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मोटे अनाज की खेती की तरफ लौट रहे हैं किसान, आने वाले समय में और बढ़ेगा खेती का क्षेत्रफल

आने वाले साल में देशभर में ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो जैसे मोटे अनाज के खेती का रकबा बढ़ेगा, क्योंकि कम पानी में भी इसका अच्छा उत्पादन मिल जाता है।

Divendra SinghDivendra Singh   29 Sep 2020 12:58 PM GMT

राजेंद्रनगर(हैदराबाद)। पहले कई राज्यों में मोटे अनाज की खेती होती थी, लेकिन फिर कम उत्पादन और बाजार की कमी के कारण किसान मोटे अनाजों को छोड़कर धान-गेहूं की खेती करने लगे। एक बार फिर से मोटे अनाज की खेती की तरफ किसान लौट रहे हैं।

तेलांगना राज्य के हैदराबाद (राजेंद्रनगर) स्थित भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान एक बार फिर से मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है। भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. विलास टोनापी मोटे अनाज के फायदे गिनाते हुए कहते हैं, "मिलेट्स जिसे हम कदन्न भी बोलते हैं, इसमें बाजरा, ज्वार, रागी, कुटकी, कोदो, सावां जैसे 10-12 अनाज शामिल हैं। हमारे पूर्वज इसी की खेती करते थे, यही हमारे पूर्वजों का खाना था। लेकिन जैसे हरित क्रांति आयी, लोगों ने गेहूं, चावल की खेती शुरू कर दी, जिसकी उपज भी ज्यादा थी।"


वो आगे कहते हैं, "जैसे कि फूड पॉलिसी भी इरीगेटेड एग्रीकल्चर के आसपास ही केंद्रित हो गया, इसी वजह से ड्राईलैंड क्रॉप धीरे-धीरे पीछे चली गई। लेकिन अब फिर से जैसे-जैसे लोागें में कुपोषण की समस्याएं इतनी ज्यादा बढ़ गईं हैं, एक अनुमान के अनुसार शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लगभग 70 प्रतिशत लोग कुपोषण का शिकार हैं। मोटे अनाज से ही इन्हें दूर किया जा सकता है।"

कृषि मंत्रालय के जारी आंकड़ों के अनुसार इस बार खरीफ 2019-20 में पिछले वर्ष के 177.43 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के मुकाबले इस बार 179.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोटे अनाज की खेती हुई। 1.28 प्रतिशत की वृद्धि हुई है

केंद्र सरकार भी मोटे अनाज की खेती पर खास ध्यान दे रही है, साल 2018 को तत्कालीन केंद्रीय कृषि एवं कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाया था।

डॉ. विलास टोनापी बताते हैं, "अनुसंधान संस्थान भारत सरकार के साथ मिलकर मिलेट मिशन चला रहा है, इसमें मिलेट्स का एरिया बढ़ाने के साथ ही उत्पादन बढ़ाने की भी बात की जा रही है। अभी भारत के लगभग 23 राज्यों में मिलेट्स की खेती होती है। अभी तक लोगों के सामने परेशानी थी कि इन मोटे अनाज का प्रसंस्करण कैसे हो, संस्थान लगातार इसपर काम कर रहा है और मोटे अनाज के प्रसंस्करण ही नहीं कई तरह के उत्पाद बनाने की भी ट्रेनिंग दे रहा है।"


साइंस एडवांसेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उपलब्ध भू-जल के कुल इस्तेमाल का 80 फीसदी खेती में उपयोग हो रहा है। मोटे अनाज की खेती से भारी मात्रा में पानी बचाया जा सकता है।

"ये असिंचित फसलें हैं कम पानी में उगती हैं और कम समय में तैयार भी हो जाती हैं, इससे पशुओं के लिए चारा और लोगों के लिए चारा भी मिल जाता है। जब बारिश नहीं होती है तो यही दस-बारह फसलें ही होती है, अगर आपको दाना नहीं मिलेगा तो कम से कम पशुओं के लिए चारा तो मिलेगा। यही तो मिलेट्स के फायदें हैं।"डॉ. टोनापी ने आगे कहा।

जैसे-जैसे लोगों की लाइफ स्टाइल बदल रही है, उसी तरह से ही लोगों में कई तरह की बीमारियां भी बढ़ रही हैं। डॉ. टोनापी बताते हैं, "अभी जो लोगों में लाइफ स्टाइल से संबंधित बीमारियां जैसे, डायबिटीज हो, हार्ट संबंधित बीमारियां हों, या फिर कैंसर हो, यहां तक की एसीडिटी, क्योंकि इनमें पोषक तत्वों की मात्रा बहुत ज्यादा है, ये सभी लो ग्लाइसमिक इंडेक्स के अनाज हैं, जैसे कि डायबिटीज ऐसा खाना खाना चाहिए जिसमें शुगर की मात्रा बहुत कम हो, ये सभी अनाज, ज्वार से लेकर कुटकी, कोदो तक डायबिटीज रोगियों के लिए काफी फायदेमंद होता है।"


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 02 जनवरी, 2020 को को कर्नाटक में आयोजित कृषि कर्मण पुरस्कार वितरण के लिए आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि बागवानी के अलावा दाल, तेल और मोटे अनाज के उत्पादन में भी दक्षिण भारत का हिस्सा अधिक है। भारत में दाल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बीज हब बनाए गए हैं, जिनमें से 30 से अधिक सेंटर कर्नाटका, आंध्रा, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना में ही हैं। इसी तरह मोटे अनाज के लिए भी देश में नए हब बनाए गए हैं, जिसमें से 10 साउथ इंडिया में ही हैं।"

भारत में मोटे अनाज के उत्पादन के बारे में वो कहते हैं, "क्योंकि भारत में अभी लगभग 17 मिलियन टन मोटे अनाज का उत्पादन होता है, इसमें ज्वार, बाजरा, जैसे अनाज शामिल हैं। अभी देश में करीब 15 मिलियन हेक्टेयर में मोटे अनाज की खेती होती है। हम इस दुनिया के सबसे ज्यादा मोटे अनाज पैदा करने वाले देश हैं, लेकिन अभी जो डिमांड है अलग-अलग देशों में वो बहुत ज्यादा है। बहुत सारे लोगों में ग्लूटेन से एलर्जी होती है, खासकर के बाहर के देशों में ये समस्या बहुत होती है, लेकिन मोटे अनाज ग्लूटेन फ्री होते हैं, इसलिए इसकी एक्सपोर्ट की अच्छी गुंजाइश है। अभी जो भारत सरकार के साथ मिलकर मिलेट मिशन चल रहा है 2023 तक चलेगा, हमारी कोशिश है कि मिलेट का उत्पादन 17 मिलियन टन से बढ़ाकर 25 मिलियन टन किया जा सके। अभी प्रति हेक्टेयर इसका उत्पादन बढ़ाने की भी कोशिश है। आने वाले समय में मोटे अनाज लोगों के खाने में शामिल किए जाने की कोशिश है।"

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