इलाहाबाद हाईकोर्ट की 150वीं सालगिरह पर पढ़िए यहां किये गये कुछ ऐतिहासिक फैसलों के बारे में

इलाहाबाद हाईकोर्ट की  150वीं सालगिरह पर पढ़िए यहां किये गये कुछ ऐतिहासिक फैसलों के बारे मेंइलाहाबाद हाईकोर्ट।

इलाहाबाद। आज इलाहाबाद हाईकोर्ट की 150वीं सालगिरह है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का इतिहास यूं तो बेहद गौरवशाली रहा है लेकिन इसके ऐतिहासिक फैसलों ने पूरी दुनियाभर में इसे खूब मशहूर किया। आइये आपको इलाहाबाद हाईकोर्ट के पांच बड़े ऐतिहासक फैसलों के बारे में बताते हैं।

राम मंदिर पर ऐतिहासिक फैसला

अयोध्या पर मुकदमा 60 साल से अधिक वक्त तक चला। माना जा रहा है कि ये अपने आप में पहला ऐसा संवेदनशील मुकदमा रहा जिसको निपटाने में इतना लंबा वक्त लगा। इसमें कुल 82 गवाह पेश हुए। हिन्दू पक्ष की ओर से 54 गवाह और मुस्लिम पक्ष की ओर से 28 गवाह पेश किये गये। हिन्दुओं की गवाही 7,128 पन्नों में लिखी गई जबकि मुसलमानों की गवाही 3,343 पन्नों में दर्ज़ हुई।

पुरातात्विक महत्व के मुद्दों पर हिन्दुओं की ओर से 4 गवाह और मुसलमानों की ओर से 8 गवाह पेश हुए। इस मामले में हिन्दू पक्ष की गवाही 1,209 और मुस्लिम पक्ष की गवाही 2,311 पन्नों में दर्ज की गयी। इतनी लंबी सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन जजों की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जो विवादित ढांचा था वो एक बड़े भग्नावशेष पर खड़ा था। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि वो 12वीं शताब्दी के राम मंदिर को तोड़कर बनाया गया था, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि वो किसी बड़े हिन्दू धर्मस्थान को तोड़कर बनाया गया और न्यायमूर्ति खान ने कहा था कि वो किसी पुराने ढांचे पर बनाया गया था।

6 साल तक चुनाव लड़ने पर लगी थी रोक

1971 के लोकसभा चुनावों में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को शानदार जीत हासिल हुई, लेकिन उनसे चुनाव हारे समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनाव परिणाम को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दे डाली। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने जून 1971 को एतिहासिक फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी का चुनाव परिणाम निरस्त कर दिया। साथ ही अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के दूसरे अहम फैसले

  1. कानपुर बम कांड
  2. आगरा कॉन्सपिरेसी
  3. चौरी-चौरा बम कांड

इलाहाबाद हाईकोर्ट का इतिहास

1861 में पारित भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, जिसके ज़रिए ब्रिटेन की महारानी को उच्चतम न्यायालयों और सदर अदालतों को खत्म करने और उनकी जगह बम्बई, कलकत्ता और मद्रास की तीनों प्रेसीडेंसियों एक-एक उच्च न्यायालय के गठन का अधिकार दिया गया, इसी अधिनियम की धारा-16 के जरिए क्राउन को ब्रिटिश भारत में किसी अन्य उच्च न्यायालय का गठन करने का अधिकार भी दिया गया था।

इसी धारा से मिली शक्तियों के आधार पर क्राउन ने लेटर्स पेटेंट के जरिए फोर्ट विलियम की प्रेसीडेंसी के उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों के लिये एक उच्च न्यायालय का गठन 1866 में आगरा में किया। बाद में उच्च न्यायालय की जगह बदलकर 1869 में इसे आगरा से इलाहाबाद शिफ्ट कर दिया गया। 1919 में 11 मार्च को जारी एक पूरक लेटर्स पेटेंट द्वारा इसका पदनाम बदलकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय यानि द हाईकोर्ट आफ जूडीकेचर ऐट इलाहाबाद कर दिया गया।

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