जवान की पत्नी का दर्द : घर में बिना दाल के खाना नहीं खाते पर वहां सिर्फ चावल से कर रहे गुजारा

जवान की पत्नी का दर्द : घर में बिना दाल के खाना नहीं खाते पर वहां सिर्फ चावल से कर रहे गुजारानक्सल प्रभावित क्षेत्र में तैनात जवान

लखनऊ। देश के न जाने कितने जवान नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात हैं। हर वक्त इनकी जान पर खतरा मंडराता रहता है। जब भी सुकमा जैसा कोई हमला देश में होता है तो उस हमले में शहीद हुए परिजनों का हाल सबसे बुरा होता है लेकिन ये हमले उन परिवारों के लिए भी कम डरावने नहीं होते जिनके परिवार के लोग इन नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात हैं। किसी की मां को बेटे के चिंता में रात भर नींद नहीं आती तो किसी की पत्नी अपने पति से मिलने का इंतजार ही करती रहती है। हर जवान के परिवार की अपनी एक खास कहानी है, जिसमें उनका दर्द है, भावनाएं हैं, उनकी हिम्मत है और देश के लिए कुछ करने का जज्बा भी।

बिहार के भागलपुर में रहने वाली शिखा एमजे के पति प्रशांत पाण्डेय सशस्त्र सीमा बल के जवान हैं और वह झारखंड के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तैनात हैं। सुकमा हमले की खबर सुनकर उनकी पत्नी ने एक पोस्ट फेसबुक पर लिखी है जिसमें उन्होंने लिखा है -

जब से नक्सली हमले वाली ख़बर सुनी है ...अजीब सा लग रहा है नींद भी नहीं आ रही। प्रशांत झारखण्ड में पोस्टेड हैं अभी नक्सल ऑपरेशन में ही, कभी कभी दो तीन दिन बात नहीं होती । कभी उन्हें पहाड़ों और जंगली जगह में रात में रुकना होता है, घर पर बिना दाल के खाना नहीं खाते, पर वहां सिर्फ चावल ही मिल पाते हैं। पर फिर भी ज्यादा शिकायत नहीं करते। दुःख सिर्फ इतना होता है कि छुट्टी नहीं मिलती या जब चाहें तब बात नहीं हो पाती। मेरी मम्मी जी कभी बॉर्डर या फ़ौज वाली फ़िल्में नहीं देखतीं , उन्हें अच्छा नहीं लगता, बेटा याद आता है। कभी हॉलिडे फिल्म का गाना बज जाये तो बदल देतीं हैं तुरंत। ये जो असली जिंदगी में फौजी होते हैं न वो दौड़ कर सीने पर गोली नहीं खाते। न ही वापस लौटते वक्त कहते हैं कि नैना अश्क न हो। हकिकत में तो किसान और गरीब परिवार के बच्चे 18 -19 साल की उम्र में चले जाते हैं फ़ौज में कि बहन की शादी हो जाये तो घर चल जाएं। नक्सल और फौजी सबका पेट नेता ही भरते हैं हम परिवार वाले तो सिर्फ किसी और का किया भरते हैं।

शिखा एमजे की यह पोस्ट ऐसी है जो हर उस घर की कहानी कहती है जिस घर में कोई फौज में होता है। नक्सली अपने क्षेत्र के आस-पास से गुजरने वाले लोगों को कितना डराकर रखते हैं इससे जुड़ा किस्सा झारखंड के झुमरी तलैया में रहने वाले अभिषेक कुमार ने अपनी पोस्ट में लिखा है -

अभिषेक लिखते हैं - जब मैं 8-9 साल का था तब मैं, मेरी मम्मी, मेरी दो बहनें, दो मामा और मामा एक मुस्लिम दोस्त टीपू, हम सभी गाड़ी से जा रहे थे। शाॅर्टकट के चक्कर में हम जंगल से जाने वाले रास्ते पर चले गए और वहां नक्सली अचानक हमारी गाड़ी के सामने आ गए। हम सब इतना डर गए थे कि रोने लगे। वो हमसे गाड़ी से नीचे उतरने के लिए कह रहे थे ताकि हमारी गाड़ी को आग लगा सकें। लेकिन जब हम नहीं उतरे तो उन्होंने जबरदस्ती हमारे मामा को गाड़ी से उतार लिया और मामा के जो मुस्लिम दोस्त टीपू थे उनको अपने साथ पकड़ कर ले गए। उनमें से एक नक्सली टीपू मामा की बहन से शादी करना चाहता था इसलिए उसने मामा का किडनैप कर लिया। हम वहां से बहुत मुश्किल से निकले और सीआरपीएफ को इसके बारे में बताया। वो हमसे टीपू मामा को छोड़ने के लिए 5 करोड़ रुपये की मांग कर रहे थे लेकिन सीआरपीएफ के लोगों ने उनको पकड़ लिया और हमारे मामा को छुड़ा लिया। पता नहीं सीआरपीएफ और पुलिस के लोग वहां नहीं होते तो हमारा क्या होता।
ऐसे ही न जाने कितने लोग हैं जो हर रोज इन नक्सली क्षेत्रों में सीआरपीएफ और पुलिस वालों की मदद से अपनी जान बचाते हैं।

सोमवार का सुकमा में हुए नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हो गए। पिछले पांच सालों में देश में 5960 घटनाएं हुई हैं। इन घटनाओं में 2257 मौते हुई हैं। जिनमें 1221 आम नागरिक, 455 सुरक्षाकर्मी और 581 नक्सली शामिल हैं। गृह मंत्रालय की जानकारी अनुसार, साल 2012 से 28 अक्टूबर 2017 तक नक्सली हिंसा के चलते देश में 91 टेलीफोन एक्सचेंज और टावर को निशाना बनाया गया। 23 स्कूल भी नक्सलियों के निशाने पर रहे। साल 2017 में 28 फरवरी तक 181 घटनाएं हुई हैं। इनमें 32 नागरिक मारे गए, 14 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, 33 नक्सली मारे गए। इस साल नक्सलियों ने 2 टेलीफोन एक्सचेंज और टावर को निशाना बनाया।

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