उच्च न्यायालय ने जेएनयू से कहा- स्थिति सुधारने के लिए बाहरी लोगों को परिसर में घुसने से रोकें

गाँव कनेक्शनगाँव कनेक्शन   12 April 2017 10:00 PM GMT

उच्च न्यायालय ने जेएनयू से कहा- स्थिति सुधारने के लिए बाहरी लोगों को परिसर में घुसने से रोकेंकोर्ट

नई दिल्ली (भाषा)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज सलाह दी कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में चीजें सुधारने के लिए बाहरी लोगों को परिसर में घुसने से रोकना चाहिए। अदालत ने साथ ही कहा कि दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र परिसर में ‘‘ज्यादा सक्रिय'' हैं और संस्थान के कामकाज में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति संजीव सचदेव ने कहा, ‘‘हमें दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्रों को परिसर में घुसने से रोकना होगा। अगर जेएनयू परिसर में बाहरी लोगों के प्रवेश मंजूरी ना हो तो चीजें सुधरेंगी।'' उन्होंने कहा, ‘‘हर दिन हम अखबारों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बारे में पढ़ रहे हैं'' और अदालत में मौजूद विश्वविद्यालय प्रशासन तथा जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष से पूछा कि ‘‘क्या कोई शिक्षा संस्थान इस तरह से काम करता है?'' न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि छात्रों एवं कॉलेज प्रशासन के बीच सार्थक बातचीत हो ताकि मुद्दों का हल परिसर के अंदर ही हो जाए।''

अदालत ने साथ ही कहा कि आज दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र जेएनयू के कामकाज में हस्तक्षेप कर रहे हैं और परिसर में अपना राजनीतिक एजेंडा लागू करते हैं। अदालत ने कहा, ‘‘जेएनयू को पिछले कई दशकों से परिसर के भीतर उसकी खुद की संस्कृति के लिए जाना जाता है। वह कभी भी दूसरों को अपने कामकाज में हस्तक्षेप की मंजूरी नहीं देता लेकिन आज बाहरी लोग परिसर में ज्यादा सक्रिय है।'' अदालत ने कहा कि केवल जेएनयू के छात्रों को ही इस बात का फैसला करने की मंजूरी होनी चाहिए कि उनका विश्वविद्यालय कैसे काम करेगा।

अदालत ने जेएनयू प्रशासन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सब कहा। याचिका में अदालत से छात्रों को विश्वविद्यालय के प्रशासनिक खंड के 100 मीटर के दायरे में किसी भी तरह का प्रदर्शन करने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की गई। अदालत ने गत 17 मार्च को छात्रों को प्रशासनिक खंड के 100 मीटर के दायरे में प्रदर्शन करने से रोकने के अपने आदेश को सुधारते हुए निर्देश दिया था कि अगर कोई विरोध प्रदर्शन हो तो वह शांतिपूर्ण हो और उससे प्रशासनिक खंड की तरफ जाने वाला रास्ता बाधित ना हो।

जेएनयू की वकील मोनिका अरोड़ा ने ‘‘अदालत से तत्काल हस्तक्षेप करने'' की मांग करते हुए कहा कि 23 मार्च को छात्रों ने एक धरना दिया, प्रशासनिक खंड के ठीक बाहर कुलपति का पुतला जलाया और विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अंदर आने, बाहर निकलने का रास्ता बंद कर दिया। उन्होंने साथ ही अदालत से जेएनयू छात्रों एवं छात्र संघ को परिसर के छात्रावासों के प्रवेश द्वार के पास लगाए गए सीसीटीवी कैमरे लौटाने का निर्देश देने को भी कहा जिन्हें उन्होंने वहां से हटा दिया। हालांकि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष मोहित पांडे ने इसका विरोध करते हुए कहा कि छात्र संघ ने कैमरे नहीं हटाए हैं। उन्होंने कहा कि कॉलेज प्रशासन ने कैमरे लगाने से पहले उनसे संपर्क नहीं किया था और इनके जरिए वह छात्रों पर निगरानी रखने की कोशिश कर रहा है। इसपर अदालत ने छात्र संघ के अध्यक्ष एवं महासचिव से पूछा कि वे निगरानी से क्यों डरते हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘अगर आप (जेएनयू छात्र) कुछ गलत नहीं कर रहे तो आपको सीसीटीवी का क्या डर है?'' और इनसे छात्रों की निजता से समझौता नहीं होगा। अदालत ने जेएनयू प्रशासन से परिसर के संवेदनशील इलाकों में सीसीटीवी कैमरे ना लगाने को कहा। अदालत ने छात्र संघ के अध्यक्ष से कहा कि वे कॉलेज प्रशासन के साथ अपनी समस्याओं पर चर्चा करें ताकि मुद्दों का हल हो। न्यायाधीश ने कहा कि अदालत ने अगर छात्रों में थोडा भरोसा दिखाया है तो उन्हें भी अदालत के निर्देश का पालन करना चाहिए। अदालत ने अब अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित की है और तब तक दोनों पक्षों से बैठक के नतीजे को लेकर स्थिति रिपोर्ट देने को कहा।

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