बिहार: बाढ़ की त्रासदी के बीच फरिश्ता बन गये ये तीन युवा, बचाई 40 से ज्यादा लोगों की जान

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   22 July 2019 1:48 PM GMT

मधुबनी (बिहार)। रात के साढ़े 11 बज रहे थे। सब खाना खाकर सोने की तैयारी कर में थे, तभी पानी का सैलाब आ गया। एक-एक करके पक्के घर ढहने लगे। लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। जब बचने के सभी रास्ते बंद हो गये तब गांव के ही तीन युवा दोस्त फरिश्ता बनकर सामने आये और मौत के मुंह में खड़े 40 से ज्यादा लोगों की जान बचाई।

बिहार के मधुबनी जिले के प्रखंड झांझरपुर के अंतर्गत गांव आता है नरुआर। 13 जुलाई की रात 11 और 12 के बीच गोपलखा के पास कमला बालान बांध टूट जाता है। रात का समय था। पानी का बहाव इतना तेज था कि देखते ही देखते घर के घर बहने लगे। कई लोग अभी भी लापता हैं।

लेकिन उस रात इस मुश्किल घड़ी में राकेश, सुनील और अंकुर मंडल ने जो किया उससे अब ये अपने गांव वालों के लिए किसी हीरो से कम नहीं हैं। रियल हीरो। 20-22 साल के इन युवाओं की चर्चा गांव में हर कोई कर रहा है।

हम जब नरुआर गाँव पहुंचे तो लोगों से उस रात के बारे में पूछा कि उस आखिर हुआ क्या था। तो उस रात त्रासदी में फंसे मगन (32) कहते हैं, "जो हुआ वह मत पूछिए, पहले यह पूछिए कि मैं यहां जिंदा कैसे खड़ा हूं। उस रात अगर राकेश, सुनील और अंकुर नहीं होते तो मेरे परिवार का कोई नहीं बचता। मैं भी नहीं बचता। मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि कैसे इन लड़कों ने हमारी जान बचायी।"

नरुआर गांव की मौजूदा स्थिति. फोटो- अभिषेक वर्मा

गांव के ही 55 वर्षीय विनोद मंडल कहते हैं, "आप सोच नहीं सकते कि इन लड़कों ने हमारी जान कैसे बचायी। नीचे पानी की धार इतनी तेज थी कि आरसीसी से बने घर बहे जा रहे थे, और ऊपर ये लड़के साड़ी और रस्सी के सहारे लोगों को एक छत से दूसरे छत पर लेकर जा रहे थे। अगर कोई नीचे गिरता तो बचना मुश्किल था। लेकिन हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। ये लड़के उस रात फरिश्ता बन गये थे।"

बाढ़ प्रभावित लोग अब तटबंध के किनारे बने कैम्पों में रह रहे हैं। नरुआर गांव का संपर्क अभी भी टूटा है। उस दिन इन युवाओं ने लोगों की जान कैसे बचायी यह देखने के लिए हम स्थानीय लोगों के साथ गांव की ओर चल पड़े।

ये वीडियो बाढ़ के अगले दिन की है। इसे देखकर आप भयावहता का अंदाजा लगा सकते हैं


कमर तक पानी में लगभग एक किमी का सफ़र तय कर तबाही वाली जगह पहुंचे। पहले यहां 40 से ज्यादा घर थे। अब मुश्किल से चार-पांच घर बचे हैं। जिस घर पर उस रात लोग रुके हुए थे, उसकी छत की ग्रिल से दूसरी छत को जोड़ती हुई साड़ी और रस्सी अभी भी बंधी हुई है। इन युवाओं ने इसी के सहारे 40 से ज्यादा लोगों की जान बचायी।

उसी छत पर खड़े होकर राकेश उस ओर जहां अब बस पानी ही पानी है, इशारा करते हुए कहते हैं, "वहां उस छोर पर मेरा 11 कमरों का घर था। सब कुछ बह गया। कुछ भी नहीं बचा। सब बर्बाद हो गया।"

राकेश का पुराना घर जो पूरी तरह से बह चुका है. ये तस्वीर हमें खुद राकेश ने उपलब्ध करायी.

राकेश बीकॉम फाइनल ईयर के छात्र हैं और सेना में भर्ती होना चाहते हैं। उस दिन क्या हुआ था, कैसे लोगों की जान बचायी, इस पर राकेश कहते हैं, "मैं मेरी मां और दादी खाना खा चुके थे। रात के 11 बज रहे थे, तभी हल्ला हुआ कि बांध टूट गया। हम कुछ कर पाते तब तक नीचे के कमरे में पानी में भर गया। हम सभी भागकर छत पर गये, तब तक घर का एक हिस्सा टूट गया। तब हमें लगा कि अब हमारा बचना मुश्किल है। मेरी दाहिनी ओर का घर पूरी तरह से बह चुका था। फिर मैंने सोचा कि क्यों न बचने की एक आखिरी कोशिश की जाये।"

"मैंने माँ की साड़ी ली, पास में पड़ी रस्सी को साड़ी के साथ बांधा और दूसरी छत पर फेंका। फिर उसी के सहारे दूसरी छत पर गया और छड़ में बांध दिया। फिर वापस अपनी छत पर आया और मां को चलने के लिए बोला। नीचे पानी की धार देखकर डर भी लग रहा था। हाथ छूटने का मतलब था कि मौत। मां मेरी ओर देखकर रोने लगी, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। मां को जब तक उस छत पर लेकर जाता तब तक घर का एक और हिस्सा टूट गया और दादी बह गयी।" राकेश कहते हैं।

इसी रस्सी के सहारे युवाओं ने बचाई लोगों की जान. फोटो- मिथिलेश

राकेश आगे कहते हैं, "हमें लगा कि हमने दादी को खो दिया, लेकिन दादी आगे के एक स्कूल में जाकर फंस गयीं और उन्हें वहां से अगले दिन सुरक्षित बचाया गया। मैं और मेरी मां जिस घर पर थे वो भी गिरने लगा, हमने फिर वही रास्ता अपनाया और दूसरी छत पर पहुंचे। तो वहां से देखा कि बहुत से लोग आस-पास के घरों में फंसे पड़े थे। फिर मैंने अंकुर और सुनील से कहा कि हमें लोगों को बचाने का एक प्रयास तो करना ही चाहिए।"

उस रात के बारे में बात करते समय अंकुर रूहांसे हो जाते हैं। सीए की तैयारी कर रहे इन दोनों युवाओं ने उस दिन राकेश का पूरा साथ दिया और लोगों की जान बचायी।

बाढ़ के समय की तस्वीर

उस रात का जिक्र करते हुए अंकुर मंडल कहते हैं, "10 बजे के आसपास हमे पता चला कि बांध में लीकेज हो गया है। मैं वहां गया तो देखा कि एक जगह से पानी आ रहा था। उसकी स्पीड बढ़ती जा रही थी। भागकर घर आया और सबको बताया। पहले तो मवेशियों को छत पर ले गया और हम भी छत की ओर भागने लगे। थोड़ी देर बाद ही बहुते तेज पानी आ गया। बांध टूट चुका था। देखते ही देखते ही मेरे घर का हिस्सा भी बहने लगा। तब राकेश की मदद से हम दूसरी छत पर गये। फिर देखा कि कई छतों पर लोग फंसे हुए थे। हम बारी-बारी से लोगों को उस छत पर इकट्ठा करने लगे जो अभी नया बना था और मजबूत था।"

कमला बालान बांध, जिसके टूटने की वजह से मची तबाही. फोटो- अभिषेक वर्मा

अंकुर आगे कहते हैं, "मेरे घर के सामने वाले घर में एक एक बूढी दादी थीं। मैं उनके पास गया लेकिन उन्होंने साथ चलने से मना कर दिया। उनके पति नीचे से ऊपर नहीं आ पाए और बह गये। उनका शव बाद में मिला। दादी का वजन ज्यादा था, उन्होंने कहा की अंकुर मुझे बचाने के चक्कर में तुम भी मर जाओगे। इसलिए तुम जाओ, इस रस्सी के सहारे मैं नहीं जा पाऊँगी। और मैं वापस आ गया। हालाँकि दादी की घर का हिस्सा सुरक्षित रहा और अगले दिन दोपहर उन्हें बचाया गया। सुबह तक हम लोगों को बचाते रहे। कई बार फोन करने पर भी कोई मदद नहीं मिली। कई अधिकारी सुबह आये और तटबंध से देखकर चले गये। फिर दोपहर 3 बजे एनडीआरएफ की टीम आयी तब हम बाहर निकले।"

नरुआर गांव से फेसबुक लाइव


सुनील से हमारी मुलाकात नहीं हो पायी लेकिन राकेश और अंकुर ने बताया कि सुनील ने भी उस दिन कई लोगों को बचाया। दिल्ली से वापस लौटे गुड्डू मंडल भी इन तीन लड़कों को धन्यवाद देते हैं। गुड्डू कहते हैं, "मैं उस रात दिल्ली में था। जैसे ही बाढ़ की खबर मिली तो वहीं से डीएम और एनडीआरएफ की टीम को फोन करने लगा। लेकिन रात में कोई नहीं आया।मेरा घर तो नहीं बच पाया लेकिन शुक्र है कि उस रात यहां राकेश, सुनील और अंकुर थे, उन्होंने हमारे घर वालों की जान बचायी, वरना मेरा तो कोई बचता ही नहीं।"

कहते हैं न कि मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा बड़ा होता है। उस रात इन युवाओं ने आपदा से खूब टक्कर ली। खुद को तो बचाया ही, अपनों को भी बचाया। आज पूरा गांव इन युवाओं की तारीफ़ करते नहीं थक रहा।


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