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सोशल ऑडिट प्रक्रिया से मनरेगा मजदूरों में आने लगी जागरूकता, जानने लगे अपने अधिकार

ललितपुर (उत्तर प्रदेश)। जॉब कार्ड रिन्यूल के लिए पंचायत से लेकर ब्लॉक तक कई महीने तक भटकने के बाद भी अजुद्दी अहिरवार का जॉब कार्ड रिन्यूल नहीं हो पाया, लेकिन गाँव में सोशल ऑडिट प्रक्रिया के दौरान उनकी समस्या का समाधान हो पाया। ऐसे ही सैकड़ों मजदूरों की परेशानियां थीं, जिनका अब समाधान हो पाया है।

अजुद्दी अहिरवार उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े ललितपुर जिले की महरौनी तहसील के सिलावन गाँव के रहने वाले हैं वो कहते हैं, "मनरेगा में काम करने के बाद मालूम नहीं होता था कि कितने दिन काम किया, पुराना जॉबकार्ड छह महीने पहले रिनुवल का कह कर जमा कर लिया गया, लेकिन बना कर नहीं दिया। अधिकारी कहते थे जल्दी मिल जायेगा लेकिन नहीं मिला।"


अजुद्दी जैसे सैकड़ों मजदूरों का यहीं हाल था, गाँव में सोशल ऑडिट की टीम के भ्रमण के दौरान मजदूरों ने शिकायत की। शिकायत के बाद पंचायत के प्रधान व सचिव हरकत में आए, सोशल ऑडिट की खुली बैठक के दौरान अजुद्दी की तरह बाकी मनरेगा मजदूर रिनुवल जॉबकार्ड पाकर खुश हुए।

योजनाओं के क्रियान्वयन में समुदाय की भागीदारी बढने से अनियमितताओं पर नियंत्रण होने लगा साथ ही संस्थाओं की जबाबदेही निर्धारित होने से गरीब पात्र परिवारों के हक सुनिश्चित होते हैं, सोशल ऑडिट में मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास की हुआ करती थी अब स्कूलों के मीड डे मील को भी इस दायरे में लिया गया है।

भारत में 691 जिलों के 6,921 ब्लॉक की 2,62,642 ग्राम पंचायतों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत कुल 13.51 करोड़ जॉबकार्डो पर 26.38 करोड़ श्रमिक (मजदूर) दर्ज हैं। सोशल ऑडिट नियम के अनुसार इन पंचायतों में योजनाओं से वित्तीय वर्ष में कराये गये कार्यो की सोशल ऑडिट टीम के सदस्य व गाँव के लोग सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के कार्यो की निगरानी एवं मूल्यांकन अपने स्तर से स्वयं करते हैं। टीम चार से पाँच दिन में गांव में रहकर समुदाय को साथ लेकर कार्यों का स्थलीय परीक्षण, जनसंपर्क, योजना के अभिलेखों का सत्यापन करने के बाद जनसमुदाय के बीच ग्राम सभा सोशल ऑडिट होता है। इससे योजना के कार्यो में पारदर्शिता एवं जबावदेही तय होती है। इसके लिए वर्ष में एक बार सोशल ऑडिट ग्राम सभा होती है। जिसमें सोशल ऑडिट टीम, पंचायत से जुड़े जनप्रतिनिधि और अधिकारी शामिल होते हैं। बैठक का प्रचार-प्रसार जागरूकता रैली के माध्यम से किया जाता है, जिससे गाँव के अधिक लोग बैठक में प्रतिभाग कर सकें।


सोशल ऑडिट निदेशालय द्वारा विकास खंडों की पंचायतों में सोशल ऑडिट कराने के लिए तिथि निर्धारित होती हैं प्रशिक्षित सोशल ऑडिट टीम में चार सदस्यीय लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए एक बी सेक या बीआरपी रखा जाता है। हम लोग कैलेण्डर की अवधि के अनुसार गाँव में पहुंचकर योजनाओं का तीन प्रकार से सत्यापन का जिक्र करते हुऐ महरौनी ब्लॉक के सोशल ऑडिट ब्लॉक कोऑर्डिनेटर धनीरम वर्मा कहते हैं, "पहले पहले चरण में जन समुदाय के साथ योजना के कामों का स्थलीय सत्यापन करते हैं। दूसरे चरण में जनसंपर्क के दौरान जो उस योजना से जुड़े लाभार्थी होते हैं उन लाभार्थियों से मिला जाता है उनके जो भी सवाल, समस्याएं और शिकायतें होती हैं। उनको तथ्यात्मक ढंग से संकलित कर तीसरे चरण में योजनाओं के अभिलेखों से सत्यापन एमआईएस की रिर्पोट से करते हैं। सत्यापन के बाद जो भी कमियां निकल के सामने आती हैं उनको हम लोग पायी गई कमियों को ड्राफ्ट प्रतिवेदन में शामिल करते हैं।"

सोशल ऑडिट से पूर्व योजनाओं के नियम जिम्मेदार कार्यदायी संस्थाओं की फाइलों तक सीमित रहा करते थे। जब से सोशल ऑडिट जैसा खुला मंच ग्रामीणों को मिलने लगा तब से ग्रामीण योजनाओं के सारे नियम अपने हक अधिकार उस खुले मंच के माध्यम से खुद समझने की बात करते हुए धनीराम वर्मा कहते हैं, " मनरेगा में तमाम भ्रांतियां हुआ करती थी जाँवकार्ड के लिए श्रमिक महीनों भटका करते थे लेकिन अब सोशल ऑडिट जैसे खुले मंच पर उसका आसानी से जॉबकार्ड आवेदन ले लिया जाता हैं यदि किसी मजदूर को काम नहीं मिल पा रहा हैं उन मजदूरों के सामूहिक मांग पत्र ले लिये जाते हैं ताकि उनको आसानी से नियत समय के अंदर जॉबकार्ड भी मिल सके, उनको कार्य आवंटित भी हो सकें।"


जन समुदाय कि उपस्थिति में टीम सदस्य होते हैं योजनाओं की कमियों को प्रस्तुत करते हैं। बिन्दुवार उन कमियों पर संबंधित कार्यदायी संस्था के जिम्मेदार पक्ष रखते हैं समस्या से संबंधित बिन्दू का मौके पर समाधान कि बात करते हुऐ धनीराम वर्मा कहते हैं, "ऐसी कमियां जिन पर संबंधित कार्यदायी संस्था के लोग समाधान नहीं करा पाते उन कमियों पर उचित कार्यवाही हेतू सोशल ऑडिट ग्राम सभा उपरान्त उन कमियों को ड्राफ्ट प्रतिवेदन पर अंकित कर सोशल ऑडिट निदेशालय एवं भारत सरकार की वेबसाईट के साथ मनरेगा वेबसाईट पर अपलोड किया जाता है। तदुपरांत उनके समाधान और परिपालन के लिए शासन स्तर से प्रथक से कार्यवाही होती है।"

मनरेगा नियमों की जानकारी ना होने पर ग्राम पंचायते ज्यादा काम मजदूरो से करा लेती थी। अब ऐसा नहीं होता। विकास खंड बार के मनरेगा मजदूर संतोष कुमार (52 वर्ष) बताते हैं, "पहले ज्यादा मिट्टी खोद देते थे कोई बताता नहीं था कि काम कितना करना है, अब मालूम हैं एक दिन में 60 घनपुट मिट्टी खोदकर डालना है। इसके बदले 182 रुपए मिलेंगे। मास्टर रोल पर नाम भी देख लेते हैं। सोशल ऑडिट होने से मजदूर सब कुछ जानने लगे हैं हकों की बात उठाने लगे हैं।

विकास खंड बार की ग्राम पंचायत मथुरा डाँग के कृष्ण प्रताप सिंह (53 वर्ष) सोशल ऑडिट टीम के सदस्य हैं वो कहते हैं, "गाँव वालों को मालूम होने लगा कि ये हमारी योजना हैं, इसे हम लोग ही चलाते हैं और निगरानी भी करते हैं बैठक में खुल कर अपने सवाल जबाब भी करते हैं।"


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