कहानी उस गांव की जो हर साल उजड़ता और बसता है

Ranvijay SinghRanvijay Singh   20 April 2019 7:01 AM GMT

कहानी उस गांव की जो हर साल उजड़ता और बसता है

रणविजय सिंह/चंद्रकांत म‍िश्रा

लखनऊ। 500 मीटर की दूरी आप कितने वक्‍त में तय करते होंगे? पैदल चले तो ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 मिनट और अगर बाइक से हुए तो यही कोई एक से दो मिनट के करीब। लेकिन बाराबंकी में एक ऐसा गांव है जहां के लोगों को इतनी ही दूरी तय करने में 2 से 3 घंटे तक लग जाते हैं। यह कहानी है घाघरा के कछार के बाशिंदों की।

उत्‍तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्‍थि‍त इस गावं का नाम परसावल है, जो कि दरियाबाद विधानसभा में पड़ता है। परसावल गांव जाने के लिए गांव कनेक्‍शन की टीम लखनऊ से सुबह निकली। हर साल बाढ़ से तबाह होने वाले इस गांव के संघर्ष की कहानियां तो खूब सुनी थीं, लेकिन जब मौके पर पहुंचे तो यह संघर्ष महसूस हो सका।

परसावल गांव तक जाने के लिए घाघरा नदी को नाव से पार करना होता है। यही एक मात्र साधान है जिससे गांव तक पहुंचा जा सके। गिनती में कुल चार नाव लोढेमऊ घाट पर रहती हैं। जब गांव कनेक्‍शन की टीम लोढेमऊ घाट पहुंची तो एक नाव गांव की ओर जा चुकी थी। अब गांव तक तभी पहुंचा जा सकता था जब अलगी नाव जाती। ऐसे में अब इंतजार करने की बारी हमारी थी। घड़ी में 2 बज रहे थे। इंतजार करने के दौरान ही हमने टिफिन भी खा लिया, इधर-उधर की तस्‍वीरें भी ले लीं और आपस में बात करते हुए बोर भी हो लिए। अब घड़ी में 4 बज रहे थे। मतलब दूसरा किनारा जो कि गांव से लगता है वो मात्र 500 मीटर की दूरी पर होगा और वहां पहुंचने के लिए हम 2 घंटे का इंतजार कर चुके थे।

परसावल गांव तक पहुंचने का एक मात्र साधन नाव है। लोढेमऊ घाट पर नाव से एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाते ग्रामीण। परसावल गांव तक पहुंचने का एक मात्र साधन नाव है। लोढेमऊ घाट पर नाव से एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाते ग्रामीण।

यह इंतजार तब खत्‍म हुआ जब सामने से लाल शर्ट पहने एक नौजवान आता दिखा। चेहरे पर मुस्‍कान लिए यह नौजवान हमारी ओर ही बढ़ रहा था। आया और आते ही पूछा कोई गांव जाएगा क्‍या? इंतजार से पस्‍त हो चुके हम लोग तुरंत बोल पड़े, 'हां, हमें उस पार जाना है, तुम चल रहे हो क्‍या?' बेहद मिलनसार इस नौजवान का नाम संजीत (26 साल) था। संजीत ने हामी भरी और बोला- 'तो बाइक को नाव पर रख लीजिए और आइए चलते हैं उस पार।'

संजीत ने नाव खेना शुरू किया और गांव के संघर्षों को बताना भी। संजीत ने बताया, ''गांव वालों को छोटी छोटी जरूरतें जैसे कि नमक-तेल, दवा-बिरो के लिए भी नाव का ही सहारा है। यहां से टिकैतनगर बाजार 12 किमी की दूरी पर है। अगर कोई बाजार जाना चाहता है तो सुबह निकलता है और शाम तक घर लौट पाता है।''

''घाट पर कुल चार नाव रहती हैं। इन नाव को गांव वाले खुद ही खेते हैं और एक किनारे से दूसरे किनारे आते-जाते हैं। इसके लिए हमें किराया नहीं देना होता, बल्‍कि जिसकी नाव है उसे साल में एक बोरी अनाज देना होता है। यही नियम है यहां का। अब रोज-रोज किराए के लिए पैसा कहां से लाएंगे।'' संजीत बताता है

फोटो में लाल शर्ट पहने संजीत है। संजीत परसवाल गांव के ही रहने वाले हैं।फोटो में लाल शर्ट पहने संजीत है। संजीत परसवाल गांव के ही रहने वाले हैं।

संजीत गुजरात में काम करता था, पिछले साल (2018) जब बाढ़ आई तो अपने परिवार की मदद के लिए गांव लौट आया। तबसे गांव में ही रह रहा है और खेती में हाथ बंटा रहा है। संजीत कभी स्‍कूल नहीं गया। स्‍कूल क्‍यों नहीं गए इस सवाल पर वो कहता है, ''गांव में स्‍कूल नहीं था, घर वाले नदी पार कर जाने नहीं देते। किसी ने कभी पढ़ने को कहा नहीं, मैंने कभी पढ़ा नहीं।'' बातचीत का दौर ऐसा चला कि कब संजीत नाव खेते-खेते किनारे पर आ गया पता ही नहीं चला। किनारे पर गाड़ी उतरवाने के बाद संजीत ने बस इतना कहा, ''आप लोग कुछ दिखाएंगे तो मदद हो जाएगी। हर साल हम परेशान हो जाते हैं।''

किनारे से गांव तक पहुंचना भी आसान न था। नदी के किनारे बालू थी, जिससे हमारी बाइक उसमें धंस जाया करती। इन सब से गुजरते हुए बस एक ख्‍याल आता कि यहां के रहने वालों की जिंदगी कितनी संघर्षपूर्ण है। गांव में पहुंचने पर ललित राम (45 साल) का घर सबसे पहले पड़ा। फूस से बना घर और दरवाजे पर पड़ी एक तखत। इस तखत पर ललित राम लेटे हुए थे और सामने ही जमीन पर उनकी पत्‍नी और बच्‍चे बैठे थे।


ललित राम हमें देखते ही उठकर बैठ गए और परिचय लेने के बाद अपना घर दिखाने लगे। फूस से बने घर में दो कमरे थे और इसमें से एक का इस्‍तेमाल रसोई के तौर पर भी होता था। ललितराम कछार में गांव होने की परेशानी को बताते हुए कहते हैं, ''आप समझ लीजिए हम दूसरी दुनिया में रहते हैं। हमारे पक्‍के मकान नहीं हो सकते, क्‍योंकि हर साल बाढ़ आती है और तब सब कुछ डूब जाता है, जमीन की जमीन कट जाती है। इसलिए हम लोग फूस के घर में रहते हैं। क्‍योंकि इसके जाने का गम तो होगा लेकिन फिर से बनाने की हिम्‍मत भी रहेगी।'' ललित राम की तरह ही गांव में सारे घर फूस के ही हैं।

ललित बताते हैं, ''हम मांग करते रहे हैं कि हमें कहीं ऊंची जगह पर बसाया जाए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। हमारी किस्‍मत में ही बाढ़ लिखी है।'' ललित बताते हैं, हर साल बाढ़ आने पर हम 4 महीने के लिए बंधे पर जाकर तंबू में रहते हैं, क्‍योंकि सब कुछ डूब जाता है। फिर पानी छटने पर आठ महीने गांव में आकर रहते हैं। अब तो इसकी आदत हो गई है।''

तस्‍वीर में लालमती अपनी बेटियों के साथ हैं। लालमती चाहती हैं कि उन्‍हें यहां से कहीं अलग जमीन मिल जाए जहां वो अपने बच्‍चों के साथ सुकून से रह सकें।तस्‍वीर में लालमती अपनी बेटियों के साथ हैं। लालमती चाहती हैं कि उन्‍हें यहां से कहीं अलग जमीन मिल जाए जहां वो अपने बच्‍चों के साथ सुकून से रह सकें।

ललित राम की पत्‍नी लालमती (38 साल)भी बाढ़ को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं। वो कहती हैं, ''हर साल बच्‍चों को लेकर तंबू में दिन गुजारना होता है। पिछले साल एक गाय बह गई हमारी। हम बस यही चाहते हैं कि कहीं ऊंची जगह की जमीन पर हमें बसा दिया जाए, यहां से तो वो ठीक ही रहेगा। इस टापू पर रहने से तो अच्‍छा है।''

गांव में बिजली नहीं है। ऐसे में यहां के लोग बैट्री से एक बल्‍ब जलाते हैं। लालमती कहती हैं, ''यही एक सहारा है, यहां चिराग भी नहीं जल सकता क्‍योंकि हवा इतनी तेज रहती है।'' लालमती बताती हैं, ''एक महीने पहले सोलर लाइट मिला है। यही मिला है सरकार से अब तक और कुछ नहीं मिला।''

ललित राम के घर के आगे ही बिटाना (26 साल) का घर भी है। बिटाना अपने दरवाजे पर बैठी हुई बच्‍चे से खेल रही हैं। हमारी आमद पर वो चौक जातीं हैं और सिर पर पल्‍लू खींच कर हमारा परिचय लेती हैं। बिटाना से बात करते हुए लगता है जैसे हम कई सदी पीछे चले गए हों। बिटाना से जब उनकी परेशानियों के बारे में पूछा गया तो वो पहले सिर हिला कर बालने से मना करती रहीं। लेकिन जब भरोसा हुआ तो एक-एक कर अपनी परेशानियों की पोटली खोलकर रख दी।

तस्‍वीर में दिख रही महिला का नाम बिटाना है जो कि अपने बच्‍चे के साथ घर के बाहर खड़ी हैं।

बिटाना से पूछा गया कि इस गांव के लोगों अस्‍पताल जाने के लिए कितना संघर्ष करता होता होगा। इसपर बिटाना ने बताया, 'छोटी मोटी चोट तो यहीं सही हो जाती है।' जब बिटाना से पूछा गया कि गर्भवती महिलाओं को कितना कष्‍ट झेलना पड़ता होगा अस्‍पताल जाने के लिए? इसपर बिटाना ने बताया, 'बहुत ही ज्‍यादा। इतना दूर जाने में हालत खराब हो जाती है। वो तो कैसे-कैसे लाद फांद के लोग ले जाते हैं।' (बिटाना यह सारी बात अपनी स्‍थानीय भाषा जो कि अवधी से मिलती जुलती है उसमें बताती हैं)

जब हम बिटाना से बात कर रहे थे इस दौरान उनके दरवाजे पर गांव के बहुत से छोटे-छोटे बच्‍चे इकट्ठा हो गए। ज्‍यादातर बच्‍चे फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे। बच्‍चों से जब पूछा गया कि स्‍कूल क्‍यों नहीं जाते इसपर सब खिल खिलाकर हंस देते हैं और फिर सवाल करते हैं- 'भैंसी कौन चराई।' बच्‍चों के स्‍कूल न जाने की बात पर गांव के ही एक बुजुर्ग सुखहरन (66 साल) कहते हैं, ''जब गांव में स्‍कूल नहीं है तो इन्‍हें कहां भेज दें। नदी के पार भेजना भी तो खतरनाक है। पता चला डूब गए तो फिर स्‍कूल जाते रह जाएंगे।'' सुखहरन कहते हैं, ''गांव पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कटा हुआ है। यहां न अखबार आता है, बिजली नहीं है तो टीवी भी नहीं है। ऐसे में हमें कुछ पता ही नहीं चलता बाहर हो क्‍या रहा है। न किसी को हमारी जानकारी, न हमें उनकी।''

हर साल बाढ़ से तबाह होने वाले इस गांव में स्‍कूल नहीं है। इसलिए बच्‍चे पढ़ने नहीं जा पाते। गांव के बच्‍चे यहां गाय-भैंस चराते दिख जाते हैं। हर साल बाढ़ से तबाह होने वाले इस गांव में स्‍कूल नहीं है। इसलिए बच्‍चे पढ़ने नहीं जा पाते। गांव के बच्‍चे यहां गाय-भैंस चराते दिख जाते हैं।

परसावल गांव के इस हाल पर पुरे दलई (द्वितीय) ब्‍लॉक के जिला पंचायत सदस्‍य राम कैलाश यादव बताते हैं, ''2009 में एल्गिन चरसड़ी तटबंध कट गया। इसकी वजह से परसावल के 1100 परिवार के 4200 लोग प्रभाव‍ित हुए। सरकार ने तब इन लोगों को स्‍कूल में सड़क किनारे तंबू में ठहराया। लोगों को उम्‍मीद थी कि सरकार की ओर से कुछ कदम उठाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाढ़ चली गई तो लोग वापस आकार गांव में नई झोपड़ी बनाकर रहने लगे। इसके बाद 2010 में नया बंधा बना दिया गया, लेकिन इसकी वजह से परसावल गांव का क्षेत्र घाघरा नदी में चला गया। ऐसे में परसावल की कोई जमीन सुरक्ष‍ित बची ही नहीं। तब से लेकर आज तक जब-जब बाढ़ आती है तो लोग बंधे पर जाते हैं और बाढ़ खत्‍म होने पर अपने गांव को लौट आते हैं। ऐसे में आठ महीने यह गांव में रहते हैं और 4 महीने रिश्‍तेदारी या बंधे पर काटते हैं।''

राम कैलाश यादव कहते हैं, ''कई जिलाधिकारी आए तो उन लोगों ने कहा कि लोगों को यहां से शिफ्ट कराया जाए, लेकिन यह सब बाते ही रहीं। आज स्‍थ‍िति यह है कि गांव वालों को किसी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। आवास हो या फिर शौचालय की योजना सब पर रोक लग जाती है। वजह है कि बीडीओ (ब्‍लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर) लिख देते हैं कि जमीन सुरक्ष‍ित नहीं है, ऐसे में आवास और शौचालय बन ही नहीं सकता। जबकि अब घाघरा शिफ्ट होकर तीन किमी दूर चली गई है। ऐसे में अध‍िकारियों को अपना नजरिया बदलना चाहिए।''

राम कैलाश यादव ने बताया, 'परसावल में अभी करीब 1 हजार परिवार हैं। बहुत से लोग बाढ़ आने के बाद यहां से चले गए।' वो कहते हैं, ''यह सिर्फ परसावल का हाल नहीं है। आस-पास के गांव को देखें तो करीब 10 हजार लोग प्रभावित हैं। लेकिन बाढ़ ऐसा विषय है कि इसमें कोई पड़ना ही नहीं चाहता। नेता भी यहां नहीं आते क्‍योंकि लोग अपनी परेशानी ही बताएंगे। ऐसे में इन्‍हें अपने हाल पर ही छोड़ दिया गया है।'' राम कैलाश यादव जिस ब्‍लॉक के जिला पंचायत सदस्‍य हैं परसावल गांव उसी में आता है। साथ ही राम कैलाश परसावल गांव की प्रधान सावित्री देवी के पति भी हैं।

यह कहानी अकेले परसावल की नहीं है। यह कहानी पूरे कछार की है। जहां की जिंदगियां नदी के हिसाब से चलती हैं। यहां के लोगों के जीवन का संघर्ष देख लगता है कि लोग किन हालातों में जीवन यापन कर रहे हैं। रहने को घर नहीं, पहनने को कपड़े नहीं, यात्राओं में घंटों का इंतजार और बुनियादी सुविधाओं के नाम पर सरकारी आश्‍वासन।


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