हमारा संविधान जितना जीवंत, उतना ही संवेदनशील : मोदी

हमारा संविधान जितना जीवंत, उतना ही संवेदनशील : मोदीराष्ट्रीय विधि दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

नई दिल्ली (भाषा)। राष्ट्रीय विधि दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पिछले 68 वर्षों में हमारे संविधान ने हर परीक्षा को पार किया और हर आशंका को गलत साबित किया है लेकिन स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी आंतरिक कमजोरी दूर नहीं हुई है, ऐसे में अब बदले हुए हालात में कैसे आगे बढ़ा जाए, इस बारे में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों ही स्तर पर मंथन किए जाने की जरुरत है।

प्रधानमंत्री ने साथ ही कहा कि “ये समय तो भारत के लिए स्वर्ण काल की तरह है, देश में आत्मविश्वास का ऐसा माहौल बरसों के बाद बना है, निश्चिततौर पर इसके पीछे सवा सौ करोड़ भारतीयों की इच्छाशक्ति काम कर रही है। इसी सकारात्मक माहौल को आधार बनाकर हमें न्यू इंडिया के रास्ते पर आगे बढ़ते चलना है।”

जिस देश में एक दर्जन से ज्यादा पंथ हों, सौ से ज्यादा भाषाएं हों, सत्रह सौ से ज्यादा बोलियां हों, शहर-गांव -कस्बों और जंगलों तक में लोग रहते हों, उनकी अपनी आस्थाएं हों, सबकी आस्थाओं का सम्मान करने के बाद ये ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार करना आसान नहीं था।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री (राष्ट्रीय विधि दिवस के अनुसार)

उन्होंने कहा कि इस हॉल में बैठा हर व्यक्ति इस बात का गवाह है कि समय के साथ हमारे संविधान ने हर परीक्षा को पार किया है, हमारे संविधान ने उन लोगों की हर उस आशंका को गलत साबित किया है, जो कहते थे कि समय के साथ जो चुनौतियां देश के सामने आएंगी, उनका समाधान हमारा संविधान नहीं दे पाएगा।

न्यू इंडिया के संकल्प पर मोदी का जोर

न्यू इंडिया के संकल्प पर जोर देते हुए मोदी ने कहा कि भारत आज दुनिया का सबसे नौजवान देश है, इस नौजवान ऊर्जा को दिशा देने के लिए देश की हर संवैधानिक संस्था को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, 20वीं सदी में हम एक बार ये अवसर चूक चुके हैं, अब 21वीं सदी में न्यू इंडिया बनाने के लिए, हम सभी को संकल्प लेना होगा।

उन्होंने कहा, स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी आंतरिक कमजोरियां दूर नहीं हुई हैं इसलिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों ही स्तर पर मंथन किए जाने की जरुरत है कि अब बदले हुए हालात में कैसे आगे बढा जाए। अपनी-अपनी कमजोरियां हम जानते हैं, अपनी-अपनी शक्तियों को भी पहचानते हैं, उन्होंने कहा कि ये सवाल सिर्फ न्यायपालिका या सरकार में बैठे लोगों के सामने नहीं, बल्कि देश के हर उस स्तंभ, हर उस स्तम्भ, हर उस संस्था के सामने है, जिस पर आज करोड़ों लोगों की उम्मीदें टिकी हुई हैं, इन संस्थाओं का एक एक फैसला, एक एक कदम लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।

मोदी ने कहा कि सवाल ये है कि क्या ये संस्थाएं देश के विकास के लिए, देश की आवश्यकताओं, देश के समक्ष चुनौतियों और देश के लोगों की आशाओं-आकांक्षाओं को समझते हुए, एक-दूसरे का सहयोग कर रही हैं? एक दूसरे को समर्थन, एक दूसरे को मजबूत कर रही हैं?

प्रधानमंत्री ने कहा कि पाँच साल बाद हम सब स्वतंत्रता के 75 वर्ष का पर्व मनाएंगे। हमें एकजुट होकर उस भारत का सपना पूरा करना है, जिस का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। इसके लिए हर संस्था को अपनी ऊर्जा इस तरह से व्यवस्थित करनी होगी, उसे सिर्फ न्यू इंडिया का सपना पूरा करने में लगाना होगा, उन्होंने कहा कि 68 वर्षों में संविधान ने एक अभिभावक की तरह हमें सही रास्ते पर चलना सिखाया है, संविधान ने देश को लोकतंत्र के रास्ते पर बनाए रखा, उसे भटकने से रोका है, इसी अभिभावक के परिवार के सदस्य के तौर पर हम उपस्थित हैं।

सरकार, न्यायपालिका, नौकरशाही हम सभी इस परिवार के सदस्य ही तो हैं मोदी ने कहा कि संविधान दिवस हमारे लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न लेकर आया है, क्या एक परिवार के सदस्य के तौर पर हम उन मर्यादाओं का पालन कर रहे हैं, जिसकी उम्मीद हमारा अभिभावक, हमारा संविधान हमसे करता है? प्रधानमंत्री ने सवाल किया, क्या एक ही परिवार के सदस्य के तौर पर हम एक दूसरे को मजबूत करने के लिए, एक दूसरे का सहयोग करने के लिए काम कर रहे हैं?

राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद।

कालाधन के खिलाफ अपनी सरकार के कदमों का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि इस हॉल में मौजूद हर व्यक्ति को पता है कि उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद कालेधन के खिलाफ जो एसआईटी तीन साल तक टलती रही थी, उसका गठन हमारी सरकार ने शपथ लेने के तीन दिन के भीतर कर दिया था। ये फैसला भी जितना कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ था, उतना ही आम नागरिक से जुड़ा हुआ था।

राजग सरकार की गरीब कल्याण पहल के संदर्भ में मोदी ने कहा कि चाहे दिव्यांगों के लिए कानून में बदलाव का फैसला हो, अनुसूचित जाति : अनुसूचित जनजाति कानून को और सख्त करने का फैसला हो, या फिर बिल्डरों की मनमानी रोकने के लिए रेरा जैसी पहल की, ये सभी फैसले इसलिए लिए गए ताकि आम नागरिक को रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली दिक्कत कम हो उन्होंने कहा कि कानून से ऊपर कुछ नहीं। कानून में ही राजा की शक्ति निहित है और कानून ही गरीबों को-कमजोरों को ताकतवर से लड़ने का हौसला देता है, उन्हें सक्षम बनाता है, इसी मंत्र पर चलते हुए हमारी सरकार ने भी नए कानून बनाकर और पुराने कानून खत्म करके जीवन जीने की राह आसान बनाने का काम किया है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा आयोजित संविधान दिवस समारोह में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच नाजुक संतुलन को कायम रखना महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में आज का दिन जितना पावन है, उतना ही महत्वपूर्ण भी। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आत्मा अगर किसी को कहा जा सकता है तो वो हमारा संविधान है. इस आत्मा को, इस लिखित ग्रंथ को 68 वर्ष पहले स्वीकार किया जाना बहुत ऐतिसाहिक पल था। इस दिन एक राष्ट्र के तौर पर हमने तय किया था कि अब आगे हमारी दिशा किन निर्देशों पर होगी, किन नियमों के तहत होगी। वो नियम, वो संविधान जिसका एक-एक शब्द हमारे लिए पवित्र है, पूजनीय है।

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संविधान के महत्व को रेखांकित करते हुए मोदी ने कहा कि ऐसा कोई विषय नहीं, जिसकी व्याख्या, जिस पर दिशा-निर्देश हमें भारतीय संविधान में ना मिलते हों। संविधान की इसी शक्ति को समझते हुए संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष सचिदानंद सिन्हा जी ने कहा था- मानव द्वारा रचित अगर किसी रचना को अमर कहा जा सकता है तो वो भारत का संविधान है उन्होंने कहा कि हमारा संविधान जितना जीवंत है, उतना ही संवेदनशील भी। हमारा संविधान जितना जवाबदेह है, उतना ही सक्षम भी। खुद बाबा साहेब ने कहा था ये व्यावहारिक है, ये लचीला है और शांति हो या युद्ध का समय, इसमें देश को एकजुट रखने की ताकत है, बाबा साहेब ने ये भी कहा था कि- संविधान के सामने रखकर अगर कुछ गलत होता भी है, तो उसमें गलती संविधान की नहीं, बल्कि संविधान का पालन करवा रही संस्था की होगी।

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