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बजट 2020 में ये कृषि उपाय हटा सकते हैं मंदी का संकट, आएगी अर्थव्यवस्था में तेजी

'ऐसे समय में जब उपभोग और निवेश में गिरावट को आर्थिक मंदी का मुख्य वजह माना जा रहा है, ग्रामीण क्षेत्रों में उपभेग तभी बढ़ेगा जब गांव में रहने वाले निर्धनों की आय बढ़ाने का कोई सार्थक प्रयास किया जाए।'

Devinder SharmaDevinder Sharma   31 Jan 2020 7:57 AM GMT

बजट 2020 में ये कृषि उपाय हटा सकते हैं मंदी का संकट, आएगी अर्थव्यवस्था में तेजी

साल 2013 में दावोस, स्विटजरलैंड में आयोजित सालाना विश्व इकोनॉमिक फोरम (WEF) के उद्घाटन से ठीक पहले स्वयंसेवी संगठन ऑक्सफैम ने अपनी वार्षिक विश्व असमानता रिपोर्ट जारी की थी। इसमें अनुमान प्रस्तुत किया गया था कि विश्व के 100 अमीर परिवारों ने एक साल के भीतर अपनी दौलत में 240 बिलियन डॉलर का इजाफा किया था।

रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया के इन 100 परिवारों के हाथों में इतना पैसा था कि दुनिया भर में फैली गरीबी को चार बार मिटाया जा सके। अगर इस रिपोर्ट के नतीजों को सुना जाता और गरीबी हटाने के लिए कोई कदम उठाया जाता तो अमीरों ओर गरीबों के बीच बढ़ती असमानता की खाई को कम किया जा सकता था।

कुछ दिनों पहले ऑक्सफैम ने विश्व इकोनॉमिक फोरम की 50वीं सालाना बैठक से पहले अपनी ताजा रिपोर्ट 'टाइम टु केयर' रिलीज की है। इसमें एक बार फिर साफ तौर पर यह स्पयष्ट किया गया कि किस तरह वर्षों से पूरी धन-संपदा दुनिया के 2,153 अरबपतियों के हाथ में केंद्रित है। यह दुनिया की 60 प्रतिशत जनसंख्या या 460 करोड़ लोगों की संपत्ति के बराबर है।

इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ती असमानता की ओर भी संकेत किया गया। इसके अनुसार, भारत के एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में जो संपत्ति है वह देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या या 95.3 करोड़ भारतीयों की संपत्ति के चार गुना से भी ज्यादा है। इसके अलावा भारत के सबसे अमीर 63 परिवारों की संयुक्त संपत्ति वित्त वर्ष 2018-19 के केंद्रीय बजट के 24,42,200 करोड़ रुपये से अधिक थी।

ऐसे समय में जब सभी की निगाहें 2020 के बजट पर हैं, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आर्थिक दृष्टिकोण में इस ऐतिहासिक गड़बड़ी को सुधारने की कोशिश करेंगी। इस समय अर्थव्य्वस्था की वृद्धि दर 11 साल के निचले स्तर पर है। आर्थिक मंदी का माहौल है और बड़े उद्योग घाटे का रोना रो रहे हैं। ऐसे में अगर वित्त मंत्री ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बढ़ाने के लिए सरकारी व्यय में बढ़ोतरी का प्रस्ताेव करती हैं तो मुझे शक है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां, ब्रोकरिंग एजेंसियों के साथ काम करने वाले अर्थशास्त्री आर्थिक असमानता को पाटने के लिए किसी नीतिगत सुझाव की गुंजाइश रहने देंगे।

पहले से ही मुख्यी धारा की मीडिया में किसी भी बड़े वित्तीय उलटफेर के खिलाफ चेतावनी दी जा रही है, ऐसे उपाय सुझाए जा रहे हैं कि राजकोषीय घाटा प्रस्तावित सीमा में ही बना रहे।


ऐसे समय में जब उपभोग और निवेश में गिरावट को आर्थिक मंदी का मुख्य वजह माना जा रहा है, ग्रामीण क्षेत्रों में उपभेग तभी बढ़ेगा जब गांव में रहने वाले निर्धनों की आय बढ़ाने का कोई सार्थक प्रयास किया जाए। ऐसा उपाय बढ़ती असमानता को दूर करने में भी एक दूरगामी कदम साबित होगा। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां चाहे जो सुझाव दें वित्त मंत्री को अब तक हावी रही उस आर्थिक सोच को नकारना होगा जिसकी वजह से आज अर्थव्यवस्था‍ ढलान पर है।

हमें ऐसी अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ने की जरूरत है जो महज 10 प्रतिशत आबादी की ही जरूरतों को पूरा करती हो। ऐसा करने से ही प्रधानमंत्री का कथन 'सबका साथ, सबका विकास' सही मायनों में हकीकत बन पाएगा। दूसरे शब्दों में, बजट 2020 आर्थिक असंतुलन को ठीक करने का एक सही अवसर है।

आर्थिक दृष्टिकोण में हर चीज आखिर में आकर मांग पर टिक जाती है। जितनी मांग होगी, आर्थिक विकास भी उतना ही होगा। मुख्यत: इसी वजह से 7वें वित्त आयोग को देश के सरकारी और प्राइवेट सेक्टर ने इकॉनमी के लिए बूस्टोर डोज माना था। आखिरकार, जब कर्मचारियों के हाथ में अधिक पैसा आएगा तभी तो मांग बढ़ेगी और तभी खपत में भी बढ़ोतरी होगी।

इसी तरह, व्यक्तिगत आयकर में भी किसी किस्म की छूट को शहरी मध्यम वर्ग के हाथों में अधिशेष पैसे के रूप में देखा जाता है। एक तरह से यह ग्राहकों के हाथ में और खर्च करने के लिए पैसे देना जैसा है। लेकिन यह आर्थिक सोच का वही खांचा है जिसमें केवल वही उपाय फिट बैठते हैं जो महज 10 प्रतिशत आबादी की जरूरतों को पूरा करने पर जोर देता है। दूसरी तरफ, मैंने हमेशा यह तर्क दिया कि जब तक विकास सर्वसमावेशी नहीं होगा आर्थिक लाभ जनता तक नहीं पहुंच सकेगा। इस तथ्य को मद्देनजर रखते हुए कि गांवों में रहने वाले अधिकांश गरीबों में किसान और मजदूर शामिल हैं, हमें खेती पर ध्यान देना होगा।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में जिन 95.3 करोड़ भारतीयों की बात की गई है, उनमें से कम से कम 60 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़े हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम कृषि को औपचारिक अर्थव्यवस्था के हिस्से के रूप में देखना शुरू करना है। कृषि को केवल एक ऐसे क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जिसका एकमात्र योगदान यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की आर्थिक नीति के तहत खाद्य मुद्रास्फीति चार प्रतिशत (एक या दो प्रतिशत कम या ज्यारदा) की सीमा को पार न करे। इसकी जगह इसे ऐसे क्षेत्र के रूप में देखे जाने की जरूरत है जो अर्थव्य्वस्था में उछाल पैदा कर सकती है।


ऐसा इसलिए है क्योंकि कृषि को दुर्भाग्यवश जानबूझकर कुपोषित रखा गया है ताकि आर्थिक सुधार बनाए रखे जा सकें। इसके नतीजे में जो कृ‍षि संकट पैदा हुआ है वह आज सबके सामने है। मैं अक्सर आर्थिक सर्वेक्षण 2016 का हवाला देता हूं। उसके अनुसार, भारत के 17 राज्यों में खेती से होने वाली सालाना आया महज 20,000 रुपये है। दूसरे शब्दों में, लगभग आधे देश में किसान परिवार, 1,700 रुपये प्रति माह से कम पर जीवित रहते हैं। इसी कम आय की वजह से मजबूरन देश के सकल घरेलू उत्पाेद (जीडीपी) में कृषि का हिस्सा बहुत कम बना हुआ है।

आईएमएफ का कहना है कि ग्रामीण मांग में गिरावट के चलते भारत की ग्रोथ नीचे आई है, इसी वजह से वैश्विक जीडीपी में भी गिरावट आई है। लेकिन आईएमएफ और मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों को यह बात अब पता चली है जब भारत की जीडीपी 5 प्रतिशत से भी नीचे आ गई। लेकिन असलियत यह है कि पिछले दो दशकों में भी कृषि से होने वाली आय या तो स्थिर रही या निगेटिव रही, जिसका अर्थ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग पहले से ही कम थी। लेकिन इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया गया।

2000 से 2016-17 की अवधि बीच OECD-ICRIER के अध्ययन से पता चलता है कि इस दौरान भारतीय किसानों को उचित मूल्य से वंचित होने के कारण 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इसके बाद वह समय आया जब नीति आयोग के अनुसार, वास्तविक कृषि आय में वार्षिक वृद्धि 'शून्य के पास' बनी हुई थी। लेकिन न तो विश्व बैंक, न आईएमएफ, न क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और न ही भारत के मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों ने ग्रामीण भारत में व्याप्त इस असाधारण संकट पर जरा सी भी चिंता जताई। जब तक जीडीपी 6 फीसदी या उससे ऊपर बना रहा तब तक अर्थशास्त्री ग्रामीण मांग में गिरावट को देखने में असफल रहे।

पिछले वर्ष के बजट में पीएम-किसान योजना का शुभारंभ हुआ, जिसके तहत प्रति कृषक प्रति वर्ष 6,000 रुपये की प्रत्यक्ष आय सहायता देने के लिए 75,000 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया था। यह आर्थिक सोच में बहुत बड़ा बदलाव है। मैं लगातार कृषक वर्ग के लिए आय हस्तांतरण की मांग कर रहा था, ताकि उस आर्थिक नुकसान की आंशिक रूप से भरपाई हो सके जिससे किसान साल-दर-साल गुजर रहे हैं।

मुझे लगता है कि पीएम-किसान योजना ग्रामीण आय बढ़ाने का सही समय पर सही उपाय है। मेरी नजर में कोई दूसरा नीतिगत उपाय नहीं है जिसकी सभी किसानों तक पहुंच हो। इसका सार्थक प्रभाव हो इसके लिए वित्त मंत्री को मेरा सुझाव है कि आने वाले बजट में प्रधानमंत्री-किसान योजना के तहत पहले से आवंटित 75,000 करोड़ करोड़ रुपये के अलावा 1.50 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज दिया जाए।

यह उन्हें सालाना 18,000 रुपये की राशि देगा जिससे उन्हें हर महीने 1,500 रुपये मिलेंगे ( मौजूदा समय में मिलने वाले 500 रुपये की जगह) जो उनके कुछ कृषि खर्च जैसे, बीज, खाद और जैव कीटनाशकों की लागत को पूरा करने के लिए पर्याप्त हैं। शहरों में रहने वालों के लिए यह कुछ खास नहीं है लेकिन ग्रामीण गरीबों के लिए इसकी बहुत अहमियत है जिनकी सालाना आय लगभग 20,000 रुपये के आसपास है।


हर हाल में, पीएम-किसान योजना के तहत दी गई अतिरिक्तु राशि उपभोक्ताओं की बढ़ी हुई मांग के रूप में बाजारों में वापस आ जाएगी। इस योजना के शत-प्रतिशत क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने का भी प्रयास किया जाना चाहिए। वर्तमान में, कुल 14.5 करोड़ किसानों के स्थान पर केवल 7.6करोड़ किसानों को 30 नवंबर तक कवर किया गया है। इसके अलावा, वित्त मंत्री को बटाईदार किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए भी इस योजना का विस्तार करना चाहिए।

जब खेत की आमदनी कम होती है, तो कृषि श्रमिकों पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी (CMIE) के एक अध्ययन के अनुसार, पिछले एक साल में, लगभग 1.1 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरी खो दी। रिपोर्ट का कहना है, ' ग्रामीण भारत में अनुमानित 91 लाख नौकरियां खत्म हो गईं, जबकि शहरी भारत में नुकसान 18 लाख नौकरियों का था। ग्रामीण भारत की अबादी देश की दो-तिहाई आबादी है, लेकिन उसे 84 प्रतिशत रोजगार हानि हुई।'

कई अन्य अध्ययनों से पता चला है कि पिछले पांच वर्षों में कृषि मजदूरी सबसे कम हो गई है और बड़े पैमाने पर खेती और गैर-कृषि कार्यबल दोनों के रोजगार कम हो रहे हैं। यहां तक कि मनरेगा योजना, जिसके लिए 2019 राजकोषीय के लिए संशोधित अनुमानों के तहत 61,084 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया था, वहां भी समय पर भुगतान नहीं किए जाने की कई रिपोर्ट सामने आई हैं। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए, मेरा दूसरा सुझाव मनरेगा बजटीय आवंटन में 10,000 करोड़ रुपये का इजाफा करने का होगा, इसे वित्त वर्ष 2020 के लिए 70,000 करोड़ रुपये तक ले जाना होगा।

जब रुकी हुई आवास परियोजनाओं के लिए 25,000 करोड़ रुपये मुहैया कराने से निर्माण उद्योग की मदद हो सकती है तो उसी तरह जीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) की पहल को आगे बढ़ाने के लिए 25,000 करोड़ रुपये के एक और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। इसका उल्लेख वित्त मंत्री ने पिछले साल के बजट में किया था लेकिन इसके लिए कोई भी बजटीय प्रावधान नहीं किया था।

आंध्र प्रदेश में ZBNF कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए लगभग 5.85 लाख किसान रासायनिक खेती की जगह इस नए तरीके से खेती करने लगे। इससे उत्साहित होकर इसे उन क्षेत्रों में अपनाने की जरूरत है जहां हरित क्रांति की गई थी। ये क्षेत्र भूजल की कमी के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं साथ ही पर्यावरण प्रदूषण का भी। इसके अलावा, प्रमुख शहरी केंद्रों में किसान बाजार स्थापित करने के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन भी किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक शहरी आबादी को रासायनिक मुक्त कृषि उत्पादों की आपूर्ति को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

अंत में, मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्री ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग पहल शुरू करेंगी। आखिरकार, अगर व्यापार करने में आसानी के लिए 7,000 कदम औद्योगिक क्षेत्र के लिए उठाए जा सकते हैं, तो कृषि को भी इसकी सख्त जरूरत है। उत्पादन और विपणन से जुड़े हर कदम पर, किसानों को उन बाधाओं का सामना करना पड़ता है जो मुख्य रूप से शासन की कमी के कारण होते हैं। यह कृषि को आर्थिक रूप से व्यवहार्य और पर्यावरण के अनुकूल उद्यम बनाने में एक दूरगामी कदम होगा। जीवन से भरपूर कृषि क्षेत्र इतनी मांग पैदा करेगा कि विकास के पहिये कभी भी मंदी का सामना नहीं करेंगे। इसे आजमा कर देखें और इसका अनुभव करें।

(नोट- यह लेखक के निजी विचार हैं। वह देश के प्र्ख्यात कृषि अर्थशास्त्री और पूर्व पत्रकार हैं। लेख नेशनल हेराल्ड में पहले प्रकाशित हो चुका है)


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