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गुजरात और बाक़ी दुनिया से भगाए गए लोग

गाँव-देहात के ग़रीब परिवारों से कमाने निकले लोगों को कब तक एक जगह से दूसरी जगह भगाया जाता रहेगा?

Vartika TomarVartika Tomar   9 Oct 2018 6:09 AM GMT

दुनिया भर में अपनाने और दुत्कारने की प्रक्रिया मूलत: एक है। इस प्रक्रिया की अपनी राजनीति है, अपना भूगोल है, अपना गणित है, अपनी सहूलियत हैं और अपनी असुरक्षा की भावनाएं भी।

हम चाहते हैं कि हमें सब हर हालत में अपनाएं, लेकिन हम अपनी सुविधा से अपने दायरे से लोगों को बेदखल कर देते हैं।

अमरीका में मैक्सिकन, यूरोप में सीरियाई, यूगांडा में दक्षिणी सूडानी, केन्या में सोमाली, बांग्लादेश में रोहिंग्या और भारत में बांग्लादेशी, अफ्रीकी हमेशा अवांछित, उपेक्षित ही रहे हैं. लेकिन, सस्ता मजदूर और मजबूर कर्मचारी सबको चाहिए।

गुजरात में अपना पहचान पत्र दिखाता एक उत्तर भारतीय कामग़ार. फोटो: अंकित चौहान










यह कुछ ठीक वैसा ही जैसे महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मणिपुर में बिहारियों के साथ, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ दिल्ली में, असम में बांग्लादेशियों के साथ होता रहा है और अब गुजरात में यूपी / बिहार के मजदूरों के साथ हो रहा है। इनमें से अधिकतर गांव-देहात के ग़रीब परिवारों से कमाने निकले लोग होते हैं।

बेहतर भविष्य, सुविधा और सुरक्षा की आस में अपनी पोटली बगल में बांधे, दुधमुँहे बच्चों को गोदी में लेकर, धड़कते दिल से नई जगह जा बसने का ख़तरा लेते ये सब लोग एक तार से जुड़े हैं।

गाँव से शहर पलायन

इस साल, 2018 में हम वैश्विक मानवाधिकारों की 70वीं वर्षगांठ मना रहे हैं जो हमें संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों से मिले हैं। संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थिंयों के लिए काम करने वाली इकाई के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 6 करोड़ 85 लाख लोग ऐसे हैं जिन्हें धार्मिक, राजनैतिक, भौगोलिक, आर्थिक मजबूरियों या हिंसा के डर से भागने पर मजबूर होना पड़ा। गाँव से शहरों में पलायन करने वाले भी इसी गिनती में आते हैं। ये लोग शरणार्थी या आंतरिक विस्थापित लोग कहलाते हैं। लेकिन हम आसानी से शरणार्थियों को घुसपैठियों में बदल देते हैं।

इसमें बड़ी भूमिका स्थानीय राजनीति और ग़ैर ज़िम्मेदार मीडिया की भी होती है। हमें अपने मानवाधिकार तो चाहिए लेकिन दूसरों के मानवाधिकारों के नाम पर चुप्पी ओढ़ लेते हैं।

भारत में बैठकर हम जब देखते हैं कि आईएसआईएस से जान बचा कर भागते सीरियाई शरणार्थियों को यूरोप में घुसने नहीं दिया जा रहा तो हमें बड़ा अफ़सोस होता है लेकिन हम अपने घर से रोहिंग्याओं को जाते देख खुश होते हैं।

देश के ही भीतर बाहरी बनाए गए लोगों का तो क्या कहना। उत्तर प्रदेश में बिहारी मजदूर की इज्जत जिसने कभी नहीं की होगी वो गुजरात से पिटकर भागते मजदूरों को देखकर कहता है कि हमने तो गुजरात से आए हुए को पीएम बना दिया। यह ठीक वैसा ही है जैसे अफ्रीका में भारतीयों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। उनका कहना है कि भारतीयों को हमने यहां बड़ा व्यापारी बनने दिया और भारत में अफ्रीकी पीटे जाते हैं।

गुजरात से भागते उत्तर भारतीय मजदूरों का सामान. फोटो: अंकित चौहन


इज्जत और बेइज्जती का निराला खेल चलता है। विदेश में "ब्लैक इंडियन" कहे जाने पर ख़ून खौल जाता है लेकिन अपने देश में किसी भी अफ्रीकी या दक्षिण भारतीय को दांत निपोरते हुए काला कहने में मज़ा आता है। लेकिन चलिए इस पर बात फिर और कभी अभी मुद्दे पर रहते हैं।

अवांछित का अर्थशास्त्र

सवाल उठता है कि कैसे और कब कोई ज़रूरी या गै़रज़रूरी हो जाता है। क्या यह महज एक संयोग होगा कि गुजरात में मचे बाहरी बनाम गुजराती संघर्ष के बीच गुजरात सरकार की आधिकारित वेबसाइट और गुजरात की अर्थव्यवस्था के आंकड़े बताने वाली वेबसाइट एक साथ काम करना बंद कर दे।

एक अप्रैल 2015 को फर्स्टपोस्ट ने छापा कि गुजरात में नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार में 76 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 3 दिसंबर 2017 को टाइम्स ऑफ इंडिया कहता है कि गुजरात में बलात्कार की 53 % घटनाएं 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुईं। इसी अख़बार ने 23 सितंबर 2018 को ख़बर दी कि गुजरात में हर दिन दो से ज़्यादा बलात्कार होते हैं। ऐसे में साबरकांठा मामले को गुजराती बनाम बाहरी बना देना बेहद मौका-परस्त लगता है।

बलात्कार की शिकार चौदह माह की बच्ची की साबरकांठा स्थित वह झोंपड़ी जहां उसका परिवार गुजर-बसर करता था। फोटो: अंकित चौहान

गुजरात की अर्थव्यवस्था जब तक मज़बूत रही तब तक वहाँ बाहरी मजदूरों से किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। राज्य में पिछले दो साल एक्सपोर्ट में ज़बरदस्त गिरावट रही और नौकरियों में कमी आई इसके प्रमाण इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों की वेबसाइट पर अब भी देखने को मिल जाएंगे। लेकिन उत्तर प्रदेश का नेतृत्व कहता है कि यह गुजरात से जलने वालों की साज़िश का नतीजा है।

अहमदाबाद मिरर की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2016 में जारी हुए सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2016 के बीच गुजरात में 23,806 फैक्ट्री बंद हुईं जिससे 12.57 लाख मजदूर बेरोजगार हो गए। ज़ाहिर है राज्य में बेरोजगारी बढ़ी होगी। बाहरी कामगारों से से बैर बढ़ना स्वाभाविक है।

इसी फैक्ट्री में चौदह माह की बच्ची के बलात्कार का आरोपी काम करता था. फोटो: अंकित चौहान


यह ठीक वैसा ही है जैसे सबसे विकसित देशों में से एक जर्मनी ने सीरियाई शरणार्थियों को तब तक अपनाया जब तक उसकी अपनी अर्थव्यवस्था भरी पूरी थी। एक बलात्कार के मामले की ही आड़ लेकर वहाँ भी सीरियाई शरणार्थियों के खिलाफ़ माहौल बनाया गया था।

पिछले कुछ सालों में मध्य-पूर्वी देशों को तेल की क़ीमत कम हो जाने पर भारी नुकसान हुआ। साउदी अरब, कुवैत, यूएई जैसे अमीर तेल संपंन्न देशों की भी अर्थव्यवस्था डोली। स्थानीय नागरिकों ने बेरोजगारी पर असंतोष ज़ाहिर किया। हजारों की संख्या में भारतीय मजदूर, कामगार जबरन वापस भेजे गए। ब्रेक्ज़िट हो जाने दीजिए, देखिए ब्रिटेन में भी यही होने की संभावना है।

लेकिन इन सब के बीच सवाल यही है कि भरे-पूरे पेट और मन के साथ अपनाना और अपने पर आने पर दुत्कार देना कितना सही है? आसान काम करने का कितना चाव रहता है इंसान को।

बेहतर दुनिया का सूत्र?

सवाल तो और भी कई हैं लेकिन एक हालिया सवाल जो भारत की नागरिक होने के नाते अधिक कचोटता है वह यह जब देश के सबसे तथाकथित विकसित राज्यों में से एक गुजरात का यह हाल है तब बाक़ी राज्यों का क्या हाल होगा। पिछले महीने मेरे एक जानकार ने मुझे बताया था कि गुड़गाँव का उसका एक भरा-पूरा व्यापारी दोस्त इस लिए कनाडा शिफ्ट हो गया क्योंकि गुड़गाँव में फैक्ट्रियाँ बंद हो रही हैं। मैंने खुद तो नहीं देखा, लेकिन उनके बताए अनुसार गुड़गाँव इंडस्ट्रियल एरिया में खतरनाक़ सन्नाटा है। अधिकतर फैक्ट्रियाँ बंद हो गई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया एक बार फिर इसकी गवाही देता है।

गुजरात के आंकड़े बताने वाली गुजरात सरकार की आधिकारिक वेबसाइट काम नहीं कर रही है। स्क्रीन शॉट: वर्तिका


फैक्ट्रियों के मालिक तो कनाडा यूएस शिफ्ट हो जाएंगे लेकिन वहाँ काम करने वाले मजदूर कर्मचारी कहाँ जाएंगे? जब गुजरात जैसे राज्य में काम नहीं है तो कहाँ होगा? जहाँ जाएंगे वहाँ से फिर गुजरात की तरह भगाए जाएंगे। ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र, मणिपुर से बिहारी, असम से बांग्लादेशी. इंग्लेंड से अफग़ान, जर्मनी से सीरियाई, सउदी अरब से भारतीय मजदूर भगाए गए। इन भगाए गए, डरे हुए लोगों का क्या होगा? इनके परिवार, इनके बच्चों का क्या होगा?

और आखिर में सवाल फिर वही, क्या अपनाने और दुत्कारने में इतना गणित दुनिया को बेहतर बनाने का सही सूत्र दे रहा है?

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