पत्रकारों की ज़्यादा तर हत्याओं में राजनैतिक समूहों का हांथ

पत्रकारों की ज़्यादा तर हत्याओं में राजनैतिक समूहों का हांथgaonconnection, पत्रकारों के 96 फीसदी हत्यारे कभी पकड़े ही नहीं गए

लखनऊ। बारह और तेरह मई को देश के अलग-अलग राज्यों में दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई। ये कोई अलग-थलग मामले नहीं। पिछले लगभग बीस वर्षों में देश में पत्रकारों की इतनी हत्याएं हुईं है कि आज भारत उस फेहरिस्त में शामिल है जिसमें गृह युद्ध से जूझ रहे ईराक और सीरिया जैसे देश हैं।

 

मई 13, 2016 को बिहार के सिवान में दैनिक हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ राजदेव राजन को गोली मार दी गई। राजदेव को छाती और सिर पर गोली मारी गई। हत्या का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है।

राजन की हत्या के कुछ घंटों पहले ही 12 मई, 2016 को झारखण्ड के चतरा में एक लोकल टीवी चैनल ‘ताज़ा टीवी’ के पत्रकार अखिलेश प्रताप की भी हत्या कर दी गई। खबरों के अनुसार अखिलेश पर हमला उस वक्त हुआ जब वो अपनी मोटरसाइकिल पर रात को घर लौट रहे थे। अज्ञात हमलावरों ने प्रताप को तीन गोलियां मारीं। प्रताप की हत्या का कारण भी अज्ञात ही बना है।  पत्रकारों की हत्याओं की वजह अज्ञात बना रहना कोई नई बात नहीं। एक अध्ययन के अनुसार 1992 से लेकर 2016 तक देश में 64 पत्रकारों की हत्याएं हुई। इनमें से 38 हत्याएं सीधे तौर पर पत्रकारों के पेशे से जुड़ी थीं और बाकी हत्याओं का उद्देश्य आज तक साफ नहीं हुआ। इन हत्याओं के चलते पत्रकारों के लिए भारत विश्व के 10 सबसे खतरनाक देशों में नवें स्थान पर है।

कई देशों में संचालित ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) द्वारा कराए गए इस अध्ययन के अनुसार जिन हत्याओं के उद्देश्य साफ हो पाए उनमें यह सामने आया कि 47 फीसदी हत्याएं राजनैतिक समूहों ने कराईं थीं। मारे गए पत्रकारों के हत्यारों में से 96 फीसदी कभी पकड़े ही नहीं गए, चार फीसदी पकड़े भी गए तो मामले में “पार्शियल जस्टिस” यानि आंशिक न्याय ही मिल सका।

 “पत्रकारों पर हमला करने वालों पर कार्रवाई न कर पाने का भारत का रिकॉर्ड, पत्रकारों के प्रति देश में एक खतरनाक माहौल का पोषक है,” सीपीजे के सुमित गहलोत, सीनियर रीसर्च एसोसिएट, एशिया प्रोग्राम ने कमेटी द्वारा बिहार और झारखण्ड में हुई दोनों हत्याओं के विरोध में जारी रिपोर्ट में कहा। सीपीजे के अध्ययन के मुताबिक भारत में मारे गए पत्रकारों में से 71 प्रतिशत अख़बार के लिए काम करते थे। मारे गए इन पत्रकारों में से 47 फीसदी राजनैतिक मुद्दों पर, 37 फीसदी भ्रष्टाचार, 21 फीसदी व्यापार, क्राइम व संस्कृति और 18 फीसदी मानवाधिकार के मुद्दों पर लिखते थे। तीन फीसदी पत्रकार वॉर यानि जंग से जुड़े मुद्दों पर लिखते हुए मारे गए।

इन मुद्दों पर सरकारों की गंभीर का पता इसी बात से चलता है कि देश भर में अपराध के मामलों को दर्ज कर न्याय व्यवस्था की समीक्षा के लिए रिपोर्ट तैयार करने वाले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने वर्ष 2014 से ही पत्रकारों पर हमलों की घटनाओं को अलग से दर्ज करना शुरू किया है।    

यूपी में सबसे ज्यादा हमले

सरकार द्वारा संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2014 में देश में पत्रकारों पर हमले के 113 मामले दर्ज़ किए गए, सबसे ज्यादा 63 यूपी से थे। बिहार में 33 मामले, एमपी में सात और महाराष्ट्र में पांच मामले हुए। 

फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला चलाने की मांग

भारतीय पत्रकार परिषद ने मामले में केंद्र से जांच कर, फास्टट्रैक कोर्ट के तहत सुनवाई करने का आग्रह किया। वहीं केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने तेजी से निष्पक्ष जांच के लिए आश्वस्त किया।

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