महिलाएं बन रहीं सशक्त, समूह बनाकर चला रहीं डेयरी

महिलाएं बन रहीं सशक्त, समूह बनाकर चला रहीं डेयरीगाँव कनेक्शन

बाराबंकी (अलादापुर)। डेयरी उद्यम को मुख्यत: पुरुषों से जोड़कर देखा जाता रहा है लेकिन इस धारणा को बाराबंकी के अलादापुर की रीता सिंह बदलने में जुटी हैं। इन्होंने पिछले दो वर्षों में डेयरी के ज़रिए न सिर्फ खुद की माली हालत सुधारी बल्कि गाँव की अन्य महिलाओं को भी सशक्त बनाया।

इस प्रयास में रीता को मदद मिली ‘महिला डेयरी परियोजना’ से। यह परियोजना भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चलाई गई थी। 

बाराबंकी ज़िला मुख्यालय के पूर्व में लगभग 45 किलोमीटर दूर बसावनपुर गाँव में रीता (37 वर्ष) परियोजना के तहत एक समिति का संचालन करती हैं और स्वयं परियोजना की सचिव हैं। रीता ने जब डेयरी की शुरुआत की थी तब उनके पास केवल एक ही पशु था, अब उनके पास 10 पशु हैं जिनसे वे रोज 40-50 लीटर दूध का उत्पादन करती हैं। 

दरअसल प्रदेश में प्रादेशिक कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन लिमिटेड (पीसीडीएफ) द्वारा संचालित इस योजना के तहत महिलाएं साथ आकर परियोजना के अंतर्गत समिति गठित करते हैं। समिति में एक अध्यक्ष और एक सचिव होता है। समिति के सभी पदों पर महिला सदस्य ही होती हैं।

समिति का निर्माण करके उसे सहकारी समितियों के साथ जोड़ती हैं। इसके बाद सभी महिलाएं पशुओं द्वारा उत्पादित दूध को एक साथ इकट्ठा करके सहकारी समितियों के माध्यम से बेच सकती हैं। इससे दूध अच्छे दामों पर बिकने की अनियमितता से महिलाओं को छुटकारा मिल जाता है। साथ ही साथ सरकार द्वारा इन समितियों को पशु बीमा, प्राथमिक चिकित्सा, पशु आहार, मुफ्त दवाईयां, और हरे चारे के बीज आदि उपलब्ध करवाए जाते हैं।

‘‘महिला डेयरी परियोजना में किसी भी प्रकार का लक्ष्य निर्धारित नहीं होता है और न ही ऋण संबंधी कोई समस्या होती है। इसमें महिला के पास जो पशु होता है, उससे वह समिति को दूध दे सकती हैं और समिति की सदस्य बन सकती हैं। यह उनके रोज़गार के लिए बढि़या योजना बन जाती है।’’ बाराबंकी जिले में महिला डेयरी परियोजना की देख-रेख कर रहे पीसीडीएफ के प्रभारी अधिकारी केपी सिंह ने बताया।

‘‘पशुओं का सारा काम ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं पर उनको कोई लाभ नहीं मिल पाता था। इस योजना से महिलाओं को रोज़ पैसे मिलते हैं, जिससे वह बचत भी कर पाती हैं। महिलाओं के लिए यह योजना रोज़गार का अच्छा मौका है’’ ‘‘समिति में जुड़े सदस्यों के बारे में रीता आगे बताती हैं, इस समय गाँव की लगभग 14-15 महिलाएं समिति की सदस्य हैं, जो रोज 65-70 लीटर दूध समिति को देती हैं’’।

रीता ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं पर डेयरी योजना से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने पर खर्च करती हैं। रीता बताती हैं, ‘‘मैं पूरे महीने में 15 से 20 हजार रुपए कमा लेती हूं, जिससे बच्चों को अच्छा पढ़ा-लिखा रहे हैं।’’ 

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