जेटली जी, काजल-लिपस्टिक से ज्यादा जरूरी था सेनेटरी नैपकिन टैक्स फ्री रखते ... 

जेटली जी, काजल-लिपस्टिक से ज्यादा जरूरी था सेनेटरी नैपकिन टैक्स फ्री रखते ... 12 फीसदी टैक्स वाली लिस्ट में सैनिटरी नैपकिन को शामिल करने पर हो रहा विरोध 

30 जून से देश में जीएसटी लागू हो रहा है, लेकिन देश की महिलाएं नाराज हैं। सरकार ने नई कर दरों में कई गैर जरुरी चीजों को टैक्स फ्री कर दिया है लेकिन माहवारी जैसी प्राकृतिक और अनिवार्य प्रक्रिया के मद्देनजर सेहत के लिए जरुरी सेनेटरी नैपकिन पर 12 फीसदी टैक्स लगाया है, जिसका विरोध हो रहा है।

लखनऊ। 30 जून को आधी रात से पूरे देश में जीएसटी लागू कर दिया जाएगा। एक देश एक कर के स्लोगन के साथ सरकार के अतिमहत्वकांक्षी जीएसटी बिल की चर्चा काफी समय से जोरों पर थी। हालांकि पिछले दिनों जीएसटी की लिस्ट आने के बाद इस पर बहस बढ़ गई। जीसएटी स्लैब में बिंदी, आईलाइनर, चूड़ी और यहां तक कि गर्भ निरोधक और कंडोम पर कोई टैक्स नहीं लगाया गया, वहीं दूसरी ओर सैनिटरी नैपकिन को लक्जरी लिस्ट में शामिल करके 12 फीसदी टैक्स स्लैब में शामिल किया गया है।

जीएसटी स्लैब में बिंदी, आईलाइनर, बिंदी, चूड़ी और यहां तक कि गर्भ निरोधक और कंडोम में कोई टैक्स नहीं लगाया गया वहीं दूसरी ओर सैनिटरी नैपकिन को लक्जरी लिस्ट में शामिल करके 12 फीसदी टैक्स स्लैब में शामिल किया गया है।

सरकार के इस फैसले का काफी विरोध किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि सरकार का यह फैसला ऐसे समय में लिया गया जब देश में पहले से ही सैनिटरी नैपकिन को करमुक्त किए जाने का अभियान चलाया जा रहा है।

फिलहाल सैनिटरी नैपकिन पर 14 फीसदी टैक्स लगाया जाता है इस लिहाज से जीएसटी में 12 फीसदी टैक्स के साथ इनके दाम कुछ घटेंगे लेकिन मुद्दा ये है कि महिलाओं के लिए बिंदी और काजल से भी ज्यादा जरूरी इस चीज पर लग्जरी वस्तु जितना टैक्स क्यों लगाया जा रहा है।

इस बारे में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता वीणा राणा कहती हैं, “ये सरकार की तरफ से बेहद असंवेदनशील रवैया है। इस समय सैनिटरी नैपकिन को टैक्स फ्री करने को लेकर इतनी बड़ी मुहिम चल रही है। उसके बावजूद सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। उनका ये स्टेप सरकार की महिलाओं के स्वास्थ्य पर अनदेखी दिखा रही है।”

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मैं कई ग्रामीण इलाकों में कैंपेनिंग के दौरान गई हूं जहां महिलाओं के पास कॉटन कपड़ा तक उपलब्ध नहीं है। हमने खुद बचपन में कपड़ा इस्तेमाल किया है लेकिन उसकी साफ-सफाई का हमेशा ध्यान रखा। फिनायल में धोकर धूप में सुखाकर ही कपड़ा इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन सोशल टैब्यू की वजह से न तो महिलाएं इसे मैनेज कर पाती हैं और कपड़ा भी उन्हें मिल नहीं पाता। राख, मिट्टी और बालू का इस्तेमाल करके वे अपने स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है।

हमारी पिछली राज्य सरकार ने भी हमारे कई कैंपेन में भागीदारी निभाई। छोटे स्तर पर लड़कियों को फ्री नैपकिंस बांटे लेकिन बात जब बड़ी तस्वीर की होती है तो सरकार पीछे हट गई।

क्या है #LahuKaLagaan

सैनिटरी नैपकिन को करमुक्त करने के लिए सोशल मीडिया पर इसी साल अप्रैल से लहु का लगान नाम से अभियान चलाया जा रहा है। यह मुहिम शीसेज़ फाउंडेशन के द्वारा चलाई जा रही है जिसकी सीईओ त्रिशा शेट्टी है। इसमें सैनिटरी नैपकिन को टैक्स फ्री करने का मुद्दा उठाया गया था और इसे आम लोगों से लेकर सेलिब्रिटीज तक ने बुलंद आवाज में सपोर्ट किया था।

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इस मुहिम के जरिए महिलाओं के स्वास्थ्य और मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर कई तथ्य सामने आए हैं जिनमें कुछ प्रमुख हैं-

  • भारत में सैनिटरी नैपकिन का कारोबार 1990 में 30 करोड़ से 2016 में 2900 करोड़ तक बढ़ा है।
  • लेकिन भारत में 12 फीसदी महिलाएं ही पैड इस्तेमाल करती हैं
  • 23 फीसदी लड़कियां पीरियड्स के चलते स्कूल छोड़ देती हैं
  • 70 फीसदी महिलाएं सैनिटरी पैड इस्तेमाल ही नहीं करती

महिला संगठन पिछले कई महीनों से लगातार उठा रहे थे आवाज़।

सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल न करने की वजह है इसकी ज्यादा कीमत

वहीं जब ग्रामीण महिलाओं के पीरियड्स के दौरान राख या कपड़ा इस्तेमाल करने के पीछे वजह पर तथ्य सामने आए तो यह हमारे भ्रम को पूरी तरह तोड़ते हैं।

इन तथ्यों के अनुसार 80 फीसदी महिलाएं सैनिटरी नैपकिन इसलिए इस्तेमाल नहीं कर पातीं क्योंकि उसकी कीमत ज्यादा होती है। वहीं दूसरे नंबर पर इसके पीछे वजह सैनिटरी पैड्स को लेकर जागरुक होना नहीं है।

तीसरी वजह कपड़े का आसानी से मिल जाना

चौथी वजह नैपकिन को लेकर मिथक

पांचवी वजह कपड़ा इस्तेमाल करने में आसान

छठी वजह पारंपरिक अभ्यास

सातवी वजह पारिवारिक दबाव

नैपकिन की कीमत कम करने के लिए पहले भी उठ चुकी है मांग

इससे पहले इसी साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दिल्ली सरकार ने अपने बजट में सैनिटरी नैपकिन पर टैक्स कम करने की वकालत की थी और साथ ही अपने आगामी बजट में नैपकिन पर 12 फीसदी टैक्स घटाकर 5 फीसदी कर दिया था।

पिछले साल केंद्र सरकार ने स्कूल जाने वाली लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के लिए फंड को अनुमोदित किया था। इसमें प्रति पैड के लिए छह रुपए देकर जरूरतमंद लड़कियां आशा बहुओं से नैपकिन प्राप्त कर सकती थीं।

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2011 में तमिलनाडु की दिवगंत मुख्यमंत्री जयललिता ने नैपकिन क्रांति लॉन्च की थी जिसमें ग्रामीण इलाके की 41 लाख से अधिक किशोरी लड़कियों (10-19 वर्ष ) के साथ सात लाख माएं, और 700 से ऊपर महिला कैदियों को मुफ्त में नैपकिन देने की योजना थी।

साल 2014 में स्वच्छ भारत मिशन के तहत पीएम नरेंद्र मोदी ने सैनिटरी पैड के निस्तारण की योजना भी शामिल थी।

एनजीओ बना रहे कम कीमत वाले नैपकिन

भारत में कई ऐसे एनजीओ भी हैं जो कम कीमत में सैनिटरी नैपकिन बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसमें सबसे पहले नाम पैडमैन नाम से मशहूर तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनाथम ने महिलाओं की पीरियड्स के दौरान सेनिटरी नैपकिन का खर्च ने उठा पाने की समस्या पर काम किया था और लो कॉस्ट यानी कम कीमत वाले सैनिटरी नैपकिन प्रोड्यूस किए थे।

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मध्यप्रदेश में नयन हाइजीन और हेल्थ केयर एक रुपए में नैपकिन बेचता है। मध्यप्रदेश सरकार के साथ मिलकर आजीविका मिशन नाम की संस्था भी बीस रुपए में आठ पैड का पैकेट बेचती है।

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