'नैमिषारण्य की धरती पर चौरासी कोसी परिक्रमा'

Mohit ShuklaMohit Shukla   15 March 2019 9:20 AM GMT

नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश)। ऋषि मुनियों की धरती तपोभूमि नैमिषारण्य में चौरासी कोसी परिक्रमा जारी है। यह परिक्रमा हिंदी पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को चक्रतीर्थ में स्नान कर, शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सिद्ध विनायक जी के पूजा अर्चना कर आरम्भ होती है। और 15 दिनों तक चलती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चौरासी कोसी परिक्रमा से सम्पूर्ण तीर्थों का फल प्राप्त होता है और मनुष्य 84 लाख योनियों के भयबन्धन से मोक्ष प्राप्त करता है। इस परिक्रमा में देश-विदेश के कोने कोने से साधु संत लोग आते हैं। इस बार भी सैकड़ों श्रद्धालु नेपाल से आए हैं। पिछले वर्ष भूटान से भी सैकड़ों श्रद्धालु परिक्रमा में शामिल होने पहुंचे थे।


नैमिष के तीर्थ पुरोहित जय जय राम पांडे बताते हैं, "एक समय में इंद्र समेत सभी देवता व्रतासुर राक्षस से परेशान थे। उसके वध के लिए महर्षि दधीच ने अपनी अस्थियां दान की थी। नैमिष में तप कर रहे महर्षि दक्षीच अपनी अस्थियां दान करने से पहले सभी तीर्थों के दर्शन करना चाहते थे। उनकी अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिए भगवान इंद्र ने सभी तीर्थों को नैमिष के 5 कोस की परीधि में सभी तीर्थों को आमंत्रित कर स्थापित किया। दधिचि ने उनकी परिक्रमा कर शरीर का त्याग किया।"

जय जयराम पांडेय आगे बताते हैं, "उसी के बाद ये वरदान मिला था जो मनुष्य इस चौरासी कोसी परिक्रमा को करेगा उसे सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होगा। क्योंकि 33 कोटि देवी देवताओं ने नैमिष के चारों तरफ रुककर महर्षि दधीचि को दर्शन दिया। इससे मनुष्य को 84 लाख योनियों से मुक्ति मिलती है।"


पड़ोसी देश नेपाल के धनगढ़ी से परिवार के साथ रामादल की परिक्रमा करने आए गोविंद दास बताते हैं, कि वो पिछले तीन साल सें परिक्रमा के लिए आ रहे हैं और पैदल में नाचते-गाते परिक्रमा पूरी करते हैं।

आगरा कैंट के हरिनाथ सिंह यादव कहते हैं, "मेरे घुटनों में काफी दर्द है। धीरे-धीरे ही सही परिक्रमा पूरी करेंगे, क्योंकि हम लोग पिछले 20 वर्षों से लगातार आते रहे हैं। परिक्रमा करने से सुकून मिलता है।"

परिक्रमा में आने वाले लोग खाने पीने का सामान और ओढ़ने बिछाने की व्यवस्था साथ लेकर चलते हैं। कोई साथ साइकिल ले चलता है तो कुछ लोग ट्रैक्टर और बैलगाड़ी आदि पर सामान रखकर पैदल चलते है। 84 कोस की परिक्रमा में 11 मुख्य पड़ाव होते हैं और श्रद्धालु रोजाना करीब 8 कोस की दूरी तय करते हैं।

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले से आई चन्द्रमा दास ने रुरल मेडिकल हेल्थ में दाखिला लिया, लेकिन उसे छोड़कर अध्यामिक जीवन जीन रही हैं। केरल, उज्जैन, मथुरा और वृंदावन में कई साल बिताने के बाद वो नैमिष पहुंची और अब यहीं रहना चाहती हैं। चंद्रमा दास बताती हैं, "यहां की संस्कृति मुझे बहुत पसंद आई है। अगर यहां कोई आश्रम मिलता है तो यहीं रह जाऊंगी।"


मध्यप्रदेश के ग्वालियर से आये संजीव कुमार शर्मा के मुताबिक उनके पूर्वज भी नैमिष आते रहे हैं। संजीव बताते हैं, परिक्रम का अनुभव बहुत सुखद होता है। क्योंकि इन 15 दिनों में हम सिर्फ भगवान का नाम जपते हैं और उनका ध्यान करते हैं।"

पुरोहित जयजय राम पांडेय बताते हैं, 'पांच कोसी प्रमाणे नाम ऐते नैमिषमंडले' यानि फल्गुन की अमावस्या के अगले दिन ये यात्रा शुरु होती है। और पांच कोस में 84 कोस की परिक्रमा पूरी करनी होती है। होली के दिन इसका समापन होता है।"

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