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बिहार बाढ़: न पेट भर खाना, न स्वास्थ्य देखभाल और न ही शौचालय, एक महीने से शरणार्थियों की जिंदगी जी रहे बाढ़ पीड़ित

दरभंगा के प्रखंड-कुशेश्वरस्थान पूर्वी के 200 परिवार पिछले एक महीने से अधिक समय से बाढ़ के कारण अपने घर से विस्थापित हो गए हैं। वे कोसी के पूर्वी तटबंध और रेलवे पटरियों पर अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रह रहे हैं।

Rohin KumarRohin Kumar   25 Aug 2020 4:15 AM GMT

बिहार बाढ़: न पेट भर खाना, न स्वास्थ्य देखभाल और न ही शौचालय, एक महीने से शरणार्थियों की जिंदगी जी रहे बाढ़ पीड़ित

रोहिण कुमार, सत्यम झा ..

जब पूरे भारत में लाखों लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं, इसी बीच बिहार के दरभंगा ज़िले में लगभग 200 परिवारों को और भी जरूरी संकटों से जूझना पड़ रहा है। अपने घरों को बाढ़ के पानी में खो देने की स्थिति में ये लोग खुद को सुरक्षित और जीवित रखने के लिए कोसी के पूर्वी तटबंध और रेलवे पटरियों पर शरण लेने के लिए मजबूर हो गए हैं।

दरभंगा में कोसी नदी के पूर्वी हिस्से में एक प्रखंड-कुशेश्वरस्थान पूर्वी है, जिसके लगभग 36 गांव पिछले एक महीने से अधिक समय से बाढ़ के पानी में डूबे हैं। शरण लेने के लिए ग्रामीणों ने कोसी के पूर्वी तटबंध पर बांस के डंडे और पतली प्लास्टिक की चादर (पन्नी) के साथ अस्थायी छोपड़ी बना रखे हैं, जो अक्सर तेज़ हवाओं में उड़ जाते हैं।

भारी बारिश के कारण पिछले एक महीने से ज्यादा समय से उत्तर बिहार के कई ज़िले बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं। हिमालयी नदियां पड़ोसी देश नेपाल से नीचे उफान पर बह रही हैं, जिससे राज्य के 16 ज़िलों के कुल 80 लाख से अधिक लोग बाढ़ के कारण प्रभावित हुए हैं।

दरभंगा ज़िला बागमती, कमला बलान, करेह और अधवारा नदियों से घिरा हुआ है, जो बाढ़ प्रभावित ज़िलों में से एक है। इसकी कुल 20 लाख से ज्यादा आबादी बाढ़ से प्रभावित है। आंकड़ों के अनुसार राज्य में बाढ़ से जुड़ी 25 मौतों में से 11 केवल दरभंगा से ही है। बाढ़ के कारण लाखों लोगों के विस्थापन के बावजूद बिहार सरकार द्वारा दरभंगा में एक भी बाढ़ राहत शिविर नहीं चलाया जा रहा है।

बाढ़ और कोरोना की दोहरी मार झेल रहे इन ग्रामीणों को बिहार सरकार ने असहाय छोड़ दिया है। दरभंगा ज़िला प्रशासन द्वारा चलाई जा रही बस एक सामुदायिक रसोई है, जो स्थानीय लोगों के भूखे पेटों को भर पाने में अक्षम साबित हो रही है।

कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड का सामुदायिक रसोईघर, फ़ोटो-सत्यम झा

कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड के भालुका गांव के निवासी बी.के. पासवान, जो पिछले दो हफ़्ते से कोसी के पूर्वी तटबंध पर रह रहे हैं। उनका घर और गांव पानी में डूब गया है। वे नहीं जानते कि वह फिर कब घर लौट पाएंगे। गांव कनेक्शन से कहते हैं, "बाढ़ राहत के नाम पर राज्य सरकार से मुझे एक पन्नी मिली है। जिला प्रशासन द्वारा एक सामुदायिक रसोईघर लगाया गया है।"

पासवान देशव्यापी लॉकडाउन लगने से पहले दिल्ली के एक कारखाने में काम करते थे। वह मई में ही अपने गांव लौट आएं, पर यहां उन्हें कोई रोज़गार नहीं मिला। फिर बाढ़ आई, जिसने उनकी मक्के की फसल को भी नष्ट कर दिया। वह कहते हैं, "यह सबसे खराब स्थिति है। मेरी सारी फसल बर्बाद हो गई। मनरेगा के तहत गांव में कोई काम भी नहीं मिला और अब मुझे यह भी मालूम नहीं कि दिल्ली में कारखाना कब चालू होगा?"

इन दिनों वे अंडा बेच रहे हैं, ताकि अपने परिवार को भरण-पोषण कर पाएं। उनके पास कोरोना की चिंता करने का समय नहीं है।

बी.के पासवान, फोटो-सत्यम झा

उत्तर बिहार में खाने के पैकेट का वितरण करने में लगे युवा स्वयंसेवक संघ के सदस्य सिराज गांव कनेक्शन से कहते हैं कि, "लोग किससे-किससे बचें? बाढ़ से बचें, सांप-बिच्छु से बचें या वायरस से बचें?"

स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच नहीं

कुशेश्वरस्थान पूर्वी से विस्थापित इन 200 परिवारों को झोपड़ियों में स्वास्थ्य सेवाओं की कोई सुविधा नहीं है। यदि कोई बीमार पड़ जाए तो उन्हें नाव से अस्पताल ले जाना पड़ता है, जिसके प्रति यात्रा के 100-150 रुपए लगते हैं। बाढ़ में सब कुछ खो चुके इन परिवारों को इतने पैसे भी जुटाना बहुत मुश्किल काम है।

मिथिया देवी, जो अपने परिवार के साथ कोसी के पूर्वी तटबंध पर डेरा डाली हुई हैं, कहती हैं, "अगर हम बाढ़ की तबाही से बच रहे हैं, तो हम निश्चित रूप से कोरोना जैसे महामारी से भी लड़ लेंगे।"

इस क्षेत्र के आस-पास कोई कोविड परीक्षण केंद्र नहीं है। स्वास्थ्यकर्मी भी इन दूर-दराज के इलाकों में लोगों का परीक्षण करने नहीं पहुंच पाते हैं।

कुशेश्वरस्थान पूर्वी में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन बाढ़ के कारण वहां आसानी से नहीं पहुंचा जा सकता है। मिथिया देवी को हाल ही में अपने डेढ़ साल के बच्चे को स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाना पड़ा था, जिसके लिए उसे नाव मालिक को 150 रुपए चुकाने पड़े थे।

मिथिया देवी और उसका बेटा, फोटो-सत्यम झा

वह गांव कनेक्शन से कहती हैं, "मेरी आय का एकमात्र स्त्रोत बकरी है। आजकल हरेक को पैसे की किल्लत है, इसलिए इस व्यवसाय के जरिए जीना बहुत मुश्किल हो गया है। नाव के लिए 150 रुपए का जुगाड़ कहां से हो पाएगा?" मिथिया देवी के अनुसार, डॉक्टर ने कहा कि उनका बेटा कुपोषित है। उसमें विटामिन की कमी है। लेकिन बिना पैसे के वह एक लाचार मां भर हैं, जो अपने लड़के की ज़िंदगी भाग्य के भरोसे छोड़ दी हैं।

पर्याप्त खाना भी नहीं

राज्य आपदा प्रबंधन विभाग से मिली सूचना के अनुसार, 5,85,048 लोगों के लिए राज्य में 723 सामुदायिक रसोईघर काम कर रहा है। जबकि 8,144,365 बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए मात्र 10 राहत शिविर ही बनाए गए हैं। इन शिविरों में केवल 12,670 लोग ही आश्रय ले पाए हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाढ़ प्रभावितों के एक बड़े से हिस्से को उनके खुद के भरोसे ही छोड़ दिया गया है।

कुशेश्वरस्थान पूर्वी का सामुदायिक रसोईघर कीचड़ और गंदगी से घिरा हुआ है। रसोईघर में रसोइया का काम करने वाली तारा देवी गांव कनेक्शन को बताती हैं कि, "हमारे पास पीने के लिए साफ पानी नहीं है। हमने एक शेड के लिए भी अनुरोध किया था ताकि फटे प्लास्टिक की चादरों से बारिश का पानी भोजन में नहीं गिरे।" वह शिकायत करती है कि प्रशासन न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी विफल साबित हुई है।

कुशेश्वरस्थान पूर्वी का यह सामुदायिक रसोईघर लोगों को भर पेट खाना खिलाने में असक्षम है फोटो-सत्यम झा

अस्थायी झुग्गियों में रहने वाले बच्चों को सामुदायिक रसोई में खिचड़ी और दाल-भात की थाली लेने के लिए पानी में उतरना पड़ता है। ज्यादातर ग्रामीण आधा पेट ही खाते हैं। एक बूढ़ी औरत कहती है कि, "यदि आप पूरा पेट खाते हैं तो शौचालय कहां है यहां? "

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कुशेश्वरस्थान पूर्वी के डॉक्टर भगवान दास बताते हैं कि इस प्रखंड के बच्चे उच्च कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। गांव कनेक्शन से वह कहते हैं, "महादलित समुदाय के कम-से-कम 50 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। वे हाशिए के भूमिहीन परिवारों से संबंध रखते हैं, जिनके लिए दो वक्त का उचित पोषण भी बहुत मुश्किल है। दूध, अंडे और मांस तो उनकी पहुंच से बाहर है। कई बच्चे तो रतौंधी जैसे बीमारी से पीड़ित हैं।"

अधिकांश बाढ़ प्रभावित परिवारों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से मिलने वाले आनाजों को अपर्याप्त बताया है। कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें राज्य सरकार से बाढ़ राहत के रूप में 6000 रुपए बैंक खातों में प्राप्त हुए थे। हालांकि अभी भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और राज्य सरकार के दावों के बावजूद बच्चों को मीड-डे-मिल के बदले राशन नहीं मिल रहा है।

कुशेश्वरस्थान पूर्वी के ये बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, फोटो-सत्यम झा

स्वच्छता का आभाव

चारों ओर बाढ़ का पानी होने के कारण इन परिवारों को शौच करने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं है। इनके घरों के साथ शौचालय भी पानी में डूबे हुए हैं। पुरुष और बच्चे खुले में शौच करते हैं, जबकि महिलाएं गंदे शौचालयों के इस्तेमाल के लिए विवश हैं।

इससे बीमारी के फैलने की आशंका कई गुना बढ़ गई है। पटना के एक सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार यादव ने गांव कनेक्शन को बताया कि, "उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में दो गड्ढों वाला शौचालय एक आपदा है। शौचालय के डूब जाने के बाद मल पानी और भूमिगत जल में मिल जाता है, जिससे बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।"


वह आगे कहते हैं, "उत्तर बिहार में बाढ़ प्रभावित ज़िलों में सरकार को फ़ायदेमंद शौचालय बनाने की जरूरत है, जो बाढ़ के स्तर से ऊपर की ऊंचाई पर बने हों। इस शौचालय में पानी का कम इस्तेमाल होता है, साथ ही मल को खेतों के लिए उर्वरक बनाने के काम में इस्तेमाल कर लिया जाता है।"

सरकार और उसके नौकरशाहों ने स्वच्छ भारत मिशन और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत बिहार को खुले में शौच मुक्त कराने की स्थिति के बारे में बहुत कुछ जाना समझा है। लेकिन क्या वे कभी महसूस कर पाएंगे कि इन बाढ़ प्रभावित इलाकों में खुले में शौच मुक्त करने के नाम पर किस तरह की गड़बड़ी की गई है?

गांव कनेक्शन ने राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री लक्ष्मेश्वर राय से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, पर फोन का उत्तर नहीं मिल पाया। जवाब के लिए एक विस्तृत प्रश्नावली भी उन्हें ईमेल की गई है, जवाब आने की स्थिति में इसे रिपोर्ट में जोड़ दिया जाएगा।

स्वास्थ्य या शौचालय की सुविधा एक तरफ है, ये 200 विस्थापित परिवार जो अपने साथ अपने मवेशियों को भी यहां लाए हैं, उनके चारे का इंतजाम करना भी बेहद मुश्किल हो रहा है। पूर्व ज़िला पशु पालन अधिकारी विजय कुमार गांव कनेक्शन से कहते हैं, "जब मवेशी बाढ़ के चपेट में आते हैं तो उनके पैरों के एड़ियों में गांठ बन जाते हैं। साथ ही बैक्टीरियल प्रसार के कारण मांसपेशियों और अंगों को प्रभावित करने वाले क्लोस्ट्रीडियल रोग भी पकड़ लेते हैं। दूषित भोजन, पानी की आपूर्ति, मच्छर और स्थिर पानी भी पशुधन के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।"

इस बीच, पहली बार राज्य सरकार ने कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेस) का उपयोग शुरू कर दिया है, जो पटना स्थित बाढ़ प्रबंधन सुधार सहायता केंद्र द्वारा विकसित चेतावनी प्रणाली को मजबूत बनाता है। केंद्र ने नेपाल में गंडक, बागमती, अवधारा, कमला, कोसी और महानंदा सहित और नदियों के लिए ऐसा पूर्वानुमान मॉडल विकसित किया है जो बाढ़ की चेतावनी 72 घंटे पहले ही कर दे देता है।

बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने दावा किया कि इस प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के उपयोग के कारण, स्थानीय प्रशासन को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। उन्होंने कहा कि इस साल बाढ़ से संबंधित मृत्यु दर में कमी आई है।

अनुवाद- दीपक कुमार

इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में पढ़ें।

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