काले सफेद धब्बों वाली देशी नस्ल की ‘सीरी’ गाय लुप्त होने की कगार पर

काले सफेद धब्बों वाली देशी नस्ल की ‘सीरी’ गाय लुप्त होने की कगार परसफेद और काले चकत्तों वाली पहाड़ी इलाके की सबसे ज्यादा दूध देने वाली गाय की नस्ल ‘सीरी’ लुप्त होने की कगार पर है।

लखनऊ/नई दिल्ली। एक तरफ जहां देश में गो-रक्षा के और इसके संरक्षण को सरकारों की तरफ घोषणाएं हो रही हैं वहीं दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश में देसी गायों की एक नस्ल खत्म होने की कगार पर खड़ी है। सफेद और काले चकत्तों वाली पहाड़ी इलाके की सबसे ज्यादा दूध देने वाली गाय की नस्ल 'सीरी' लुप्त होने की कगार पर है। इस नस्ल की गाय खेती के लिए काफी मुफीद होते हैं।

पूर्वी और पूर्वात्तर भारत के राज्य सिक्कम में कभी किसान और गाँवों की पहचान रही सीरी नामक गाय की संख्या निरंतर घट रही है, जिसको लेकर कृषि राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल, हरियाणा के पशु वैज्ञानिक चिंतित हैं। सीरी गाय को बचाने के लिए यहां के वैज्ञानिकों ने सरकार से गुहार लगाई है।

देश में गाय, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़े, ऊंट, और कुक्कट की नस्लों की आनुवंशिक संपदा की पहचान, मूल्यांकन, लक्षण निर्धारण और संरक्षण के लिए बनाए गए राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के निदेशक डॉ. आर्जव शर्मा ने बताया कि उनके यहां के वैज्ञानिक देसी नस्लों गायों के संरक्षण को बचाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। यहां के वैज्ञानिक राकेश कुमार पुंडीर, प्रमोद कुमार सिंह और प्रदीप सिंह डांगी ने देश में सीरी गायों की निरंतर घटती संख्या पर अध्ययन किया है।

गायों की स्थिति पर जानकारी देते हुए राकेश कुमार पुंडीर ने बताया, ''सिक्कम में जब सीरी गाय को लेकर अध्ययन किया गया तो पता चला कि साल 2003 से लेकर 2012 के बीच सीरी गायों की संख्या में 82.34 गिरावट आई है।'' साल 2007 में 61750 सीरी गायें थी जिनकी संख्या साल 2013 में घटकर मात्र 12721 ही रह गई थी।

उन्होंने बताया पशु गणना 2012 के आंकड़ों के अनुसार सिक्कम में जहां 13948 सीरी गायें ही बची हैं। पूरे देश में सीरी गाय सिर्फ सिक्कम और पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग में ही पाई जाती हैं। सीरी गाय को किसान दूध और कृषि कार्य दोनों के लिए रखते हैं।

डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने बताया, ''सीरी गाय की संख्या निरंतर घटती जा रही है, इकसे संरक्षण और सुधार की अत्यंत आवश्यकता है। नहीं तो आने वाले समय में देसी गायों की यह प्रजाति विलुप्त हो जाएगी।''

सीरी गायों की संख्या कम होने से जहां दूध उत्पादन पर असर पड़ रहा है वहीं सीरी गाय से तैयार होने वाले सीरी बैल भी तैयार नहीं हो रहे। पूर्वात्तर जैसे राज्यों में खेत की जुताई करने से लेकर माल ढुलाई तक सांड की ही मदद ली जाती है। सीरी बैल की एक जोड़ी लगभग 8 से लेकर 10 घंटे में एक एकड़ खेत की जुताई करने में सक्षम होता है। सीरी बैलों में खेत जोतने की क्षमत दूसरे बैलों से ज्यादा पाई जाती है। सिक्कम राज्य ने सीरी गायों के संरक्षण के लिए एक योजना जरूर शुरू की है लेकिन केन्द्रीय सहातया के बाद इस योजना को आगे बढ़ाया जा सकता है, जिससे सीरी गाय का संरक्षण और संवदर्धन हो सकेगा।

सीरी गायों पर जब कृषि राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल, हरियाणा के पशु वैज्ञानिक ने सर्वेक्षण किया तो इसमें पता चला कि सीरी गायों में रंगों में काफी विभिन्नता पाई जाती है। सर्वेक्षण की गई कुल गायों में 45.59 प्रतिशत गायों का रंग सफेद धब्बों के साथ गहरा लाल था। वहीं 19.12 प्रतिशत सीरी गायों का रंग काला-सफेद धब्बा और 16.18 गायों का रंग काला पाया गया।

गायों की स्थति पर जानकारी देते हुए राकेश कुमार पुंडीर ने बताया '' सीरी गाय पर्वतीय क्षेत्र में कृषि कार्य के लिए उपयुक्त होती हैं। सीरी गाय के थूथन और आंखों की पलकें काली और शरीर पर लंबे बाल पाए जाते हैं। यह आकार में उत्तर- पूर्व राज्यों की देशी गायों से बड़ी होती हैं। इनका माथा उथला होता जिसपर सफेद धब्बे होते हैं। कूबड़ थोड़ा आगे की ओर होता है, जो कि अन्य नस्लों से अलग होता है। कूबड़ पर भी बड़े-बड़े बाल हेात हैं।''

उन्होंने बताया कि सीरी गाय में कान की लंबाई मध्यम और सींग लंबाई में छोटी और ऊपर की ओर घुमावदार होती है। इनके थनों की लंबाई 8-12 सेंटीमीटर होता है। इसकी पूंछ काले और भूरे रंग के साथ घुटनों तक लंबी होती है। यह गायें स्वभाव में विनम्र होती हैं। यह रोजाना 2 से लेकर 6 लीटर दूध देती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाने वाली सभी गायों में यह सर्वाधिक दूध देने वाली गाय है।

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