कहीं आपकी मक्का की फसल तो बर्बाद नहीं कर रहा फॉल आर्मीवर्म, ऐसे करें पहचान

पिछले कुछ महीनों में ये कीट देश के कई राज्यों में दिखा है, दक्षिण भारत के कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के बाद छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, उत्तर प्रदेश और अब बिहार में मक्का की फसल में देखा गया है, इस कीट के बारे में अभी किसानों को जागरूक होने की जरूरत है।"

Divendra SinghDivendra Singh   26 Aug 2019 5:36 AM GMT

कहीं आपकी मक्का की फसल तो बर्बाद नहीं कर रहा फॉल आर्मीवर्म, ऐसे करें पहचान


तीन साल पहले अफ्रीका में मक्के की फसल बर्बाद करने वाला फॉल आर्मीवर्म भारत के कई राज्यों में पहुंच चुका है, अगर समय रहते इसका नियंत्रण और सही पहचान न हुई तो आने वाले समय ये काफी नुकसान पहुंचा सकता है।

फॉल आर्मीवर्म कर्नाटक और तमिलनाडू, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के बाद उत्तर प्रदेश के कन्नौज और फिर सीतापुर जिले में मक्का की फसल में दिखा है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद के लहरपुर तहसील के ग्राम बरबटा ज़ालिमपुर के किसान नन्द किशोर ने करीब एक एकड़ में मक्के की बुवाई की है। वो बताते हैं, "बहुत साल से मक्के की खेती करते आ रहा हूं, लेकिन इस बार पता नहीं कौन सा कीड़ा लगा है, जो पहले कभी नहीं लगा था। ये कीड़ा तेजी से मक्के की फसल को बर्बाद कर रहा है।"

पंजाब के लुधियाना में मक्का की फसल में लगा फॉल आर्मीवर्म

इससे पहले मई महीने में क्षेत्रीय केन्द्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, लखनऊ के वैज्ञानिकों कन्नौज जिले में फसल निगरानी और सर्वेक्षण के दौरान मक्का की फसल में फॉल आर्मी वर्म को देखा था।

भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना के वैज्ञानिक डॉ मुकेश चौधरी बताते हैं, "पिछले कुछ महीनों में ये कीट देश के कई राज्यों में दिखा है, दक्षिण भारत के कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के बाद छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, उत्तर प्रदेश और अब बिहार में मक्का की फसल में देखा गया है, इस कीट के बारे में अभी किसानों को जागरूक होने की जरूरत है।"


वो आगे कहते हैं, "अभी इसे हमने पंजाब में भी देखा है, ये एक रात में सौ किमी तक कवर कर लेता है, इसलिए पहले ये साउथ में दिखा। मान लीजिए ये किसी खेत में दिखा और केमिकली कंट्रोल नहीं कर पाए तो ये सौ किमी आगे चले जाते हैं, यही नहीं ये एक एडल्ट कीट बार में एक हजार अंडे देता है, अगर उसमें से दस भी बच गए तो उनमें से दस हजार अंडे देंगे।"

इसका असर उत्पादन पर भी पड़ा है। इस बारे में वो बताते हैं, "इससे प्रोडक्शन पर भी असर पड़ रहा है, इस बार साउथ इंडिया में लोगों ने मक्का लगाना कम कर दिया, क्योंकि इसका फेवरेट मक्का ही होता है। इसके बाद अगर इसे मक्का नहीं मिलेगा तो ये गन्ने पर चला जाएगा। अगर ये भी नहीं है तो ज्वार, बाजरा में भी चला जाएगा। इसका मुख्य भोजन मक्का ही होता है, अगर मक्का नहीं मिलता तो ये दूसरी फसलों में चला जाता है, ये 190 तरह की फसलों को नुकसान पहुंचाता है।"

इस कीट का दुष्प्रभाव भारत में पहली बार 18 मई 2018 को कर्नाटक के शिवामोगा में देखा गया। बाद में फॉल आर्मीवर्म को तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, छत्तीसगढ़, केरल, राजस्थान, झारखण्ड, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश और सिक्किम में हानिकारक स्तर तक किसानों के खेतों में रिपोर्ट किया गया।

कृषि विज्ञान केंद्र, सीतापुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ दया शंकर श्रीवास्तव बताते हैं, "इस कीड़े का नाम 'फॉल आर्मीवर्म' नाम से जाना जाता है, इसको भारत मे पहली बार मई 2018 में कर्नाटक के शिवमौगा जनपद में मक्के की फसल में देखा गया था। उसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मिजोरम में भी यह कीड़ा तेजी से पैर पसार चुका है। उत्तर प्रदेश में एक बड़े पैमाने पर गन्ने व मक्के की खेती की जाती है। इस लिए इस कीड़े का प्रदेश में पाया जाना एक बहुत ही गम्भीर चिंता का विषय है।"


मुख्य रूप से मक्का का एक कीट है। यदि मक्का की फसल उपलब्ध नहीं होती है तो यह ज्वार की फसल पर आक्रमण करता है। यदि दोनों ही फसलें उपलब्ध नहीं हैं तो यह अन्य फसलों जैसे- गन्ना, चावल, गेहूं, रागी, चारा घास आदि जो कि घास कुल की है पर आक्रमण करता है। यह कपास और सब्जियों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। फॉल आर्मीवर्म के वयस्क पतंगे तीव्र उड़ान भरने वाले होते हैं जो मेजबान पौधों की तलाश में 100 किलोमीटर से भी अधिक उड़ सकते हैं।

ऐसे करें फॉल आर्मीवर्म की पहचान

विशिष्ट फेरोमोन जाल, फॉल आर्मीवर्म के नर पतंगों को आकर्षित करते हैं। नर पतंगों में दो लक्षण चिह्न होते हैं, यानी, केंद्र की ओर एक भड़कीला रंग का स्थान और अग्रपंख के शिखर भाग पर एक सफेद पैच। मादा के अग्रपंख बेजान व धुंधले निशान वाले होते हैं।

फॉल आर्मीवर्म का जीवन चक्र: फॉल आर्मीवर्म की एक मादा पतंग, अकेले या समूहों में अपने जीवन काल में 1000 से अधिक अंडे देती है, जो बालों से ढके होते है। अण्डों की ऊष्मायन (इन्क्यूबेशन) अवधि 4 से 6 दिन तक होती है। समूह में नए जन्मे लारवा हैचिंग साइट से फैलते हैं और नयी पत्तियों की निचली सतह की एपिडर्मल परतों पर खाने के लिए पहुंचते हैं। लारवा अपने विकास में 14 से 18 दिन लगाता है और इस दौरान इंस्टार नामक 6 अवस्थाओं से गुजरता है और उसके बाद पुतलीकरण अवस्था से गुजरता है। प्यूपा लाल भूरे रंग का होता है जो 7 से 8 दिनों के बाद वयस्क कीट में परिवर्तित हो जाता है। वयस्क पतंगे 4 से 6 दिनों तक जीवित रह सकते हैं। भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, शीतकालीन नर्सरी केंद्र, हैदराबाद में प्राकृतिक पालन परिस्थितियों के अंत्तर्गत इस कीट का कुल जीवन चक्र अगस्त से जनवरी महीने में 31 से 35 दिन का होता है।

फॉल आर्मीवर्म की हानिकारक अवस्था

फॉल आर्मीवर्म की केवल लारवा अवस्था ही मक्का की फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। इसके लारवा मुलायम त्वचा वाले होते हैं और बढ़ने के साथ ही रंग में हल्के हरे या गुलाबी से लेकर भूरे रंग के हो जाते हैं।

मक्का में फॉल आर्मीवॉर्म के लक्षण और प्रबंधन

फॉल आर्मीवर्म के प्रबंधन में लक्षण आधारित उपचार दो कारणों से बहुत आवश्यक है:- पौधे पर लक्षणों के बढने की अवस्था लारवा वृद्धि को दर्शाती है और कीटनाशक या नियंत्रण उपाय का चुनाव लारवा वृद्धि की अवस्था पर निर्भर करता है।

फॉल आर्मीवर्म की पहचान

A नर पतंगे में हल्के पीले रंग का धब्बा (a) और सफेद रंग का एक धब्बा (b) B मादा के अग्रपंख पर धुंधले निशान A नर पतंगे में हल्के पीले रंग का धब्बा (a) और सफेद रंग का एक धब्बा (b) B मादा के अग्रपंख पर धुंधले निशान

फॉल आर्मीवर्म की कई प्रजातों के लारवा मिथिम्ना और स्पोडोप्टेरा जीनस से संबंधित हैं जो एक समान दिखते हैं और मक्का में एक समान लक्षण पैदा करते हैं। फॉल आर्मीवर्म के लारवा हरे, जैतून, हल्के गुलाबी या भूरे रंगों में दिखाई देते हैं। और प्रत्येगक उदर खंड में चार काले धब्बों और पीठ के नीचे हल्की पीली रेखाओं से पहचाने जाते हैं। इसकी पूछ के अंत में काले बड़े धब्बे होते हैं जो कि उदर खंड आठ पर वर्गाकार पैटर्न और उदर खंड नौ पर समलंबाकर आकार के में व्यवस्थित होते हैं, जिसकी वजह से यह आसानी से किसी भी अन्य प्रजाति से अलग पहचाना जा सकता है। सिर पर आंखों के बीच में अंग्रेजी के वाई आकार की एक सफेद रंग की संरचना बनी होती है।

मक्का में फॉल आर्मीवॉर्म के लक्षण और प्रबंधन

फॉल आर्मीवर्म के प्रबंधन में लक्षण आधारित उपचार दो कारणों से बहुत आवश्यक है:- पौधे पर लक्षणों के बढने की अवस्था लारवा वृद्धि को दर्शाती है और कीटनाशक या नियंत्रण उपाय का चुनाव लारवा वृद्धि की अवस्था पर निर्भर करता है ।

1. कागजी छिद्रः अंकुरित अवस्था से ही मक्का की फसल का अवलोकन करना शुरू कर देना चाहिये। यदि सभी आकार के लम्बे और कागजी छिद्र आस-पास के कुछ पौधों की पत्तियों में फैले हुए दिखाई देते हैं, तो फसल फॉल आर्मीवर्म से प्रभावित सकती है। यह लक्षण फॉल आर्मीवर्म लारवा की पहली और दूसरी इंस्टार के कारण होते हैं जो पत्ती की सतह पर खुरचकर खाते हैं। इस लक्षण की प्रारंभिक पहचान फॉल आर्मीवर्म के प्रभावी प्रबंधन के लिए बहुत जरूरी है।


प्रबंधन: इस स्तर पर वानस्पतिक आरै सूक्ष्मजीव कीटनाशकों के माध्यम से लारवा का प्रबंधन करना आसान होता है।

1. 5 % नीम बीज कर्नेल इमल्शन या एजेडिराक्टिन 1500पीपीएम/5मिली/लीटर पानी।

2. बेसिलस थूरिजिंनेसिज फॉर्मूलेशन (डिपल 8एल / 2 मिली/लीटर पानी या डेल्फिन 5 डब्ल्यूजी / 2 ग्राम/लीटर पानी)।

3. एन्टोमोपैथोजेनिक कवक मेथेरिजियम एनिसोप्लाए / 5 ग्राम/लीटर और/या नोमुरिया रिलेयी चावल अनाज फार्मूलेशन / 3 ग्राम/लीटर पानी।

हालांकि, जब क्षेत्र में संक्रमण 10 प्रतिशत से अधिक होता है, तो रासायनिक कीटनाशकों का सहारा लेना बेहतर होता है जो बड़े लारवा के लिए अनुशंसित हैं। कीटनाशक स्प्रे के अलावा, कुछ रेत/मिट्टी को अकेले या चूना/राख (9:1) के साथ मिला कर पौधे की गोब में उस समय डालें जब गोब इसके वजन को झेलने के लिए अच्छी तरह विकसित हो जाये। यह सीधे लारवा को नुकसान पहुंचाएगा और विशेष रूप से मिट्टी के द्वारा माइक्रोबियल कीटनाशकों को संरक्षण प्रदान करते हुए, छिड़काव किए गये कीटनाशकों की प्रभावशीलता को बढ़ाएगा।

2. कटे-फटे छिद्र: एक बार जब लारवा तीसरे इंस्टार में प्रवेश करता है, तो इसकी खाने की प्रवृति के कारण पत्तियों पर कटे-फटे (गोल से आयताकार आकार के) छिद्र बन जाते हैं। लारवा की वृद्धि के साथ छिद्रों का आकार भी बढ़ता जाता है।

 फॉल आर्मीवर्म लारवा की तीसरी (A) और चौथी इंस्टार (B) द्वारा नुकसान फॉल आर्मीवर्म लारवा की तीसरी (A) और चौथी इंस्टार (B) द्वारा नुकसान

प्रबंधन: फॉल आर्मी वर्म लारवा की तीसरी और चौथी इंस्टार के द्वारा नुकसान होने पर निम्नलिखित रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव की आवश्यकता होती है।

1. स्पिनेटोरम 11.7 प्रतिशत एस सी 0.5 मिली / लीटर पानी

2. क्लोरेंट्रानिलिप्रोएल 18.5 एससी / 0.4 मिली / लीटर पानी

3. थियामेथोक्साम 12.6% + लैम्बडा साइहैलोथ्रीन 9.5 % जेड सी / 0.25 मिली/लीटर पानी

3. अत्याधिक पत्ती हानि: जब लारवा पांचवें इंस्टार में प्रवेश करता है, तो यह पत्तियों को तेजी से खा कर खत्म कर देता है। छठे इंस्टार लारवा बड़े पैमाने पर पत्तियों को खा कर नष्ट करते हैं और बड़ी मात्रा में मल पदार्थ का स्राव करते हैं।

प्रबंधन: कीटनाशकों के स्प्रे (छिड़काव) से पांचवें और छठे इस्टार लारवा को नियंत्रित करना अक्सर कठिन होता है। इस स्तर पर केवल विशेष चारा (कीट को फंसाने के लिए जहरीला पदार्थ) एक प्रभावी उपाय है। इसके लिए दो-तीन लीटर पानी में 10 किलो चावल की भूसी में दो किलो गुड़ मिलाएं और मिश्रण को 24 घंटे तक किण्वन के लिए रखें। खेतों में अनुप्रयोग से आधे घंटे पहले 100 ग्राम थायोडिकार्ब 75 % मिलाएं और 0.5-1 सेवी व्यास के आकर की गोलियां तैयार करें। यदि गोलियां बहुत चिपचिपी है तो रोल करते समय कुछ बालू मिला लें। इस तरह से तैयार किए गए विशेष जहरीले पदार्थ को शाम के समय पौधों में डालें। ये मिश्रण एक एकड़ के लिए पर्याप्त होता है।

4. टेसल (नर मंजरी) और भूट्टे को नुकसानः मक्का फसल की प्रजनन अवस्था में टेसल और भुट्टा, दोनों ही पौधे के बहुत संवेदनशील भाग होते हैं। टेसल क्षति मुख्यताः होती है, जिससे आर्थिक नुकसान नहीं होता, लेकिन भुट्टों में वेधन सीधे पैदावार को प्रभावित करता है। स्वीट कॉर्न में भुट्टों को फॉल आर्मीवर्म के द्वारा नुकसान का खतरा अधिक होता है जो भुट्टों को बिक्री के लिए अप्रमाणित बनाता है।

लारवा द्वारा क्षत्रिग्रस्त टैसल (A) विकासशील भुट्ठा (B) और स्वीट कॉर्न (C)लारवा द्वारा क्षत्रिग्रस्त टैसल (A) विकासशील भुट्ठा (B) और स्वीट कॉर्न (C)

प्रबंधन: फसल में फॉल आर्मीवर्म को नियंत्रण करने के लिए क्षति सीमा मक्का फसल की प्रजनन अवस्था में रासायनिक नियंत्रण उचित नहीं है। क्योंकि सामान्यतः टेसल की क्षति से आर्थिक नुकसान नहीं होता है। और मक्का के भुट्टों पर छिड़काव करना व्यर्थ होगा क्योंकि लारवा भुट्टे के अंदर छिपने के बाद कीटनाशक स्प्रे के संपर्क में नहीं आएगा। इसके अलावा स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न में रसायनों का छिड़काव करना उचित नहीं है, क्योंकि इनको अक्सर बिना प्रसंस्करण के ही सेवन किया जाता है। अतः टिप को कवर करने के साथ ही कसी हुई (टाइट) हस्क वाली मक्का की किस्मों का चयन फॉल आर्मीवर्म के विरुद्ध कुछ सुरक्षा प्रदान कर सकता है।


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