हर साल लाखों लोगों की मौतों के बावजूद पर्यावरण को लेकर क्यों गंभीर नहीं हैं राजनीतिक पार्टियां ?

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन की विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में एक दो नहीं बल्कि शुरू के करीब 10 शहरों में सिर्फ भारत के ही शहर हैं, यानी दुनिया के सभी प्रदूषित देशों की सूची में हमारा देश सबसे ऊपर आता है

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   5 April 2019 9:55 AM GMT

हर साल लाखों लोगों की मौतों के बावजूद पर्यावरण को लेकर क्यों गंभीर नहीं हैं राजनीतिक पार्टियां ?

लखनऊ। यह देश का दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर जहां दुनिया भर के कई मुल्क़ पर्यावरण से जुड़े कई अहम क़दम उठा रहे हैं, वहीं भारत में जलवायु परिवर्तन से निजात पाने के लिए कोई ख़ास संजीदगी नहीं दिखा रहा। बुधवार को एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है जिसमें भारत में बीते साल करीब 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है।

सभी राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं रिझाने में लगी हुई हैं। देश की राजनीति धर्म, जाति, ग़रीबी और भ्रष्टाचार जैसे इर्द-गिर्द घूम रही है, इसी बीच अमेरिका की हेल्थ इफैक्ट्स इंस्टीट्यूट (एचईआई) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बीते साल करीब 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2019 के मुताबिक लंबे समय तक घर से बाहर रहने या घर में वायु प्रदूषण की वजह से 2017 में स्ट्रोक, मधुमेह, दिल का दौरा, फेफड़े के कैंसर या फेफड़े की पुरानी बीमारियों से करीब पूरी दुनिया में करीब 50 लाख लोगों की मौत हुई। रिपोर्ट में बताया गया है, इनमें से तीस लाख मौतें सीधे तौर पर पीएम 2.5 से जुड़ीं हैं। इनमें से करीब आधे मौत भारत व चीन में हुई है। साल 2017 में इन दोनों देशों में 12-12 लाख लोगों की मौत इस वजह से हुई।

अमेरिका की हेल्थ इफैक्ट्स इंस्टीट्यूट (एचईआई) ने यह रिपोर्ट बुधवार को जारी की। इसमें बताया गया है कि भारत में स्वास्थ्य संबंधी खतरों से होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण और इसके बाद धूम्रपान है।

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यह अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक प्रो. बलराम भार्गव का कहना है," देश के विभिन्न राज्यों मे वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रभाव का आकलन महत्वपूर्ण है। इसकी मदद से वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों की रोकथाम में मदद मिल सकती है।"


रिपोर्ट के मुताबिक इस वजह से दक्षिण एशिया में मौजूदा स्थिति में जन्म लेने वाले बच्चों की जीवन ढाई साल कम हो जायेगा। वहीं वैश्विक जीवन प्रत्याशा में 20 महीने की कमी आएगी। संस्थान का कहना है कि भारत सरकार द्वारा प्रदूषण से निपटने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, घरेलू एलपीजी कार्यक्रम, स्वच्छ वाहन मानक और नया राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम से आने वाले वर्षों में लोगों को महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ मिलेंगे।

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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के निदेशक डॉ एस. वेंकटेश का कहना है, "पांच साल से कम उम्र के बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं वायु प्रदूषण के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से गर्भवती महिलाओं में अपरिपक्व प्रसव की संभावना बढ़ जाती है। बच्चों का मानसिक विकास और संज्ञानात्मक क्षमता भी इसके कारण प्रभावित होती है और अस्थमा एवं फेफड़ों की कार्यप्रणाली प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।"


किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के श्वसन चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सूर्यकांत बताते हैं," अगर बार-बार छींक आ रही है, नाक से पानी आ रहा है, नाक में खुजली हो रही है, नाक चोक हो रही तो समझिए आप वायु प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। अब हम नाक से आगे बढेंगे तो जैसे-जैसे हवा सांस के द्वारा नीचे जाती है, गले में खिच-खिच हो जाती है, गले में खराश हो जाती है खांसी आने लगती है इसके बाद हम और नीचे जाएंगे तो ब्रोन्काईटिस हो जाती है अस्थमा हो जाता है और अगर लम्बे समय तक अगर ये प्रदूषण रहता है तो फेफड़े का कैंसर भी होने का खतरा बढ़ जाता है।"

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वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन की विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में एक दो नहीं बल्कि शुरू के करीब 10 शहरों में सिर्फ भारत के ही शहर हैं। यानी दुनिया के सभी प्रदूषित देशों की सूची में हमारा देश सबसे ऊपर आता है। जहिर है कि इस मामले में हमें दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा चिंता करने की जरूरत है।


प्रदूषण के मामले में दुनिया में सबसे बुरी स्थिति में होने के बावजूद भी लोक नीतियों में इस समस्या को लेकर उतनी तरजीह देखने को नहीं मिलती जितनी गंभीर यह समस्या है। ना ही उस हिसाब के बड़े शोध कार्य होते दिखाई देते हैं। हमारे सालाना बजट में भी कभी नहीं देखा गया कि कोई बड़ा अनुदान इस समस्या के समाधान के उपाय जानने के लिए किया गया हो।

राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी मुहिम न सरकारी स्तर पर कभी देखी गई है और न सामाजिक स्तर पर। दिल्ली एनसीआर में भी पिछले एक दो साल में ही पटाखा बैन, रावण जलाना बैन, ऑड इवन जैसे कुछ कदम उठाये गए। क्या ये तात्कालिक उपाय बेहद नाकाफ़ी और अदूरदर्शी नहीं हैं। मसलन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से सिर्फ दिल्ली के लिए जो आपात ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान बनाया गया है उसमें इतनाभर है कि शहर की हवा की गुणवत्ता के हिसाब से उपायों की तीव्रता तय की जाएगी।

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