छत्तीसगढ़ के इस आम किसान से सीखिए कृषि इंजीनियरिंग और खेती के तरीके

धमतरी (छत्तीसगढ़)। जंगल और आदिवासियों की धरती छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां पर खेती करना कठिन काम है। कुछ ऐसे भी किसान हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से ऊबड़-खाबड़, अनुपजाऊ जमीन को भी हरा-भरा बना दिया है।

धमतरी जिला मुख्यालय से लगभग 45 किमी. दूर मगरलोड में कई किमीमीटर तक जंगल और ऊबरखाबड़ जमीन ही दिखती है, लेकिन यहीं पर तीन एकड़ ऐसी भी जमीन है। जहां पर वैज्ञानिक तरीके से गोभी, मिर्च, धनिया, टमाटर, बैंगन जैसी बीस से अधिक फसलों की खेती हो रही है। ये खेत किसी प्रयोगशाला सा दिखता है। लेकिन ये खेत इतनी आसानी से नहीं बने, किसान तोरन पटेल और उनके भाइयों की ग्यारह साल की मेहनत से ये खेत उपजाऊ बन पाया है।


तोरन पटेल बताते हैं, "ग्यारह साल पहले ये खेत पूरी तरह से ऊबड़-खाबड़ था, कुछ भी खेती नहीं होती थी, तब हमारे एक रिश्तेदार ने हमें यहां खेती करने के लिए कहा तो सभी को लगा कि क्या कर पाएंगे। सबसे पहले खेत बराबर कराया, पानी का इंतजाम किया फिर सब होता चला गया और आज आज अच्छी कमाई हो जाती है।"

"पूरा घर लगता है तब जाकर अच्छी फसल मिलती है, मैं और मेरे तीन और भाई हैं हम मिलकर खेती करते हैं। अभी भिंडी और गोभी की फसल खत्म होने वाली है, उससे पहले गोभी और भिंडी की दूसरी फसल तैयार हो जाएगी। इसी तरह हम फसलों का क्रम चलाते हैं।
तोरन पटेल, किसान, मगरलोड, छत्तीसगढ़

तोरन पढ़े लिखे नहीं हैं, लेकिन जितना कुछ सीखा है खेती में प्रयोग करके ही सीखा है। एक फसल खत्म होने को होती है, उससे पहले दूसरी फसल तैयार हो जाती है। गांव कनेक्शन की टीम जब उनके खेत पहुंची तो गोभी की एक फसल कट रही थी जबकि दूसरी की नर्सरी तैयार थी। ऐसी खेत के एक हिस्से में भिंड़ी की तैयार फसल थी, बगल में टमाटर के बीच उन्होंने गर्मियों के सीजन के लिए बीज बो दिए थे।

अपने खेत में बैठे तोरन

तोरन ही नहीं उनके परिवार के सभी सदस्य मिलकर सुबह-शाम खेत में मेहनत करते हैं। तोरन कहते हैं, "पूरा घर लगता है तभी अच्छी फसल मिलती है, मैं और मेरे तीन और भाई हैं हम मिलकर खेती करते हैं। अभी भिंडी और गोभी की फसल खत्म होने वाली है, उससे पहले गोभी और भिंडी की दूसरी फसल तैयार हो जाएगी।"

खेत के एक-एक इंच का करते हैं बखूबी इस्तेमाल

तोरन ने अपने खेत की जमीन के एक-एक इंच का इस्तेमाल किया है। समतल जमीन में फसलें तो हैं ही, जमीन के ऊपर भी कई फसलें लगाई है। खेत में जमीन के अलावा स्टेकिंग विधि से टमाटर, लोबिया, सेम जैसी फसलें भी लगाईं हैं। ऐेसे में खेत का एक-एक इंच काम में आ गया है। आम बोलचाल की भाषा में इसे बाड विधि भी कहते हैं। इससे सहफसली खेती आसान हो जाती है।

यहां है धमतरी


तोरन कहते हैं, "हमने जो सीखा है यही सीखा है, ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं, लेकिन मेहनत से अच्छा अच्छा मुनाफा हो जाता है। जैसे गोभी में पांच हजार का खर्च आता है तो दस हजार तक का मुनाफा हो जाता है। मैं एक साथ एक ही जमीन पर चार से पांच फसलें लेता हूं जिससे लागत और समय दोनों की बचत होती है और अच्छा मुनाफा होता है, क्योंकि एक फसल से दूसरे फसल को खाद मिलती रहती है, फसलों में खरपतवार नहीं होता है।

जंगली जानवरों से बचाने के लिए देसी जुगाड़

चारों तरफ जंगलों से घिरे होने से जानवर फसल बर्बाद करते हैं। तोरन के पास फेसिंग (कटीले तार) लगाने के पैसे नहीं थे, तो उन्होंने यहां भी देसी तरीका अपनाया और खेत के चारों तरफ साड़ियां बांध दी हैं। "जब पौधे छोटे-छोटे रहते हैं तो खरगोश बर्बाद कर देते थे, उनसे बचाने के लिए साड़ी से घेर दिया था। इतनी ज्यादा साड़ियां नहीं थीं, इसलिए अगल-बगल के लोगों से साड़ियां मांगी और खेत को घेर दिया है।" तोरन मुस्कुराते हुए कहते हैं।


अपने खेत में उगाई सब्जियों को मगरलोड के अलावा आसपास के कस्बों में ले जाते हैं। कई बार ग्रामीण उनके खेत से भी आकर सब्जियां ले जाते हैं। उनके खेत से सटा एक डिग्रीकॉलेज हैं कई बार यहां के बच्चे भी सब्जी खरीदने के लिए तोरन के खेत पहुंचते हैं।


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