'हम जानते हैं नदी का पानी हमें मार देगा, लेकिन हम कर ही क्‍या सकते हैं'

Ranvijay SinghRanvijay Singh   10 Dec 2019 10:13 AM GMT

घर के आंगन में गुनगुनी धूप उतर आई है। इसी आंगन में बैठ 48 साल की सुनीता देवी धूप सेंक रही हैं। लेकिन धूप सेंकते हुए भी वो आराम की मुद्रा में नजर नहीं आतीं। उन्‍होंने मुंह पर दुपट्टा रखा हुआ है। सुनीता ने यह दुपट्टा इसलिए रखा है क्‍योंकि उनके घर के पीछे से ही गुजरने वाली हिंडन नदी से तेज दुर्गन्‍ध आ रही है। यह दुर्गन्‍ध तेजाब की गंध सी है, जो सीने में उतरने के बाद जलन पैदा कर रही है।

सुनीता बागपत जिले के बिनौली ब्‍लॉक के सरौरा गांव की रहने वाली हैं। यह गांव बागपत जिले से 60 किलोमीटर दूर पड़ता है। सुनीता हिंडन नदी में बह रहे टार की तरह काले पानी को दिखाते हुए कहती हैं, ''यह पानी गांव के सभी लोगों को बीमार कर रहा है। इसकी दुर्गन्‍ध से ही आप समझ रहे होंगे कि नदी में पानी नहीं, तेजाब बह रहा है।'' सुनीता अपने पांच साल के पोते लकी के सिर पर हाथ फेरते हुए बताती हैं, ''जब यह पैदा हुआ तो इसके पैर टेढे थे, डॉक्‍टरों ने कहा कि इसकी मां ने नल का पानी पिया इस वजह से ऐसा हुआ। इसका पैर सही कराने के लिए मैंने लगभग दो लाख रुपए खर्च कर दिए हैं, लेकिन अब भी कई बार चलते हुए गिर जाता है।''

यह कहानी सिर्फ सुनीता या बागपत के एक गांव की नहीं है। बल्‍कि यह कहानी पश्‍चिमी यूपी के 6 जिलों (सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद) के 154 गांव के रहने वाले लाखों लोगों की हैं। यह 154 गांव पश्‍चिमी यूपी में बहने वाली तीन नदियों - हिंडन, कृष्णा और काली नदी के किनारे बसे हैं। क्‍योंकि यह नदियों बहुत ज्‍यादा प्रदूष‍ित हैं, ऐसे में इसका सीधा असर गांव के लोगों पर भी पड़ रहा है।

इसी चौकोर के बीच में तीनों नद‍ियां बहती हैं।

इसी चौकोर के बीच में तीनों नद‍ियां बहती हैं।

इस असर को नक्‍शे के आधार पर देखें तो पता चलता है कि पश्‍चिमी यूपी के चार जिले शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ और बागपत भौगोलिक रूप से एक चौकोर की आकृति बनाते हैं। इन चार जिलों से बने इस भौगौलिक चौकोर के बीच से ही हिंडन, कृष्णा और काली नदी बहती है। ऐसे में इन्‍हीं जिलों के गांवों पर नदियों के प्रदूषण का सबसे ज्‍यादा असर नजर आता है। गांव कनेक्‍शन की टीम ने इन चार जिलों के गांवों का दौरा किया और समझा कि नदियों के प्रदूषण का लोगों पर कितना असर पड़ रहा है।

इसी कड़ी में गांव कनेक्‍शन की टीम मुजफ्फरनगर के अटाली गांव भी पहुंची। काली नदी इस गांव से होकर गुजरती है। गांव के रहने वाले 70 साल के राजपाल सिंह घर के बाहर ही खाट पर बैठे मिल गए। जब उनसे पूछा गया 'चाचा नदी का क्‍या हाल है ?' इस पर वो बिफर पड़ते हैं और कहते हैं, ''क्‍या बताएं नदी का ... कंपन‍ियों ने नदी को मार दिया है और हमें बीमारी और मौत मिल रही वो अलग। लोग आते हैं और फोटो खींचकर चले जाते हैं। कोई कुछ नहीं कर पाता।''

फिर कुछ देर रुककर हाल चाल पूछते हुए राजपाल बताते हैं, ''20 साल पहले तक नदी इतनी साफ थी कि हम लोग इसका पानी पी लेते थे। गाय-भैंस सब पानी पी लेते। खेतों में इसी से सिंचाई हो जाती, लेकिन फिर पेपर मिल का कचरा इसमें आने लगा। अब तो यह हाल है कि घर के बाहर बैठना भी दूभर है।'' इतना कहने के बाद खुद ही सवाल करते हुए कहते हैं, ''सड़ांध की गंध आ रही कि नहीं? यह उसी नदी के पानी की गंध है। ऐसा काला पानी कि पास में जाने का मन न करे।''

मेरठ के पिठलोकर गांव में गंदा पानी द‍िखाते फजलू रहमान।

मेरठ के पिठलोकर गांव में गंदा पानी द‍िखाते फजलू रहमान।

राजपाल जिस सड़ांध की बात कर रहे थे वो हमने भी महसूस की। पूरे गांव की हवा में ऐसी गंध तैर रही थी जो गटर के पास से आती है। इससे एक बात तो साफ थी कि यहां रहने वाले लोग सांस संबंधी बीमारी से जरूर जूझ रहे होंगे। इसी सवाल का जवाब लेने जैसे ही हम आगे बढ़े तो हमारी मुलाकात 44 साल के भूपेश कुमार से हुई। भूपेश बताते हैं, ''अरे सांस की बीमारी तो बहुत छोटी है, हमें कैंसर जैसी बीमारियां भी हो रही हैं।''

इतना कहने के बाद भूपेश अपने पीछे चलने का इशारा करते हुए आगे बढ़ने लगते हैं। रास्‍ते में बुदबुदाते हुए कहते जाते हैं कि 'पानी देखोगे तो खुद ही समझ जाओगे, आओ दिखाता हूं।' भूपेश हमें एक हैण्‍डपंप के पास ले जाते हैं और उसके नीचे बाल्‍टी रखकर हैण्‍डपंप चलाने लगते हैं। उसमें से हल्‍के पीले रंग का गंदा पानी निकल रहा होता है।

इस पानी को दिखाते हुए भूपेश कहते हैं, ''अब आप समझे ? नदी में जो केमिकल बह रहा है वो रिस-रिसकर जमीन के पानी को भी खराब कर चुका है। हमारे नलों से यही केमिकल वाला पानी आता है, जिसकी वजह से हमें चर्म रोग, पेट की बीमारी, सांस की बीमारी, पैदा होने वाले बच्‍चों के अंग टेढ़े होने जैसी बीमारी और कैंसर तक हो रहा है। हमारे गांव में ही कैंसर से 10 लोगों की मौत हो चुकी है। इसमें से दो तो नए-नए लड़के थे।''

इन बीमारियों को सुनने के बाद यह सवाल उठता है कि आखिर नदियों के किनारे बसे इन गांव का भूजल कितना खतरनाक है। इसका जवाब नीर फाउंडेशन की ओर से किए गए 'वॉटर टेस्‍ट रिपोर्ट' से मिलता है। इस रिपोर्ट में मुजफ्फरनगर के दबल और मोर्कुक्‍का गांव के पानी की जांच की गई है। इसमें पता चला कि पानी में मौजूद तत्‍व अपनी तय सीमा से काफी ज्‍यादा हैं। देखें यह रिपोर्ट-

नीर फाउंडेशन की ओर से की गई 'वॉटर टेस्‍ट रिपोर्ट'

नीर फाउंडेशन की ओर से की गई 'वॉटर टेस्‍ट रिपोर्ट'

ऐसा नहीं कि यह मामला कोर्ट तक नहीं गया है। इस मामले पर दोआब पर्यावरण समिति की ओर से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में एक केस भी किया गया है। देशभर में पर्यावरण संरक्षण और वनों एवं प्राकृतिक संपदाओं के संरक्षण से संबंधित मामलों के निपटारे के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बनाया गया है। इस केस पर एनजीटी ने इसी साल जुलाई में सुनवाई के बाद उत्‍तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया था कि इन गांवों में तुरंत शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाए। साथ ही यह भी आदेश दिया कि मरीजों का मुफ्त में इलाज भी कराया जाए। इन दोनों ही बातों पर सरकार द्वारा जब गौर नहीं किया गया तो NGT ने 20 सितंबर 2019 की सुनवाई में सरकार को फटकार भी लगाई है।

दोआब पर्यावरण समिति के चेयरमैन डॉ. चंद्रवीर राणा ने गांव कनेक्‍शन को बताया, ''एनजीटी ने आदेश दिया कि जो लोग इस समस्या से पीड़ित हैं, उन्हे तुरंत शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाए। अब जल निगम की ओर से जो डाटा NGT में सबमिट किया गया है उसके मुताबिक 148 गांव को पाइप लाइन से पानी देने के लिए चिन्‍ह‍ित किया गया था। इन 148 गांव में से सिर्फ 41 गांव में ही जल निगम पानी की व्‍यवस्‍था कर पाया है। ऐसे में बाकी बचे 107 गांव अब भी जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं।'' फिलहाल यह मामला कोर्ट और राज्‍य के बीच फंसा हुआ है।

नदियों के प्रदूषण के इस मामले को और बेहतर से समझने के लिए गांव कनेक्‍शन की टीम नीर फाउंडेशन के निदेशक रमन त्यागी से मिले। रमन त्‍यागी मेरठ में रहते हुए हिंडन और कई दूसरी नदियों के लिए काम कर रहे हैं। रमन बताते हैं, ''इन तीनों नदियों की हालत इसलिए बदतर है कि इसमें इन नदियों के किनारे बसे शहरों का सीवरेज गिरता है, साथ ही इंडस्‍ट्री का वेस्‍ट भी इसमें आ रहा है। एनजीटी बार-बार इसपर आदेश देता रहा है कि इन नदियों को सुधारा जाए और इनके आस-पास बसे गांव की स्‍थ‍िति को भी सुधारा जाए। ऐसे में सरकार और एनजीटी इसपर कुछ प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हालात अभी भी जस के तस बने हुए हैं।''

रमन त्‍यागी बताते हैं, ''हमने अध्‍ययन किया तो पाया कि इन तीनों नदियों के किनारे जो सभ्‍यताएं बसी आज वो इनके प्रदूषण की वजह से उजड़ने की कगार पर हैं। क्‍योंकि जो प्रदूषण नदी में बह रहा था वो जमीन में चला गया है और फिर यही जमीन का पानी लोग हैण्‍डपंप से पी रहे हैं और बीमार हो रहे हैं। यह सिर्फ व्‍यक्‍तिगत नुकसान नहीं है। इन गांव में रहने वाले लोगों का सामाजिक ढांचा भी टूट रहा है। इन गांवों में जल्‍दी शादियां नहीं होती हैं। लोग गांव छोड़कर जा रहे हैं। अभी हो यह रहा है कि गांव में कैंसर से लोगों की मरने की खबरें आती है और सरकार के लोग कहते हैं कि यह किसी और चीज से हो रहा है। हम समस्‍या को समस्‍या मानने को तैयार ही नहीं हैं और यही सबसे बड़ी दिक्‍कत है। ऐसे में इसी खींच तान में इंडस्‍ट्री का वेस्‍ट खुलेआम नदियों में बहाया जा रहा है और इस पर कोई रोक नहीं है।''

इंडस्‍ट्री से न‍िकला वेस्‍ट जो सीधे काली नदी में बहाया जा रहा है।

इंडस्‍ट्री से न‍िकला वेस्‍ट जो सीधे काली नदी में बहाया जा रहा है।

रमन त्‍यागी जिन इंडस्‍ट्री के वेस्‍ट की बात कर रहे हैं वो इन नदियों में खुलेआम बहता दिख भी जाता है। मेरठ-मवाना रोड पर बढ़ते ही सैनी गांव के पास कई पेपर मिल का वेस्‍ट सीधे काली नदी में छोड़ा जाता है। गांव वालों से बात करने पर पता चलता है कि यह तो होता ही आ रहा है। कई बार अध‍िकारी नमूना लेने आते हैं और फिर खबरें भी छपती हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं होता।

इस मामले को लेकर जब मेरठ की कमिश्नर अनीता सी मेश्राम से मुलाकात हुई तो उन्‍होंने इस पर कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया। वहीं मुख्‍य चिकित्‍सा अधिकारी (सीएमओ) डॉक्टर राजकुमार ने बताया कि एनजीटी के निर्देश के बाद से मेडिकल टीम गांवों में कैंप लगा रही है। वे बताते हैं, ''हिंडन नदी के किनारे कुल 14 गांव में हमने कैंप लगाए थे। वहां 1484 मरीज हमने देखे जिसमें से 14 लोगों को कैंसर था। बाकी अन्‍य बीमार‍ियों से ग्रसित थे जैसे- चर्म रोग, लिवर का रोग और बुखार। यह कैंप हम हर तीसरे महीने में लगाएंगे। इसमें लोगों को पानी के हैवी मैटल्‍स को लेकर जानकारी भी दी जाएगी।''

हालांकि इस तरह के कैंप गांव में पहले से लगते आए हैं, लेकिन गांव वालों का कहना है कि इन कैंपों से कुछ खास फायदा नहीं होता है। ऐसे ही एक कैंप के बारे में मेरठ के पी एल शर्मा जिला अस्‍पताल के वरिष्‍ठ परामर्शदाता डॉक्‍टर अशोक कटारिया भी बताते हैं। वो कहते हैं, ''मैं 2013 में मुजफ्फरनगर जिले की चरथावल सीएचसी (सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र) में मेडिकल सुप्रिटेंडेंट के तौर पर तैनात था। उस वक्‍त सीएमओ साहब के निर्देश पर उस क्षेत्र की काली नदी के किनारे पड़ने वाले दो गांव जमुई और इंदरगढ़ में सात दिन तक कैंप लगाया था। इस कैंप में दिल्‍ली और लखनऊ से भी टीम आई थी। उस वक्‍त बहुत से लोग मिले जो कैंसर के मरीज थे। हमने गांव में पानी और ब्‍लड के सैंपल भी लिए थे। लेकिन उसके बाद रिपोर्ट का पता ही नहीं चला कि क्‍या हुआ। फिर मैं उधर से ट्रांसफर होकर मेरठ जिला अस्‍पताल चला आया था।''

जो बात डॉक्‍टर अशोक कटारिया बता रहे हैं वैसी ही बात गांव वाले भी बताते हैं, लेकिन उनकी बात में मायूसी साफ नजर आती है। मेरठ जिले में पड़ने वाले पिठलोकर गांव के रहने वाले 77 साल के मोहम्मद यूसुफ कहते हैं, ''गांव में कैंप तो बहुत लगते आए हैं, लेकिन कुछ होने वाला नहीं है। गांव में पीने के लिए पानी तक नहीं है। हैण्‍डपंप से पेट्रोल की तरह का पानी आता है। गांव के ज्‍यादातर लोग बाहर से खरीद कर ही पानी पीते हैं। अब कोई बहुत गरीब है तो क्‍या ही करेगा, वो जानता है कि पानी पीने से उसकी मौत हो सकती है, लेकिन वो मजबूर है।''

सहयोग- कम्युनिटी जर्नलिस्‍ट मोहित सैनी, मेरठ


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