साफ पीने का पानी मिल सके। यह काम हुए भी, लेकिन कहीं बोर सूख गए तो कहीं मशीन ही खराब पड़ी है। जिस तरीके से सरकारी काम होता है यहां वैसा ही हाल हुआ।''

''जहां तक बात सिंचाई के पानी की है तो टेनरियों से जबतक अपशिष्‍ट आता रहेगा वो ट्रीट करके नहर में भेजा जाएगा। ऐसे में किसानों के पास कोई चारा नहीं है। अगर वो पानी नहीं भी लेंगे तो यह पानी रिसकर उनके खेतों तक पहुंच ही जाएगा।''- पीयूष जायसवाल कहते हैं


ऐसे में सवाल उठता है कि हर दिन इरीगेशन चैनल में कितना पानी ट्रीट करके डाला जा रहा है। इसका जवाब जल निगम के प्रोजेक्ट मैनेजर घनश्याम द्विवेदी देते हैं। वो बताते हैं, ''जल निगम रोजाना 150 से 160 एमएलडी (मेगालीटर प्रति दिन) ट्रीट किया हुआ पानी इरीगेशन चैनल में डालता है। यह पानी 300 हेक्‍टेयर में फैले इलाके में इस्‍तेमाल होता है। पूरे साल भेजे जा रहे इस पानी को किसान इस्‍तेमाल करते हैं, नहीं तो यह नाले में बहा दिया जाता है।''

फिलहाल जाजमऊ में सोनेलाल और सूर्यकांत यादव जैसे बहुत से लोग खेती में इसी पानी का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। हालांकि वो खुद के खाने के लिए फसल नहीं उगा रहे, लेकिन पशुओं के चारे से भी पशुओं को नुकसान पहुंच रहा है, साथ ही उनके दूध से उन तक भी बीमारियां पहुंच रही हैं। वहीं, खेते में फैल हरे जहरीले पानी के अलावा इलाके में फैली दुर्गन्ध भी लोगों को सांस संबंधी बीमारी बांट रही है। इन सब से आजिज आ चुके इलाके के लोगों के लिए यह समस्‍या हल न हो पाने वाली समस्‍या बनकर रह गई है।


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