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गांव के स्‍कूल में ऑनलाइन क्‍लास से बच्‍चे पढ़ते हैं अंग्रेजी और विज्ञान

लखनऊ। "माय नेम ईज प्राची मिश्रा.

आई स्टडी इन सेवंथ क्लास.

माय स्कूल नेम इज भारतीय ग्रामीण विद्यालय, कुनौरा.

आई लाइक प्लेइंग बैडमिंटन."

सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली प्राची मिश्रा इस तरह अंग्रेजी में अपना परिचय देती हैं। प्राची को पहले अंग्रेजी बोलने में डर लगता था, लेकिन स्कूल में चलाई जा रही ऑनलाइन वीडियो क्लास के जरिये यह डर धीरे-धीरे दूर हो रहा है।

प्राची लखनऊ से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित कुनौरा गांव की 'भारतीय ग्रामीण विद्यालय' की छात्रा हैं। प्राची की तरह ही इस स्कूल के लगभग 600 बच्चे ऑनलाइन वीडियो क्लास के जरिये अंग्रेजी के प्रति अपनी झिझक और डर को दूर करने में लगे हुए हैं। ऐसा विद्यालय प्रबंधन और शिक्षकों के प्रयास से संभव हो पाया है।

भारतीय ग्रामीण विद्यालय की ऑनलाइन क्‍लास में पढ़ते बच्‍चे।

विद्यालय के शिक्षक अजय कुमार पांडेय बताते हैं कि ऑनलाइन वीडियो क्लास को संचालन करने का उनका यह पहला अनुभव है। वह कहते हैं, "यह सिर्फ ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए ही नही बल्कि मेरे लिए भी एकदम से नया है। ग्रामीण परिवेश में ऐसी सुविधाएं बहुत कम ही देखने को मिलती हैं। विद्यार्थियों को इससे फायदा भी हो रहा है। वे अंग्रेजी में बात करने में अब हिचकते नहीं हैं।"

विद्यालय के छात्र खुर्शीद अब्बास ने बताया, "यहां आस-पास के स्कूलों में कम्प्यूटर शिक्षा की सुविधा नहीं है और अगर है भी तो फीस काफी महंगी है। ऐसे में हमें ना सिर्फ स्कूल में कम्प्यूटर की शिक्षा मिल रही है बल्कि ऑनलाइन क्लास के द्वारा हमें अपनी अंग्रेजी के प्रति झिझक भी तोड़ने में मदद मिल रही है। हमें सिखाया जाता है कि अंग्रेजी बोलने में हिचकिचाए नहीं।"

वहीं विद्यालय की छात्रा सपना कुमारी कहती हैं कि इस पहल से उन्हें आगे कभी भी अंग्रेजी बोलने में डर नहीं लगेगा। विद्यालय के एक अन्य अध्यापक इन्द्र पाल वर्मा कहते हैं, "यह विद्यार्थियों के लिए एकदम नया अनुभव है। कोई दुबई से सीधा बच्चों से जुड़ रहा है, तो कोई चंडीगढ़ से बच्चों को अंग्रेजी सीखा रहा है। विद्यार्थी निश्चित रुप से इस पहल से बेहतर होंगे।"


भारतीय ग्रामीण विद्यालय, कुनौरा के बारे में

उत्तर प्रदेश की राजनधानी लखनऊ से 35 किमी दूर कुनौरा गांव में स्थित भारतीय ग्रामीण विद्यालय की स्थापना एक भू-वैज्ञानिक डॉ. एसबी मिश्र ने 47 साल पहले 1972 में की थी। उस समय उनके गांव और आस-पास के 10 किलोमीटर की परिधि में कोई स्कूल नहीं था। इस अभाव को पूरा करने के लिए उन्होंने कनाडा की अपनी नौकरी छोड़ दी और अपने गांव में एक स्कूल खोला।

एक छप्पर के नीचे लकड़ी के ब्लैक बोर्ड से शुरू हुई इस स्कूल की यात्रा आज ऑनलाइन क्लास तक पहुंच गई है। यहां हर साल करीब छह से सात सौ बच्चे एक साथ पढ़ाई करते हैं। इस स्कूल के कई छात्र अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं और देश-विदेश में गांव का नाम रोशन कर रहे हैं।


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