Top

'हमारे लिए तो अभी तक लॉकडाउन ही लगा है', जयपुर में पर्यटन से जुड़े लोगों पर छाए बेरोजगारी के बादल

कोरोना महामारी की वजह से राजस्थान के पर्यटन उद्योग से जुड़े करीब 10 लाख लोगों की आजीविका संकट में है। इनके लिए छह महीनों बाद भी हालात लॉकडाउन जैसे ही हैं।

हमारे लिए तो अभी तक लॉकडाउन ही लगा है, जयपुर में पर्यटन से जुड़े लोगों पर छाए बेरोजगारी के बादलसीजन के समय मे भी चौपाटी में फोटोग्राफी का काम कर रहे सोहेल को पहले की तरह नहीं मिल रहे ग्राहक।

अवधेश पारीक, जयपुर

कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन को खोलने के लिए चल रहे चरणबद्ध अनलॉकडाउन-5 में अब अक्टूबर का महीना है लेकिन पर्यटकों से गुलजार रहने वाली गुलाबी नगरी को इससे पहले ऐसा सूनसान नसीब नहीं हुआ, उसी पिंक सिटी की गलियां आज अपने पावणों की बांट जोह रही हैं।

"मैंने इससे पहले जल महल की पाल इतनी खाली कभी नहीं देखी, यहां रविवार के दिन पैर रखने की जगह नहीं होती थी," जल महल की पाल पर बच्चों के लिए खिलौना गाड़ी चलाने वाले 26 साल के कैलाश मावत अपने शब्दों में बयां करते हैं।

मानव जाति को झकझोर देने वाली कोरोना महामारी ने पर्यटन नगरी राजस्थान की कमर तोड़ दी है। दुनिया को लुभाने वाली राजधानी जयपुर के स्मारक और पर्यटन स्थलों का ढ़ांचा कोरोना वायरस के हमले से चरमरा गया है।

एक अनुमान के मुताबिक राजस्थान के पर्यटन उद्योग पर करीब 10 लाख से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी निर्भर है लेकिन पिछले छह महीनों से ठप पड़े पर्यटन के बाद अब इससे जुड़े होटल, ट्रेवल्स सेक्टर, गाइड्स, हॉकर, फोटोग्राफर, महावत, लोक कलाकार और पर्यटन से जुड़े हर छोटे से छोटा व्यक्ति रोजगार के संकट का सामना कर रहा है, हालांकि सरकार ने अनलॉक-1 के तहत बीते 1 जून से प्रदेश के सभी पर्यटन स्थलों को खोल दिया था जिसके बाद सरकारी आंकड़ों में बीतते हर महीने के साथ आने वाले लोकल पर्यटकों की संख्या में इजाफा भी हुआ है।

जल महल की चौपाटी में दुकान लगाए कैलाश दिन भर में मुश्किल से कमा पा रहे हैं 200 से 300 रुपये। फ़ोटो: अवधेश पारीक

जल महल की चौपाटी पर पर्यटकों का सूखा

लॉकडाउन के बाद अब काम पर लौटे कैलाश अच्छा तो महसूस कर रहे हैं लेकिन एक दिन में जहां 800-1000 रुपये कमाते थे अब 200-300 रुपये लेकर घर जाना पड़ता है।

कैलाश बताते हैं, "सरकार ने जैसे ही अनलॉकडाउन में टूरिस्ट के लिए गाइडलाइन जारी की हमनें उसी दिन वापस यहां आने की तैयारी कल ली थी।"

आगे वह जोड़ते हैं, "जलमहल की चौपाटी पर ड्यूटी तो वही 12-13 घंटे की होती है लेकिन माता-पिता अपने बच्चों को गाड़ी में बिठाने से डर रहे हैं, जबकि हम सैनेटाइजर का इस्तेमाल करते हैं।"

जयपुर में ही किराए के मकान में रहने वाले कैलाश लॉकडाउन से पहले शादी में वेटर का पार्ट टाइम काम भी करते थे लेकिन अब वह बंद होने से जल महल पर आने वाले पर्यटकों पर ही निर्भर हैं।

कमोबेश ऐसे ही हालातों को 22 साल के सोहेल बयां करते हैं जो पिछले तीन साल से चौपाटी पर फोटोग्राफी का काम करते हैं।

कोरोनाकाल की वजह से इन खूबसूरत नजारों को देखने नहीं आ रहे पर्यटन.

सोहेल बताते हैं, "यह जो टाइम चल रहा है इसे हम 'सीजन' कहते हैं लेकिन कोरोना काल के बाद अब कहानी एकदम उलट है। पहले दिन भर में 30-40 फोटो निकालने वाले सोहेल अब 5-10 फोटो निकाल कर घर जाते हैं।"

आगे वह जोड़ते हैं, "जब तक फॉरेनर यहां आना शुरू नहीं होंगे तब तक हमारा लॉकडाउन चलता रहेगा चाहे सरकार ने खत्म कर दिया हो।"

एक अंदाजे के मुताबिक जल महल की चौपाटी पर पर्यटकों की फोटोग्राफी के काम से 250-300 लोग जुड़े हुए हैं जिसमें यहां करीब 25-30 दुकानें लगती हैं।

वहीं चौपाटी के दूसरे किनारे छतरी लगाकर हैण्डीक्राफ्ट का सामान बेचने वाले 50 साल के मूलचंद सैनी को अपने साथियों की कमी खल रही है।

तेरह साल से यहां ठेला लगाने वाले मूलचंद बताते हैं, "ऐसा टाइम मैंने मेरी जिंदगी में पहले कभी नहीं देखा, हमारी संस्कृति तो पधारो म्हारे देश की है लेकिन आप बताओ अब यह मनुहार हम किससे करें?"

आगे लॉकडाउन के दिनों के बारे में मूलचंद सैनी बताते हैं, "उन दिनों तो कभी ख्याल आता था कि इससे अच्छा तो मौत आ जाए।"

जल महल की चौपाटी के दूसरे किनारे 13 साल से हेंडीक्राफ्ट की दुकान लगा रहे हैं मूलचंद। फ़ोटो : अवधेश पारीक

सैनी के मुताबिक लॉकडाउन के शुरुआती दो महीनों में भारतीय मजदूर संघ और हमारे लोकल विधायक की तरफ से राशन मिला था, वहीं नगर निगम की तरफ से वेंडर्स के तौर पर दिए जाने वाली 2500 रुपये की सहायता भी मिली।

पर्यटन स्थलों से जुड़े टूरिस्ट गाइड सहित हजारों लोग प्रभावित

सर्दी की हल्की आहट में गुनगुनाती धूप की किरणों से चमकता आमेर किला जयपुर आए पर्यटकों की पहली पसंद माना जाता है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य, झील और खूबसूरत महल हर किसी का मन मोह लेता है लेकिन 30 साल से काम कर रहे इंडियन गाइड संजय कुमार शर्मा फिलहाल दुखी हैं।

संजय कुमार बताते हैं, "आमेर फोर्ट के चारों ओर मानसून की मेहरबानी से बिछी हरियाली और खूबसूरत नजारा देखकर आने वाले कुछ पर्यटकों का मन खिल रहा है लेकिन हम अभी भी पूरी तरह से काम पर नहीं लौट पाए हैं।"

आगे वह बताते हैं, "लॉकडाउन के दौरान हमारे कई साथी मानसिक तौर पर बेहद परेशान रहे और आज उन्हें कोरोना के बजाय अन्य डॉक्टरों के पास जाने की ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है।"


वहीं 22 साल से काम कर रहे फॉरेनर गाइड नरेश बताते हैं, "हमारा घर तो सिर्फ इस आमेर किले पर ही चलता है अब यही किला महीनों बंद रहेगा तो आप खुद अंदाजा लगा लीजिए कि हमनें यह समय कैसे बिताया है?"

नरेश आगे जोड़ते हैं, "हमारी एसोसिएशन ने कई बार मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ, कुछ दिन पहले हमनें सुना था कि पर्यटन विभाग की ओर से हमें 2500 रुपये की आर्थिक सहायता मिलेगी लेकिन आज के दिन तक कुछ हाथ नहीं आया है।"

कुछ अन्य गाइड का यह भी कहना था कि सरकार को राजस्व में इतना लाभ देने के बावजूद भी इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को इस तरह अनदेखी समझ से बाहर है।

संजय और नरेश दोनों आमेर फोर्ट शीलादेवी गाइड यूनियन से जुड़े हैं जो कि 28 गाइड की एक यूनियन है। वहीं शहर में करीब 3,000 के करीब रजिस्टर्ड गाइड हैं।

महल के थोड़ा अंदर जाने पर पर्यटकों से मनुहार करते 25 साल के प्राइवेट गाइड हेमंत मिले जो रविवार के दिन अब 50 रुपये लेकर घर जाने की तैयारी में है।

लॉकडाउन के बाद नौकरी छूटने से आमेर किले में प्राइवेट गाइड के तौर पर काम कर रहे हेमंत। फ़ोटो : अवधेश पारीक

हेमंत बताते हैं, "मैं कॉलेज में पढ़ता हूं और साथ में कपड़े की दुकान में पार्ट टाइम काम करता था। लॉकडाउन के बाद काम छूट गया तो अब यहां आने लगा। सरकारी गाइड ही ऐसे बैठे हैं तो हम तो 'लपके' हैं हम क्या लेकर जाएंगे।" आपको बता दें कि आमेर महल के आसपास आम बोलचाल में प्राइवेट गाइडों को लपका कहा जाता है।

फॉरेनर्स की बांट जोहते जंतर-मंतर और सिटी पैलेस के गाइड

हरियाली तीज की सवारी के लिए विश्व ख्याति प्राप्त सिटी पैलेस जयपुर का महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय म्यूजियम एक अगस्त से खोला गया जिसके बाद स्थानीय पर्यटकों के आने का सिलसिला यहां शुरू हुआ।

लेकिन पांच साल से यहां टूरिस्ट गाइड बनवारी लाल बताते हैं, "जब तक फॉरेनर्स यहां नहीं आएंगे तब तक हमारा काम पटरी पर आना मुश्किल है।"

आगे वह कहते हैं, "पिछले महीने मैं घर 500 रुपये लेकर गया था तो मेरे घर वाले कहते हैं कि अखबार में तो रोज बताते हैं कि यहां आज इतने पर्यटक आए तो वह कहां जा रहे हैं, मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।"

जंतर-मंतर पर गाइड के रूप में 40 साल से काम कर रहे हैं बृज मोहन। फ़ोटो : अवधेश पारीक

वहीं वर्ल्ड हैरिटेज मोनुमेंट्स जंतर-मंतर एंड आमेर फोर्ट एप्रूव्ड गाइड यूनियन के अध्यक्ष ब्रजमोहन खत्री जो यहां पिछले 40 साल से काम कर रहे हैं, बताते हैं, "स्थानीय पर्यटक गाइड लेते ही नहीं है, जब तक बाहर के पर्यटक नहीं आएंगे कुछ हल नहीं होगा।" वहीं सरकारी पर्यटकों के आंकड़ों पर वह कहते हैं, "टिकटें बिकने का मतलब यह नहीं है कि गाइडों के भी अच्छे दिन लौट आए हैं।"

कोरोना से प्रभावित टूरिस्ट गाइड के मसले पर 'गांव कनेक्शन' से बात करते हुए राजस्थान पर्यटन विभाग के उपनिदेशक उपेंद्र सिंह शेखावत कहते हैं, "पर्यटन विभाग की ओर से सभी गाइडों को 1500-2000 रुपये की आर्थिक सहायता देने पर विचार किया जा रहा है, इस महीने या अगले महीने से हम देना शुरू करेंगे।"

इसके अलावा राजस्थान में अन-लॉकडाउन के बाद टूरिज्म के हालातों पर शेखावत कहते हैं, "अभी भी लोगों में कोरोना का पैनिक बना हुआ है, जिसकी वजह से स्मारकों और पर्यटन स्थलों पर आने वाले लोगों की संख्या में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, हम उम्मीद करते हैं कि जल्दी ही परिस्थितियां सामान्य होंगी।"

हाथी गांव में रहते हैं 64 महावत परिवार। फ़ोटो: तबीनाह अंजुम

गिन-गिनकर दिन काटते महावत और हाथी मालिक

आमेर किले की शान कही जाने वाली हाथी सवारी लॉकडाउन के बाद से अभी तक बंद है जिसके बाद हाथी सवारी से जुड़े हाथी मालिक और महावतों पर बुरा असर पड़ा है।

हाथी गांव विकास समिति के अध्यक्ष और 10 हाथियों के मालिक बल्लू खान बताते हैं, "एक हाथी पर रोज 2500-3000 रुपये का खर्चा आता है, पहले हम महावतों को कुछ पैसे दे दिया करते थे लेकिन मैं खुद लाखों के कर्जे तले दबा हूं और कमाई बिल्कुल बंद है तो किसी महावत को कहां से दूं"।

सरकारी मदद के सवाल पर आगे खान कहते हैं, "हर हाथी मालिक को लॉकडाउन के दौरान हाथियों के पालन-पोषण के लिए रोज 600 रुपये एक हाथी के हिसाब से देने की शुरुआत हुई लेकिन 2 महीने बीतने के बाद कोई सुध लेने नहीं आया।"

हाथी गांव में रहते हैं 64 महावत परिवार। फ़ोटो: तबीनाह अंजुमजयपुर शहर में 99 हाथी हैं, जिनमें हाथी गांव भी शामिल है। हाथी गांव में करीब 64 महावत परिवार रहते हैं और इस व्यवसाय से करीब 15-20 हजार लोग किसी ना किसी तरीके से जुड़े हैं।


आमेर किले से करीब 3-4 किलोमीटर की दूरी पर 305 हेक्टेयर में फैले इस गांव को 2010 में राज्य सरकार ने नामित किया जिसके बाद 2018 में राज्य सरकार ने इस गांव का प्रबंधन और रखरखाव पर्यटन विभाग से वन विभाग को सौंप दिया।

वहीं लॉकडाउन के बाद बीते 6 महीनों की अगर बात करें तो हाथी गांव में 4 हथिनी की मौत भी हो चुकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक 6 महीने में 4 हाथियों की मौत होना हैरान जनक है।

कुछ हाथी मालिकों के अनुसार, लॉकडाउन से पहले हाथियों के आमेर किले में 2-3 चक्कर हो जाते थे लेकिन अब वो इतने समय से अपने थान में ही जिससे उनके पैरों में सूजन और खाने का सही तरीके से नहीं पचना जैसी शिकायतें देखी गई है।

हालांकि बल्लू खान 'गांव कनेक्शन' से कहते हैं, "मौत के मामले में लॉकडाउन का ऐसा कोई रोल नहीं है, एक हाथी की मौत लॉकडाउन से पहले पेट में इंफेक्शन से हो गई थी और बाकी 3 की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अभी मिली नहीं है।"


खिसका पर्यटन का कारोबार

वहीं अगर हम पर्यटन से होने वाले कारोबार की बात करें तो हालत यह है कि साल 2020 में अब तक अकेले आमेर महल के कारोबार में करीब 32 करोड़ का घाटा दर्ज किया गया है। साल 2019 में टिकटों से होने वाली बिक्री से आमेर महल की कमाई 41 करोड़ थी।

राजस्थान के पर्यटन विभाग ने हाल में सितंबर की शुरुआत में नए पर्यटन सत्र शुरू होने के साथ ही नई पर्यटन नीति जारी की है और पर्यटकों को लुभाने के लिए राजस्थान की सरकार जोरों-शोरों से तैयारी में जुटी है।

पिछले साल 2019 में जून से अगस्त के महीने में औसतन आमेर में 1 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे थे जो कि इस साल औसतन 6 हजार तक का आंकड़ा भी नहीं छू पाए, हालांकि पर्यटकों की संख्या में इस भारी गिरावट का मुख्य कारण विदेशी पर्यटकों का ना के बराबर आना भी है।

इस साल जून में स्मारकों और पर्यटन स्थल खुलने के बाद आमेर महल में टिकटों की बिक्री से जून से लेकर अगस्त महीने तक औसतन 2,66,610 रुपये का कारोबार हुआ है।

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.