ऐसे आप भी बन सकते हैं फिल्म प्रोड्यूसर 

ऐसे आप भी बन सकते हैं  फिल्म प्रोड्यूसर क्राउड फंडिंग से बन सकते हैं आप भी फिल्म प्रोड्यूसर।

फिल्म बनाना कठिन और महंगा काम है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति जल्दी फिल्म बनाने के बारे में सोच नहीं सकता हैं, लेकिन क्राउड फंडिंग एक ऐसा माध्यम है, जिसके जरिए सामान्य व्यक्ति भी फिल्में बना सकता है और प्रोड्यूसर-निर्देशक बन सकता है। फ़िल्में भारत में क्राउड फंडिंग बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं है, लेकिन नए निर्देशक इसके सहयोग से फ़िल्में बना रहे रहे हैं।

निर्देशक पवन श्रीवास्तव क्राउड फंडिंग के जरिए अपनी दूसरी फिल्म ‘लाइफ ऑफ ऐन आउटकास्ट’ बनाने जा रहे हैं। पवन श्रीवास्तव इससे पहले पलायन विषय पर ‘नया पता’ नाम से फिल्म बना चुके हैं। अपनी पहली फिल्म के लिए पवन ने नौ लाख रुपए क्राउड फंडिंग के जरिए जोड़ा था।

ओनीर की फिल्म आई एम भी क्राउड फंडिंग से बनी है।

क्या है क्राउंड फंडिंग

क्राउंड फंडिंग भारतीय समाज में मौजूद ‘चंदा’ का ही एक नया रूप है। ग्रामीण इलाकों में अब भी ज्यादातर आयोजन चंदा के जरिए होता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की लड़कियों की शादी हो या कोई धार्मिक उत्सव लोग चंदा के जरिए ये काम करते हैं। फिल्मों के लिए चंदा (क्राउड फंडिंग) इकठ्ठा करना भारत में बहुत लोकप्रिय नहीं है।

भारत में क्राउंड फंडिंग को सिर्फ गरीबों की मदद करना समझा जाता है। आई एम को बनाने में 400 लोगों ने फिल्म के निर्माण में आर्थिक रूप से सहयोग किया था। भारत में क्राउंड फंडिंग के जरिए फ़िल्में बनाने मुश्किल काम है।
ओनीर, निर्देशक, आई एम

पवन श्रीवास्तव बताते हैं, ‘नया पता के समय मुझे लगभग 350 लोगों ने नौ लाख रुपए क्राउड फंडिंग के जरिए दिया था। सार्थक फिल्मों के निर्माण में आम लोगों को भी आगे आना होगा। आम लोग मदद नहीं करेंगे तो सार्थक और समाजिक फिल्मों बननी बंद हो जाएगी।’

भारत में क्राउड फंडिंग

भारत में क्राउड फंडिंग बहुत लोकप्रिय नहीं है। यहां फिल्मों के लिए किसी से पैसा मांगना बहुत मुश्किल काम है। क्राउड फंडिंग के जरिए शुरू से फिल्में बनी है। नेशनल अवार्ड विजेता निर्देशक श्याम बेनेगल ने दुग्ध क्रांति पर पर ‘मंथन’ फिल्म का निर्माण क्राउंड फंडिंग के जरिए किया था। इस फिल्म के निर्माण के लिए पांच लाख लोगों ने दो-दो रुपए दिया था। क्राउड फंडिंग से बनी ‘आईएम’ को नेशनल अवार्ड मिल चुका है।

पवन श्रीवास्तव

आईएम के निर्देशक ओनीर क्राउड फंडिंग के सम्बन्ध में एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में बताते हैं, ‘‘भारत में क्राउंड फंडिंग को सिर्फ गरीबों की मदद करना समझा जाता है। आईएम को बनाने में 400 लोगों ने फिल्म के निर्माण में आर्थिक रूप से सहयोग किया था। भारत में क्राउंड फंडिंग के जरिए फिल्में बनाने मुश्किल काम है।’’

मंथन फिल्म के लिए पांच लाख लोगों ने दो-दो रुपए दिया था।

क्राउड फंडिंग के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बड़ी भूमिका

दलित परिवार की ज़िन्दगी पर फिल्म ‘लाइफ ऑफ ऐन आउटकास्ट’ को लेकर इन दिनों क्राउड फंडिंग कर रहे पवन श्रीवास्तव बताते हैं, ‘‘हमारे देश में क्राउड फंडिंग के जरिए फ़िल्में बनाना बहुत मुश्किल काम है। लोगों से फिल्म बनाने के लिए पैसे मांगने उन्हें लगता है कि पैसे लेकर भाग जाएगा। जब नया पता बना रहा था तो पहले लोग पैसे देने को राजी नहीं हुए। दोस्तों, रिश्तेदारों से मदद लेना शुरू किया बाद में लगभग 350 लोगों ने नौ लाख रुपए की मदद की।

हमारे देश में क्राउड फंडिंग के जरिए फ़िल्में बनाना बहुत मुश्किल काम है। लोगों से फिल्म बनाने के लिए पैसे मांगने उन्हें लगता है कि पैसे लेकर भाग जाएगा।
पवन कुमार श्रीवास्तव

बड़े स्तर पर क्राउड फंडिंग के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बड़ी भूमिका है। इन दिनों इन्टरनेट पर कई सारे साइट्स उपलब्ध है जहां से हम क्राउड फंडिंग कर सकते हैं। छोटे-छोटे फिल्ममेकर इन साइट्स के जरिए अपने सपनों को सकार कर रहे है और सामाजिक िफ़ल्में बना रहे हैं।

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