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सवाल यह है कि पहले कभी ये मजदूर आते-जाते क्यों नहीं दिखे?

क्यों शहर अपने 'दिलों' में इन मज़दूरों के लिए इतनी आत्मीयता नहीं विकसित कर पाए कि लोग वहाँ से गाँव लौटने की बजाए ये निर्णय कर पाते कि कुछ दिनों की बात है, हम यही रुक जाते हैं।

गाँव कनेक्शनगाँव कनेक्शन   28 March 2020 11:26 AM GMT

सवाल यह है कि पहले कभी ये मजदूर आते-जाते क्यों नहीं दिखे?लॉकडाउन की वजह से रोजी-रोटी खोने वाले ये मजदूर लाखों की संख्या में अपने परिवार के साथ जाने को मजबूर हुए। फोटो साभार : ट्विटर

पूरा भारत लॉकडाउन में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील कि 21 दिन तक कोरोना से बचाव के लिए वो घरों के बाहर लक्ष्मण रेखा खींच लें। होटल-ढाबे बंद हैं, बस-ट्रेनें बंद हैं, ऐसे में दूसरे राज्यों में फँस चुके लाखों मजदूर सैकड़ों किलोमीटर दूर पैदल ही अपने घर की ओर निकल पड़े हैं, यह मजदूर क्या चाहते हैं और क्यों इन मजदूरों की ऐसी दशा हुई, पढ़ें प्रवासी मजदूर के लिए राजस्थान में काम कर रही संस्था आजीविका ब्यूरो के प्रोगाम मैनेजर कमलेश शर्मा का विशेष लेख ...

पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया के माध्यम से और ऑनलाइन मीडिया पोर्टल्स के जरिये जो खबरें सबसे ज्यादा पढ़ने में आ रही है वो है लॉकडाउन के बाद प्रवासी मज़दूरों के घर लौटने और उनके साथ आ रही दिक्कतों की समस्याएं। जमीनी स्तर पर जो भी हेल्पलाइन मदद खड़ी की जा रही है उनमें भी सबसे ज्यादा मज़दूरों का ही जिक्र है।

मीडिया भरा पड़ा है इसी तरह की खबरों से। बहुत दया और करुणा से भरी कहानियां सुनने देखने को मिल रही है।

सवाल यह है कि यह वर्ग अब तक क्यों नही दिख रहा था सबको। सरकार ने लॉकडाउन से पहले क्या इस वर्ग के बारे ज़रा भी सोचा था। मोदी जी एक झटके में कह गए, "सबको बस अपने अपने घर मे रहना है।" उनके पूरे भाषण में 'घर' पर रहने पर इतना ज़ोर था।

आज जिनके बारे में मीडिया इतना सब कुछ दिखा रहा है उनके घरों के बारे में न कभी पहले झांक कर देखने कोशिश हुई न शहरों में उनके हालतों के बारे में कभी कोई रणनीति सामने आई।

सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर को पैदल ही निकल पड़े मजदूर । फोटो साभार : ट्विटर

आज गांवों में लौटे मज़दूरों को लेकर जो माहौल बन रहा है और जो आगे आने वाले दिनों में बनेगा उसके पीछे कौन जिम्मेदार है?

क्यों लोकप्रिय प्रधान सेवक की मार्मिक अपील के बावजूद लाखों लोग वहीं नहीं रुके जहाँ वे थे?

क्यों शहर अपने 'दिलों' में इन मज़दूरों के लिए इतनी आत्मीयता नहीं विकसित कर पाए कि लोग वहाँ से गाँव लौटने की बजाए ये निर्णय कर पाते कि कुछ दिनों की बात है हम यही रुक जाते हैं।

जो करोड़ों रुपए के दान अब निकल कर आ रहे हैं पहले क्यों नही निकल कर आये?

शहरों और सरकारों ने इन मज़दूरों की सस्ती उपलब्धता की हमेशा भुनाया और उन्हें हमेशा शहर के सबसे गंदे, वंचित और सबसे बेकार इलाको में रख कर अछूत जैसा व्यवहार किया?

इन मज़दूरों को हमेशा बाहरी, गरीब और जरूरतमंद कहकर संबोधित किया जाता रहा। कभी इसके दूसरे पहलू जिसमें शहरी जरूरतों में इनकी मुख्य भूमिका को उस तरह न तो आंका गया, न ही वो महत्व दिया गया।

दूसरी बात, अगले कुछ हफ़्तों में अगर कोरोना संक्रमण बढ़ा तो इसकी जिम्मेदारी इन वंचित मज़दूरों के सिर पर मढ़ने की कवायद शुरू हो जाएगी इसकी पूरी आशंका है। आज जिनको करुणा से दाल पूरी खिला-खिला कर सेल्फियां ली जा रही हैं कल उनको अपने-अपने गाँवों में जहाँ वो बड़ी मुश्किलों से पहुँचे हैं, वहीं पर अभिशप्त कर दिया जाएगा।

अपना रोजगार खो चुके ये मजदूर अपने बच्चों को कंधे में बिठाये अपने गाँव की ओर निकल पड़े हैं । फोटो साभार : ट्विटर


हम सबकी याद्दाश्त इतनी कमजोर है कि आज हम सब कोरोना को विदेशों से आई आफत की तरह देख रहे हैं। विदेशों में खान-पान के तरीकों को इस वायरस की वजह बता रहे हैं, कल हम सब मिलकर इन बेखबर मज़दूरों पर इस महामारी का ठीकरा फोड़ने लग जाएंगे।

आप चाहकर भी चीन और इटली का कुछ नही बिगाड़ सकते लेकिन ये मज़दूर जल्दी ही आपके निशाने पर आ जाएंगे। आज तक इन पर शहरों में गंदगी फैलाने वाले, गरीबी फैलाने के आरोप लगते रहे। अब इन पर कोरोना फैलाने के आरोप लगाए जाएंगे।

आगे क्या होगा - जिन मज़दूरों को शहरों ने बिना आत्मीयता दिखाए या तो पैदल या जान हथेली पर लेकर अपने गाँव लौटने को मजबूर किया, क्या वो जल्दी ही तुम्हारे शहरों में लौट कर आएंगे? क्या तुम्हारे बहुमंज़िला इमारतों की मीनारें रातों-रात खड़ी हो पाएंगीं ? क्या तुम्हारी फैक्ट्रियों की जंग लगी मशीनों को तुम बिना इन मेहनतकशों के चला लोगे?

शहर वालों ये कभी अपना गाँव छोड़ कर शहर आना ही नहीं चाहते थे। बस इनकी मज़बूरियों ने तुमको सस्ते लोग उपलब्ध करा दिए। तुमको लगा कि ये सब इंसान नहीं है, बस मशीनें हैं। जब तुमने चाहा काम लिया फिर मुँह फेर लिया। तुम इनकी गिनती नहीं करते। तुन्हें इनका सम्मान नहीं है। तुम्हें पहले कभी ये लोग आते-जाते उस तरह से नहीं दिखे।

इस बार तो तुमने उन्हें जाते हुए ही सही देख तो लिया है। थोड़ी करुणा भी उमड़ आयी है। अभी तुम्हें उनकी कमी नहीं खलेगी। पर जब तुम फिर से अपनी जिंदगी पटरी पर लाने की कोशिश करोगे तो पाओगे कि कुछ अधूरा है। कुछ सूना है। शहर थम गया है गति बन नहीं पा रही। असली दर्द तब शुरू हो शायद।



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