जड़ी-बूटियों की खेती से नक्सली क्षेत्र में गरीबी का 'इलाज' कर रहे डॉ. राजाराम त्रिपाठी

जड़ी-बूटियों की खेती से नक्सली क्षेत्र में गरीबी का

कोंडागाँव (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ की पहचान जंगल और आदिवासियों से है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से नक्सलवाद आदिवासी प्रभावित भी हुए है। ऐसे में यहां पर एक किसान ऐसे भी हैं जो वनोषधियों की खेती से आदिवासियों की जिंदगी बदल रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंडागाँव जिले के चिकिलकुट्टी गाँव में कई सौ एकड़ में डॉ. राजाराम त्रिपाठी 25 से अधिक वनोषधियों की खेती करते हैं। वो बताते हैं, "देखिए ये जो क्षेत्र है मूलता धान की खेती का क्षेत्र है, और यहां जो ऊसर या बंजर जमीन है, जहां पानी की व्यवस्था नहीं है, उन जगह पर लाभदायक खेती नहीं होती है, तो ऐसी जमीन पर वनस्पतियां उगा रहे हैं, और अपने आदिवासी साथियों के साथ मिलकर कर रहे हैं।"


शुरूआत में राजाराम त्रिपाठी ने 25 एकड़ में सफेद मूसली की खेती की। इससे उनको काफी मुनाफा हुआ, उसके बाद उन्होंने अपनी खेती का दायरा बढ़ाया और ज्यादा कृषि भूमि पर सफेद मूसली के अलावा स्टीविया, अश्वगंधा, लेमन ग्रास, कालिहारी और सर्पगंधा जैसी जड़ी-बूटियों की भी खेती शुरू कर दी।

राजाराम त्रिपाठी आगे बताते हैं, "हम लोग लगभग 25 प्रकार की वनोषधियों की खेती करते हैं, इसमें सफेद मूसली, अश्वगंधा, सर्पगंधा, कालमेघ, गूग्गल और अभी चंदन की शुरूआत की है। इसके साथ ही अभी मीठी तुलसी यानि स्टीविया की खेती अभी बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। बस्तर में अभी हमारे मां दंतेश्वरी हर्बल समूह की 11 सौ एकड़ में खेती हो रही है।"


इसमें में मार्केटिंग की परेशानी होती थी, इसलिए उन्होंने किसानों का संगठन बनाया है। वो बताते हैं, "अब हमसे हजारों किसान जुड़े हुए, बाजार में आढती और व्यापरियों का संगठन होता है, लेकिन किसानों का नहीं, ऐसे में अब हमारा भी संगठन मिलकर काम करते हैं।" इससे निजात पाने के लिए डॉ. त्रिपाठी ने सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन की स्थापना की। आज इस फडरेशन से देशभर के 22 हजार किसान जुड़े हैं।

वो आगे बताते हैं, "इसके साथ ही करीब सात सौ किसानों के साथ 1600 एकड़ में भी इनकी खेती हो रही है। धान की खेतीसे जो आमदनी होती है, उसकी तुलना में इसकी आमदनी तो कम से कम दोगुनी तो होती ही है। ज्यादातर हमने ऐसे किसानों को जोड़ा है जो पहले साग सब्जियों की खेती करते हैं, जिनके पास पानी या सिंचाई का साधन होता है।"


राजाराम पूरी तरह से जैविक तरीके से औषधियों की खेती करते हैं। करीब 70 प्रकार की जड़ी-बूटियों की खेती करने वाली डॉ. त्रिपाठी अपनी खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते।

उन्होंने मां दंतेश्वरी हर्बल प्रोडक्ट्स लिमिटेड के नाम से एक कंपनी भी बनायी है। इस कंपनी से कंपनी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के 350 परिवारों के 22 हजार लोगों को रोजगार मिला है। मां दंतेश्वरी हर्बल ग्रुप आदिवासी क्षेत्रों के मुश्किल हालात में काम करते हुए कई तरह के हर्बल फूड सप्लीमेंट का उत्पादन और मार्केटिंग सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया की मदद से करता है।

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